Saturday, 10 June 2017

ठाकुर महराज

ⓘ Optimized just nowView original https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5_(%E0%A4%95%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_) hi.m.wikipedia.org सलेमपुर गाँव (कटिहार ) सलेमपुर (salempur katihar)कटिहार जिले के समेली प्रखंड का एक समृद्ध गाँव है।सलेमपुर, कटिहार से 45 कि० मि० दुर NH 31 पे स्थित है। यहाँ कि आबादी लगभग 4000 है। सलेमपुर — गाँव  salempur —   सलेमपुर समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०) देश भारत राज्य बिहार ज़िला कटिहार आधिकारिक भाषा(एँ) हिन्दी, मैथिली,अंगिका, अंग्रेज़ी विभिन्न कोड • पिनकोड • 521201 • दूरभाष • +916457 • गाड़ियां • BR आधिकारिक जालस्थल: http://salempur.webs.com/ भुगोल सलेमपुर के पुर्व दिशा में चकला, पशिच्म में रामनगर, उत्तर में मलहरीया तथा दक्षिण में खैरा है। प्राचीन समय में गाँव के पश्चिम दिशा से कोसी नदी बहती थी जोकि अब लगभग 15 किलोमीटर दूर चली गई है। कोसी नदी के प्रमाण आज भी गाँव के पश्चिमी दिशा में देखे जा सकते हैं। जनसांख्यिकी यहाँ कि आबादी लगभग 4000 है। यातायात बस मार्ग से- कटिहार से भागलपुर तथा पुर्णियाँ से भागलपुर जाने के रास्ते में सलेमपुर है। यहाँ जानें के लिए कटिहार, पुर्णियाँ तथा भागलपुर से बस मिलती है। सलेमपुर NH 31 पे समेली के नजदीक स्थित है॥ रेलमार्ग से- यहाँ का नजदीकी स्टेशन कुर्सेला और बखरी है। वायुमार्ग से - यहाँ का नजदीकी एयरपोर्ट पुर्णियाँ है। आदर्श स्थल पुरानी काली मंदिर गाँव के उत्तर दिशा में दक्षिण काली जी का भव्य एवंम् प्राचीन मंदिर है। यहाँ प्रतिवर्ष दिपावली में मेले का आयोजन किया जाता है। नई काली मंदिर गाँव के दक्षिण में भी काली जी का एक मंदिर है। इस मंदिर कि स्थापना पुरानी काली मंदिर से ही हुई है। माता वैश्णो मंदिर गाँव के पश्चिम में माता वैश्णो देवी का मंदिर(कुटि) हैै। वैसे तो ये मंदिर प्राचीन है लेकिन इसकी विधिवत स्थापना तथा मंदिर निर्माण 2003 में संपन्न हुआ, इस अवसर पर गाँव में भव्य यज्ञ का आयोजन हुआ था। इस यज्ञ की वर्षी पर जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य भी आए थे। श्री अमोल गौशाला श्री अमोल गोशाला का निर्माण भारत के आजादी से पहले अपने समय के प्रख्यात पंडित अमोल झा ने करवाया था। ये 4 एकड़ में फैला हुआ है, लेकिन सरकारी उपेक्षाअों के कारण इसकी स्थिति जर्जर है। ठाकुर बाबा स्थान गाँव की दक्षिणी पूर्वी कोने में ठाकुर बाबा स्थान है। ye devta U.P. ke mirzapur jile me logo ke ghr ghar me kul devta hote hai jinko hardiya dev v kahah jata hai.. ye ganga nadi k par se aate hai aur jiske ghar me hote hai unke ghar se haldi nahi lii jati hai. inki pooja ka prasad kewal wahi khata hai jiske ghar me inki pooja hoti hai.. inki akriti sindoor se banti hai. jisme thakur-thakurain hote hai aur inke sath bhairo baba ki pooja v ki jati hai..Thakur baba ko gamcha aur janew chadhaya jata hai aur ghar ka naya anaaz v chadhta hai sath hi laddu. thakurain ko nai sadi aur singaar ki samgri chadai jati hai.Thakur maharj ki pooja baishak mahine ke akhari shaniwar ko hoti hai. aur kartik mahine ke antuim shaniwar ko v ki jati hai sath hi sath. Sawan mahine ki antim shaniwar ko v pooja hoti hai. har mahine me alag alag chize chadhai jati hai. jaisa jiske ghar me manyat ho. Ghar me kisi ladke ki shadi hone par v inki vishesh pooja hoti hai aur beta hone par v vishesh pooja hoti hai. शिवालय गाँव के पूरब दिशा में शिव मंदिर है। ब्रम्ह बाबा स्थान गाँँव के पश्चिमी दक्षिणी कोने में ब्रम्ह बाबा स्थान है। यहाँ एक प्राचीन पीपल का पेड़ है। इस पीपल के पेड़ के बारे मे गाँव के लोगो की मान्यता है कि रातोरात प्रकट हो गया था। आदर्श व्यक्ति पं अमोल झा पंडित श्री अमोल झा अपने समय के प्रख्यात पंडित थे। इन्हौने अपनी जमीन दान में दे कर गाँव में गोशाला का निर्माण कराया। पं लड्डू मिस्र पंडित लड्डू मिश्रा पूर्वी बिहार के प्रसिद्ध पंडित हैं। बाहरी कड़ीयाँ सलेमपुर कटिहार अंतिम बार 5 फ़रवरी 2017 को 17:20 बजे संपादित किया गया सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। •गोपनीयताडेस्कटॉप

गोत्र

 Hindi ME NEWS.com  गोत्र समाज // जाती कैसे जाने प्रकार how to find gotra by surname list wiki finder online gotras date of birth Gotra cast community list(गोत्र समाज जात)  how to find gotra by surname gotra list kashyap gotra wiki gotra finder find gotra online brahmin gotras and surnames bharadwaja gotra how to find gotra by date of birth Meaning of Gotra - गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है । यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । आगे चलकर यही गोत्र वंश परिचय के रूप मैं समाज मैं प्रतिष्ठित हो गया.. एक सामान गोत्र वाले एक ही ऋषि परंपरा के प्रतिनिदी होने के कारन भाई-बहिन समझे जाने लगे… जो आज भी बदस्तूर जारी है… प्रारंभ मैं सात गोत्र थे कालांतर मैं दुसरे ऋषियों के सानिध्य के कारन अन्य गोत्र अस्तित्व मैं आये !! जातिवादी सामाजिक व्यवस्था की खासियत ही यही रही कि इसमें हर समूह को एक खास पहचान मिली। हिन्दुओं में गोत्र होता है जो किसी समूह के प्रवर्तक अथवा प्रमुख व्यक्ति के नाम पर चलता है। सामान्य रूप से गोत्र का मतलब कुल अथवा वंश परंपरा से है। आपका गोत्र जानना हो तो नीचे कमैंट्स में आपकी जाती फुल नाम सहित बताये गोत्र को बहिर्विवाही समूह माना जाता है अर्थात ऐसा समूह जिससे दूसरे परिवार का रक्त संबंध न हो अर्थात एक गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते पर दूसरे गोत्र में विवाह कर सकते, जबकि जाति एक अन्तर्विवाही समूह है यानी एक जाति के लोग समूह से बाहर विवाह संबंध नहीं कर सकते। गोत्र मातृवंशीय भी हो सकता है और पितृवंशीय भी। ज़रूरी नहीं कि गोत्र किसी आदिपुरुष के नाम से चले।  जनजातियों में विशिष्ट चिह्नों से भी गोत्र तय होते हैं जो वनस्पतियों से लेकर पशु-पक्षी तक हो सकते हैं। शेर, मगर, सूर्य, मछली, पीपल, बबूल आदि इसमें शामिल हैं। यह परम्परा आर्यों में भी रही है। हालांकि गोत्र प्रणाली काफी जटिल है पर उसे समझने के लिए ये मिसालें सहायक हो सकती हैं। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लोकायत में लिखते हैं कि कोई ब्राह्मण कश्यप गोत्र का है और यह नाम कछुए अथवा कच्छप से बना है। इसका अर्थ यह हुआ कि कश्यप गोत्र के सभी सदस्य एक ही मूल पूर्वज के वंशज हैं जो कश्यप था। इस गोत्र के ब्राह्मण के लिए दो बातें निषिद्ध हैं। एक तो उसे कभी कछुए का मांस नहीं खाना चाहिए और दूसरे उसे कश्यप गोत्र में विवाह नहीं करना चाहिए। आज समाज में विवाह के नाम पर आनर किलिंग का प्रचलन बढ़ रहा है उसके मूल में गोत्र संबंधी यही बहिर्विवाह संबंधी धारणा है। मानव जीवन में जाति की तरह गोत्रों का बहुत महत्त्व है ,यह हमारे पूर्वजों का याद दिलाता है साथ ही हमारे संस्कार एवं कर्तव्यों को याद दिलाता रहता है । इससे व्यक्ति के वंशावली की पहचान होती है एवं इससे हर व्यक्ति अपने को गौरवान्वित महसूस करता है । हिन्दू धर्म की सभी जातियों में गोत्र पाए गए है । ये किसी न किसी गाँव, पेड़, जानवर, नदियों, व्यक्ति के नाम, ॠषियों के नाम, फूलों या कुलदेवी के नाम पर बनाए गए है । इनकी उत्पत्ति कैसे हुई इस सम्बंध में धार्मिक ग्रन्थों का आश्रय लेना पड़ेगा । धार्मिक आधार- महाभारत के शान्ति पर्व (२९६ -१७ , १८ ) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे- 1-अंगिरा। 2- कश्यप। 3- वशिष्ठ 4- भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के नाम जुड़ गए । गोत्रों की प्रमुखता उस काल में बढी जब जाति व्यवस्था कठोर हो गई और लोगों को यह विश्वास हो गया कि सभी ऋषि ब्राह्मण थे । उस काल में ब्राह्मण ही अपनी उत्पत्ति उन ऋषियों से होने का दावा कर सकते थे । इस प्रकार किसी ब्राह्मण का अपना कोई परिवार, वंश या गोत्र नहीं होता था । एक क्षत्रिय या वैश्य यज्ञ के समय अपने पुरोहित के गोत्र के नाम का उच्चारण करता था । अत: सभी स्वर्ण जातियों के गोत्रों के नाम पुरोहितों तथा ब्राह्मणों के गोत्रों के नाम से प्रचलित हुए । शूद्रों को छोड़कर अन्य सभी जातियों जिनको यज्ञ में भाग लेने का अधिकार था उनके गोत्र भी ब्राह्मणों के ही गोत्र होते थे । गोत्रों की समानता का यही मुख्य कारण है । शूद्र जिस ब्राह्मण और क्षत्रिय परिवार का परम्परागत अनन्तकाल तक सेवा करते रहे उन्होंने भी उन्हीं ब्राह्मणों और क्षत्रियों के गोत्र अपना लिए । इसी कारण विभिन्न आर्य और अन्य जातियों तथा वर्णों के गोत्रों में समानता पाई जाती है ।  मनु स्मृति के अनुसार कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनाई गई थी । मनुष्यों में कोई छोटा या बड़ा नही होता । शरीर के सभी अंगों का अपनी-२ जगह महत्व है । वैसे तो संसार के सभी धर्म, सम्प्रदायों में जाति-पाति का थोड़ा बहुत भेद अवश्य मिलेगा किन्तु वह भेद अहंकार, घृणा और एक-दूसरे को नीचा दिखाने कि भावना से हुआ, क्योंकि धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सभी मनुष्य समान हैं । जाति व्यवस्था को मजबूत बनाया गया । जन्म से लेकर मृत्यु तक के सारे कार्य जाति में ही सम्पन्न होने का रिवाज बन गया । लोगों ने अपनी जाति के बाहर सोचना ही बन्द कर दिया । शूद्रों को छोड़कर अन्य सभी जातियों जिनको यज्ञ में भाग लेने का अधिकार था उनके गोत्र भी ब्राह्मणों के ही गोत्र होते थे । गोत्रों की समानता का यही मुख्य कारण है । शूद्र जिस ब्राह्मण और क्षत्रिय परिवार का परम्परागत अनन्तकाल तक सेवा करते रहे उन्होंने भी उन्हीं ब्राह्मणों और क्षत्रियों के गोत्र अपना लिए । इसी कारण विभिन्न आर्य और अन्य जातियों तथा वर्णों के गोत्रों में समानता पाई जाती है । चौहान राजपूतों, मालियों, आदि कई जातियों में मिलना सामान्य बात है । सारांश में पुरोहितों तथा क्षत्रियों के परिवारों की जिन जातियों ने पीढ़ि सेवा की उनके गोत्र भी पुरोहितों और क्षत्रियों के समान हो गए । राजघरानों के रसोई का कार्य करने वाले शुद्र तथा कपड़े धोने का कार्य करने वाले धोबियों एवं चमड़े का कार्य करनेवाले चर्मकार आदि व्यक्तियों के गोत्र इसी वजह से राजपूतों से मिलते हैं । लम्बे समय तक एक साथ रहने से भी जातियों के गोत्रों में समानता आई । ब्राह्मणों के विवाह में गौत्र-प्रवर का बड़ा महत्व - पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगौत्र हो, किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगौत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जाना चाहिए। विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान ‘गौत्र” कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। आगे चलकर गौत्र का संबंध धार्मिक परंपरा से जुड़ गया और विवाह करते समय इसका उपयोग किया जाने लगा। भारत वैदिक काल से ही कृषि प्रधान देश रहा है.. और कृषि मैं गाय का बड़ा महत्त्व रहा है.. वैदिक काल से ही आर्य ऋषियों के निकट रह कर पठान, पठान, इज्या, शासन, कृषि, प्रशासन, गोरक्षा और वाणिज्य के कार्यों द्वारा अपनी जीविका चलाते थे.. और चूँकि भारत की जलवायु कृषि के अनुकूल थी, इसी लिए आर्य जन कृषि विज्ञानं में पारंगत थे, और कृषि मैं गाय को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया.. वह भारतीय कृषि और जीवन की धुरी बन चुकी थी… गोऊ माता परिवार की सम्रधि का पर्याय थी.. गौपालन एक सुनियोजित कर्म था, यद्यपि गायें पारिवारिक संपत्ति होती थी पर उनकी देख रेख, संरक्षण ऋषियों की देख-रेख मैं सामुदायिक तरीके से होता था.. अपनी गायों की रक्षा मैं कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे … इस प्रकार गौपालन के प्रवर्तक ऋषि थे.. गौपालन करनेवाले अनेक वंशो के अलग-अलग कुल सुविधानुसार अलग-अलग ऋषियों की छत्र छाया मैं रहते थे, लोग ऋषि के आश्रम के पास ग्राम बना कर गौपालन, कृषि और वाणिज्यिक कार्य करते थे.. इस प्रकार जो लोग किसी ऋषि के पास रह कर गौपालन करते थे वे उसी ऋषि के नाम के गोत्र के पहचाने जाने लगे.. जैसे कश्यप ऋषि के साथ रहने वाला रामचंद्र अपना परिचय इस प्रकार देता था: “कश्यप गोत्रोत्पन्नोहम रामचंद्रसत्वामभीदाये “” मैं कश्यप गोत्र मैं पैदा हुआ रामचंद्र आपको प्रणाम करता हूँ… जैसे कश्यप ऋषि के साथ रहने वाले सभी वर्णों के लोग कश्यप गोत्र के हो गए.. गोत्र पद्धति प्रारम्भ करने की वजह:- वजह केवल यह है की ऋषियों ने एक ही कुल में विवाह को निषेध बताया था जो की गोत्र सिस्टम में परिवर्तित हो गयी। जिन लोगों ने आयुर्वेद का अध्यन किया हो वे जानते होंगे की एक पुरुष का रक्त आने वाली ७ पीढ़ियों तक उपस्थित रहता है रक्त का तात्पर्य DNA से है ,और स्त्री का ३ पीढ़ियों तक जो की वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लगभग भी है ,ऐसा आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से लिखा है की यदि इस प्रकार के रक्त में यदि मेल होता है,और उससे संतान उत्पत्ति होती है तो उस संतान का रक्त अर्थार्त DNA कमजोर होता है जिससे उसमे कई प्रकार की बीमारियाँ होने की सम्भावना होती है जैसे की शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होना ,शारीरिक विकृतियाँ होना ,वंशानुगत बीमारियाँ होना आदि आदि , इसका सीधा उदाहरण है भारत में बाघों की संख्या में भारी कमी का आना है ,वैज्ञानिक शोधों से पता चला है की भारत में बाघों के शिकार के आलावा उनकी मृत्यु का प्रमुख कारन है उनके इम्युनिटी सिस्टम का कमजोर होना , क्यूंकि ज़्यादातर बाघ अन्य दुसरे बाघों की अपने क्षेत्र में उपस्थिति न होने के कारण आपस में ही सम्बन्ध बनाते हैं ,जो की एक ही परिवार के होते हैं इसलिए सरकार बाघों की ब्रीडिंग अन्य जंगलों से लाये हुए बाघों से करवाती है और जिसके फलस्वरूप उनकी संख्या में सुधार भी हो रहा है ,यही बात इंसानों पर भी लागू होती है। और रही बात गोत्र सिस्टम की तो, आप सभी जानते हैं की हिन्दू धर्म में नियम अक्सर रुढ़िवाद का रूप ग्रहण कर लेती हैं ,जैसे वर्ण व्यवस्था का जातिगत व्यवस्था में परिवर्तन आदि आदि  जानकारी भेजकर सहयोग करे,कोई सुझाव तो नीचे कमैंट्स में बताये HindiMeNEWS.com पर आप भी लिखे Kindly share click icons⤵  राजपूतों की वंशावली Rajput Caste History In Hindi Samaj Names Gotra WhatsAp... सभी नयी जानकारी मोबाइल Email पर पाने के लिए Join over 2000+ people who get FREE fresh content Top.HowFN Respect Privacy, You are Safe!  Enter email id... SUBSCRIBE 2 मिनट के अंदर, CHECK YOUR INBOX हमारा CONFIRMATION ईमेल मिलेगा TRY! 17 comments:  Unknown 12 April 2017 at 07:53 This comment has been removed by the author.Reply Replies  Lucky Wasiya 30 May 2017 at 06:31 Name : lucky wasiya Caste : SC Subcaste : kori " kabir panthi " Time : 7 pm Reply  Pankaj Arya 12 April 2017 at 07:55 Sheetal जाति धोबीReply  Pankaj Arya 12 April 2017 at 07:56 Pankaj arya जाति धोबीReply  Shubham kaushal 18 April 2017 at 10:57 This comment has been removed by a blog administrator.Reply  pramod kishor tiwary 29 April 2017 at 02:40 Kankubj Brahmin Pramod Kishor Tiwary,please told what is my gotta,prwr,shakhaReply  Unknown 3 May 2017 at 07:44 Agnihotri ka kya gotra hai...Reply Replies  sunil kumar 27 May 2017 at 02:15 Pta nhi Reply  Unknown 17 May 2017 at 10:52 Pradhan, Saxena ka kya gotra Hoti haiReply  mukesh 20 May 2017 at 10:57 DhanukReply  mukesh 20 May 2017 at 10:58 Mukesh DhanukReply  ankit verma 25 May 2017 at 00:36 ankit vermaReply  rajesh karuskar 25 May 2017 at 07:30 Burud Marathi rajesh karuskar Reply  lalit khulbe 27 May 2017 at 00:27 This comment has been removed by the author.Reply  Unknown 27 May 2017 at 02:14 Sunil chaudhary Bihari baniyaReply  Dolly Kacker Mehrotra 4 June 2017 at 22:43 Meraa naam rahul Kacker hai meraa gotra kyaa hai?Reply  Dolly Kacker Mehrotra 4 June 2017 at 22:44 Meraa naam rahul Kacker hai meraa gotra kyaa hai?Reply    वॉट्स अप से मनुष्य का स्वभाव WhatsApp to know human nature future Read more  शक्कर के 12 नुकसान cheene ke nuksan nuksaan chini Read more  10 साल आप पीछे छूट जायेंगे. 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Tuesday, 30 May 2017

हरीश ब्रह्म

हरसू ब्रह्मधाम में भूत-प्रेत बाधा से मिलती मुक्ति Thu Nov 17 16:54:21 IST 2011  जाटी,भभुआ,चैनपुर (कैमूर) इस अत्याधुनिक वैज्ञानिक युग में भी असंख्य लोग भूत-प्रेत बाधा में विश्वास करते है। मुक्ति पाने के लिए हरसू ब्रह्म धाम में आकर मत्था टेकते है। इनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है। प्रेत बाधा से ग्रसित श्रद्धालु आम तौर पर शारदीय चैत्र नवरात्र में यहां आते हैं। कैंसर जैसे असाध्य रोगों को भी लोग प्रेत बाधा मानकर हरसू ब्रह्म धाम में आकर त्राण पाते हैं। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। क्षेत्र के जानकार बताते है चैत नवरात्र में यहां भूत-प्रेतों का मेला लगता है। इसीलिए हरसू ब्रह्म धाम को भूतों का सुप्रीम कोर्ट कहा जाता है। इस शीर्ष अदालत में सभी को न्याय मिलता है। प्रेत बाधा से पीड़ित लोग यहां आते है और हरसू ब्रह्म की अपार महिमा से खुश और संतुष्ट होकर लौटते है। भूत पिशाच से पीड़ित महिला और पुरुष दोनों होते है। हरसू ब्रह्म धाम के पंडा राजकेश्वर त्रिपाठी ने बताया कि इस अलौकिक धाम में न सिर्फ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल और महाराष्ट्र से बल्कि अमेरिका, सूरिनाम और कनाडा के भी अप्रवासी भारतीय आते है और मत्था टेकते है। यहां आने से न सिर्फ उनकी प्रेत बाधाएं दूर होती है बल्कि उनकी मनवांछित मनोकामना भी पूरी होती है। त्रिपाठी ने बताया कि अमेरिका में रहने वाले इंजीनियर केएच बनर्जी की पत्‍‌नी को कैंसर था,हरसू ब्रह्म धाम में आने से उनको लाभ मिला। जौनपुर के रहने वाले एसके पांडेय सूरिपनाम में रहते हैं और हर साल चैत नवरात्र में दर्शन-पूजन को आते हैं। महाराष्ट्र निवासी डा. अरुण नायक कनाडा में रहते हैं और पटना निवासी डा. राजीव श्रीवास्तव इंगलैंड में रहते हैं। लेकिन चैत नवरात्र या शारदीय नवरात्र में हरसू ब्रह्म धाम में मत्था टेकने आने से नहीं चूकते। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले से आये श्रद्धालु राजबली यादव ने बताया कि 35 वर्षीय पत्‍‌नी बीमा देवी भूत प्रेत से ग्रसित थी। इसको साथ लेकर एक साल से यहां आ रहा हूं। काफी लाभ हुआ है। सुल्तानपुर से ही आए हरिशचन्द्र ने बताया कि हम चार साल से बाबा के धाम में आ रहे हैं। भूत बाधा से परेशान हैं,लेकिन यहां आने पर बहुत शांति मिली। विश्वास है पूर्ण निवारण हो जाएगा। हरसू ब्रह्म धाम के एक अन्य पुजारी ने बताया कि भूत-प्रेत,संतानोत्पत्ति, पागलपन और कुष्ट सहित अन्य असाध्य बाधाओं से पीड़ित लोग शांति और निवारण के लिए यहां आते है। प्रेत बाधा पीड़ितों को हर सोमवार को व्रत रखना पड़ता है। हरसू ब्रह्म इस घोर कलिकाल में भगवान शंकर के साक्षात अवतार माने जाते है। मुगल शासन के अंत के बाद हरसू ब्रह्म धाम के बारे में प्रचार-प्रसार हुआ।

गायत्री माता

गायत्री   गायत्री एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- गायत्री (बहुविकल्पी) भगवती श्री गायत्री  गायत्री देवी Gayatri Devi भगवती गायत्री आद्याशक्ति प्रकृति के पाँच स्वरूपों में एक मानी गयी हैं। इनका विग्रह तपाये हुए स्वर्ण के समान है। यही वेद माता कहलाती हैं। वास्तव में भगवती गायत्री नित्यसिद्ध परमेश्वरी हैं। किसी समय ये सविता की पुत्री के रूप में अवतीर्ण हुई थीं, इसलिये इनका नाम सावित्री पड़ गया। कहते हैं कि सविता के मुख से इनका प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान सूर्य ने इन्हें ब्रह्माजी को समर्पित कर दिया। तभी से इनकी ब्रह्माणी संज्ञा हुई। कहीं-कहीं सावित्री और गायत्री के पृथक्-पृथक् स्वरूपों का भी वर्णन मिलता है। इन्होंने ही प्राणों का त्राण किया था, इसलिये भी इनका गायत्री नाम प्रसिद्ध हुआ। उपनिषदों में भी गायत्री और सावित्री की अभिन्नता का वर्णन है- गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयात्। गायत्री ज्ञान-विज्ञान की मूर्ति हैं। ये द्विजाति मात्र की आराध्या देवी हैं। इन्हें परब्रह्मस्वरूपिणी कहा गया है। वेदों, उपनिषदों और पुराणादि में इनकी विस्तृत महिमा का वर्णन मिलता है।  उपासना गायत्री की उपासना तीनों कालों में की जाती है, प्रात: मध्याह्न और सायं। तीनों कालों के लिये इनका पृथक्-पृथक् ध्यान है। प्रात:काल ये सूर्यमण्डल के मध्य में विराजमान रहती है। उस समय इनके शरीर का रंग लाल रहता है। ये अपने दो हाथों में क्रमश: अक्षसूत्र और कमण्डलु धारण करती हैं। इनका वाहन हंस है तथा इनकी कुमारी अवस्था है। इनका यही स्वरूप ब्रह्मशक्ति गायत्री के नाम से प्रसिद्ध है। इसका वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त होता है। मध्याह्न काल में इनका युवा स्वरूप है। इनकी चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। इनके चारों हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते हैं। इनका वाहन गरूड है। गायत्री का यह स्वरूप वैष्णवी शक्ति का परिचायक है। इस स्वरूप को सावित्री भी कहते हैं। इसका वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। सायं काल में गायत्री की अवस्था वृद्धा मानी गयी है। इनका वाहन वृषभ है तथा शरीर का वर्ण शुक्ल है। ये अपने चारों हाथों में क्रमश: त्रिशूल, डमरू, पाश और पात्र धारण करती हैं। यह रुद्र शक्ति की परिचायिका हैं इसका वर्णन सामवेद में प्राप्त होता है। ब्रह्मस्वरूपा गायत्री  गायत्री तपोभूमि, मथुरा Gayatri Tapobhumi, Mathura इस प्रकार गायत्री, सावित्री और सरस्वती एक ही ब्रह्मशक्ति के नाम हैं। इस संसार में सत-असत जो कुछ हैं, वह सब ब्रह्मस्वरूपा गायत्री ही हैं। भगवान व्यास कहते हैं- 'जिस प्रकार पुष्पों का सार मधु, दूध का सार घृत और रसों का सार पय है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का सार है। गायत्री वेदों की जननी और पाप-विनाशिनी हैं, गायत्री-मन्त्र से बढ़कर अन्य कोई पवित्र मन्त्र पृथ्वी पर नहीं है। गायत्री-मन्त्र ऋक्, यजु, साम, काण्व, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय आदि सभी वैदिक संहिताओं में प्राप्त होता है, किन्तु सर्वत्र एक ही मिलता है। इसमें चौबीस अक्षर हैं। मन्त्र का मूल स्वरूप इस प्रकार है- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।[1] अर्थात् 'सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के प्रसिद्ध वरण करने योग्य तेज़ का (हम) ध्यान करते हैं, वे परमात्मा हमारी बुद्धि को (सत् की ओर) प्रेरित करें। गायत्री भाष्य याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों ने जिस गायत्री भाष्य की रचना की है वह इन चौबीस अक्षरों की विस्तृत व्याख्या है। इस महामन्त्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र हैं। गायत्री-मन्त्र के चौबीस अक्षर तीन पदों में विभक्त हैं। अत: यह त्रिपदा गायत्री कहलाती है। गायत्री दैहिक, दैविक, भौतिक त्रिविध तापहन्त्री एवं परा विद्या की स्वरूपा हैं। यद्यपि गायत्री के अनेक रूप हैं। परन्तु शारदातिलक के अनुसार इनका मुख्य ध्यान इस प्रकार है- भगवती गायत्री के पाँच मुख हैं, जिन पर मुक्ता, वैदूर्य, हेम, नीलमणि तथा धवल वर्ण की आभा सुशोभित है, त्रिनेत्रों वाली ये देवी चन्द्रमा से युक्त रत्नों का मुकुट धारण करती हैं तथा आत्मतत्त्व की प्रकाशिका हैं। ये कमल के आसन पर आसीन होकर रत्नों के आभूषण धारण करती हैं। इनके दस हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, कमलयुग्म, वरद तथा अभयमुद्रा, कोड़ा, अंकुश, शुभ्र कपाल और रुद्राक्ष की माला सुशोभित है। ऐसी भगवती गायत्री का हम भजन करते हैं।  इन्हें भी देखें: गायत्री मन्त्र, गायत्री चालीसा एवं गायत्री माता की आरती

शीतला माता

मुख्य मेनू खोलें  खोजें संपादित करेंइस पृष्ठ का ध्यान रखेंकिसी अन्य भाषा में पढ़ें शीतला देवी  शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। इनका प्राचीनकाल से ही बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन्हें चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है। इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व होता है। चेचक का रोगी व्यग्रता में वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत: कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है।[1] शीतला माता के संग ज्वरासुर- ज्वर का दैत्य, ओलै चंडी बीबी - हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण- त्वचा-रोग के देवता एवं रक्तवती - रक्त संक्रमण की देवी होते हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है।[2] शीतला माता  शीतला माता चेचक संबंधित शक्ति अवतार अस्त्र-शस्त्र कलश, सूप, झाड़ू, नीम के पत्ते जीवनसाथी शिव वाहन गर्दभ द वा ब स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है: “ वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।। मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।। „ अर्थात गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी झाडू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से हमारा तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है।[3] मान्यता अनुसार इस व्रत को करनेसे शीतला देवी प्रसन्‍न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्रों के समस्त रोग, शीतलाकी फुंसियों के चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं।[1] श्री शीतला चालीसा संपादित करें  अगम कुआं, पटना, बिहार स्थित शीतला माता मंदिर  दोहा जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान। होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ॥ घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ॥ चालीसा जय जय श्री शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणधानी ॥ गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती। पूरन शरन चंद्रसा साजती ॥ विस्फोटक सी जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥ मात शीतला तव शुभनामा। सबके काहे आवही कामा ॥ शोक हरी शंकरी भवानी। बाल प्राण रक्षी सुखदानी ॥ सूचि बार्जनी कलश कर राजै। मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥ चौसट योगिन संग दे दावै। पीड़ा ताल मृदंग बजावै ॥ नंदिनाथ भय रो चिकरावै। सहस शेष शिर पार ना पावै ॥ धन्य धन्य भात्री महारानी। सुर नर मुनी सब सुयश बधानी ॥ ज्वाला रूप महाबल कारी। दैत्य एक विश्फोटक भारी ॥ हर हर प्रविशत कोई दान क्षत। रोग रूप धरी बालक भक्षक ॥ हाहाकार मचो जग भारी। सत्यो ना जब कोई संकट कारी ॥ तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा। कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा ॥ विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो। मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो ॥ बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा। मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा ॥ अब नही मातु काहू गृह जै हो। जह अपवित्र वही घर रहि हो ॥ पूजन पाठ मातु जब करी है। भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥ अब भगतन शीतल भय जै हे। विस्फोटक भय घोर न सै हे ॥ श्री शीतल ही बचे कल्याना। बचन सत्य भाषे भगवाना ॥ कलश शीतलाका करवावै। वृजसे विधीवत पाठ करावै ॥ विस्फोटक भय गृह गृह भाई। भजे तेरी सह यही उपाई ॥ तुमही शीतला जगकी माता। तुमही पिता जग के सुखदाता ॥ तुमही जगका अतिसुख सेवी। नमो नमामी शीतले देवी ॥ नमो सूर्य करवी दुख हरणी। नमो नमो जग तारिणी धरणी ॥ नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी। दुख दारिद्रा निस निखंदिनी ॥ श्री शीतला शेखला बहला। गुणकी गुणकी मातृ मंगला ॥ मात शीतला तुम धनुधारी। शोभित पंचनाम असवारी ॥ राघव खर बैसाख सुनंदन। कर भग दुरवा कंत निकंदन ॥ सुनी रत संग शीतला माई। चाही सकल सुख दूर धुराई ॥ कलका गन गंगा किछु होई। जाकर मंत्र ना औषधी कोई ॥ हेत मातजी का आराधन। और नही है कोई साधन ॥ निश्चय मातु शरण जो आवै। निर्भय ईप्सित सो फल पावै ॥ कोढी निर्मल काया धारे। अंधा कृत नित दृष्टी विहारे ॥ बंधा नारी पुत्रको पावे। जन्म दरिद्र धनी हो जावे ॥ सुंदरदास नाम गुण गावत। लक्ष्य मूलको छंद बनावत ॥ या दे कोई करे यदी शंका। जग दे मैंय्या काही डंका ॥ कहत राम सुंदर प्रभुदासा। तट प्रयागसे पूरब पासा ॥ ग्राम तिवारी पूर मम बासा। प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा ॥ अब विलंब भय मोही पुकारत। मातृ कृपाकी बाट निहारत ॥ बड़ा द्वार सब आस लगाई। अब सुधि लेत शीतला माई ॥ यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय। सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय ॥ बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू। जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू ॥ ॥ इति ॥ श्री शीतला माता जी की आरती संपादित करें जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता | जय रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता, ऋद्धिसिद्धि चंवर डोलावें, जगमग छवि छाता | जय विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता, वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता | जय इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा, सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता | जय घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता, करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता | जय ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता, भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता | जय जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता, सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता | जय रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता, कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता | जय बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता, ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता | जय शीतल करती जननी तुही है जग त्राता, उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता | जय दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता, भक्ति आपनी दीजै और न कुछ भाता | जय [4] सन्दर्भ संपादित करें ↑ अ आ शीतलाष्टमी - चैत्र कृष्ण अष्टमी। रीति.कॉम ↑ शीतला देव- अंग्रेज़ी विकी पर ↑ कष्ट हरने वाली देवी शीतला। याहू जागरण ↑ श्री शीतला माता जी की आरती (SHRI SHEETLA MATA JI KI AARTI) बाहरी कड़ियाँ संपादित करें शीतला माता मंदिर, गुड़गांव श्री शीतला माता मंदिर, गुड़गांव शीतला माता- शीतला कवच श्री शीतलाष्टक शीतला माता की आरती एमपी३ फॉर्मैट में डाउनलोड करें Last edited 4 months ago by Sanjeev bot RELATED PAGES हनुमान चालीसा शीतला अष्टमी चित्रगुप्त चालीसा  सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। गोपनीयताडेस्कटॉप

Saturday, 27 May 2017

हम सब प्राप्त कर सकते हैं: पूर्णता

Toggle navigation धर्म हम सब प्राप्त कर सकते हैं: पूर्णता Posted on Jun-2016 by श्री श्री आनंदमूर्ति धर्म FacebookTwitterWhatsApp  किसी के अंदर छिपी हुई भक्ति और जीवन को पवित्र और आध्यात्मिक बनाने की प्रबल शक्ति ही महत्वपूर्ण तत्व है। उसके बाद की सारी व्यवस्था ईश्वर स्वयं कर देते हैं। हमने पढ़ा है कि रत्नाकर और अंगुलिमाल जैसे भयानक अपराधी भी, जिन्होंने अपने जीवन में अनेक अपराध किए, बाद में भगवान के परम भक्त बन गए और सर्वोत्तम मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए। जब इस प्रकार के कठोर अपराधी भी इतने अल्प समय में एक पवित्र आध्यात्मिक मनुष्य बन गए, तब कोई कारण नहीं है कि दूसरे लोग भी ईश्वर की यह कृपा प्राप्त न कर सकें। सभी स्त्री-पुरुष ईश्वर की यह कृपा प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि सभी स्त्री-पुरुषों के साथ ईश्वर की कृपा और करुणा निरंतर बनी हुई है। जिस प्रकार मनुष्यों के प्रति ईश्वर का कर्तव्य है, उसी प्रकार मनुष्यों का कर्त्तव्य भी ईश्वर के प्रति है। मनुष्यों को केवल वह कर्म करना है, जो ईश्वर को आनंद देता है। ईश्वर कभी भी पापी और पुण्यात्मा के बीच भेद नहीं करते। अगर ईश्वर चाहे तो वह तथाकथित पापी मनुष्य को भी क्षण भर में एक महान भक्त बना सकता है। अनेक दोषों और गलतियों के बावजूद भी मनुष्य दैवी प्राणी है। अपनी सारी कमियों के बावजूद वह भगवान का ही व्यक्त रूप है। प्रत्येक वस्तु ही दैवी सृष्टि है और सभी में एक दिन पूर्णता प्राप्त करने की सम्भावना है। हम अभी जो कुछ हैं, वह हमारे पूर्व के विचारों और कर्मों का परिणाम है और भविष्य में हम जो कुछ होंगे, वह हमारे पूर्व के विचारों और कर्मों का परिणाम होगा। हमारे अतीत के कर्म ही हमारे वर्तमान को निर्धारित करते हैं और हमारे वर्तमान के विचार और कर्म ही हमारे भविष्य को निर्धारित करेंगे। कोई भी सांसारिक पदार्थ या मनुष्य हमारा स्थायी साथी या सम्बंधी नहीं है। यही कारण है कि बुद्धिमान मनुष्य मानते हैं कि ईश्वर की उपलब्धि ही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। जब मनुष्य सभी स्थूल सांसारिक पदार्थों से अपनी मानसिक वृत्तियों को वापस खींच लेता है और उसे ईश्वर की ओर मोड़ देता है, तब उसे अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है। ईश्वर के प्रति गहन भावना की निरंतरता उसे आध्यात्मिक आनंद में विभोर कर देती है। प्रत्येक साधक, चाहे उसका अतीत कितना भी मलिन और निंदनीय क्यों न रहा हो, वह आध्यात्मिक अनुभूति को पाने का अधिकारी है। जब साधक अपने चारों ओर दैवी वातावरण और उस स्रोत, जहां से दैवी अस्तित्व की तरंगे प्रसारित हो रही हैं, की अनुभूति करता है, तब आनंद-अनुभूति की दशा को 'भाव' कहते हैं। भाव का अतिरेक होने से भक्ति का प्रकाशन हृदय में ज्यादा होता है। जैसे बाढ़ के समय सारी नदियां, तालाब, झरने आदि पानी से भर जाते हैं और पानी ऊपर से बहने लगता है, वैसे ही भाव के अति प्रवाह से साधक का मन व हृदय भक्ति से आप्लावित हो जाते हैं।  हैप्पी क्रिसमस ... Dec-2016  देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी Nov-2016  'क्रांतिकारी साधु' से बने जगद्गुरू शंकराचार्य Oct-2016  सही मार्गदर्शन से होगी परम की प्राप्ति Sep-2016  'क्रांतिकारी साधु’ से बने जगद्गुरू शंकराचार्य Sep-2016  सही मार्गदर्शन से होगी परम की प्राप्ति Aug-2016  रामकथा के अप्रतिम रचयिता गोस्वामी तुलसीदास Aug-2016  सनातन संस्कृति का उदात्त स्वरूप नाग पूजन Aug-2016  गंगा- जमुनी संस्कृति का जीवंत प्रतीक नौचंदी मेला Jul-2016  तमसो माँ ज्योतिर्गमय Jul-2016  आत्मा और परमात्मा के संबंध की खोज है Jul-2016  रामदूत अतुलित बलधामा Jun-2016  पापों से मुक्ति का पर्व गंगा दशहरा Jun-2016  हम सब प्राप्त कर सकते हैं: पूर्णता Jun-2016  एक है मानव समाज का धर्म May-2016  आस्था का महापर्व: सिंहस्थ कुंभ मेला May-2016  परमात्मा से अपना रंग मिलाने का त्योहार Mar-2016  सृष्टि के प्रारंभ का पर्व महाशिवरात्रि Mar-2016  ऐतिहासिक सांस्कृतिक के रूप में एक और दक्षिण काशी श Mar-2016  धार्मिक व सामाजिक परंपराओं का उदात्त स्वरूप है होल Mar-2016   Copyright © Mission Tehkikat 2016 Term & Condition| About Us| Degital Magazine| Contact Us डिजिटल मैगज़ीन 

धर्म तमसो माँ ज्योतिर्गमय

 Toggle navigation धर्म तमसो माँ ज्योतिर्गमय Posted on Jul-2016 by अर्जुन सिंह धर्म FacebookTwitterWhatsApp  भारत वर्ष पर्व एवं सूघर परंपराओं का देश है। यहां पर हर दिन पर्व मनाया जाता है। इस पवित्र देश में मनाया जाने वाला हर पर्व का अपना महत्व है, लेकिन गुरू पूर्णिमा की महत्ता विशेष है। यह पर्व व्यास पूर्णिमा के नाम से भी विख्यात है। इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा जगत गुरु माने जाने वाले वेद व्यास को समर्पित है। माना जाता है कि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ मास की पूर्णिमा को हुआ था। वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेदव्यास ने इसी दिन की थी। वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था। महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों और भागवत पुराण के रचनाकार भी वेद व्यास ही थे। देश के विभिन्न हिस्सों में गुरू पूर्णिमा का पर्व अलग- अलग तरीके से मनाया जाता है। इस पर्व पर बृज की महिमा अलग ही दिखती है। ब्रज में इसे 'मुड़िया पर्व ' कहा जाता है। गोवर्धन पर्वत की लाखों श्रद्धालु परिक्रमा करतेहैं। बंगाली साधु सिर मुंडाकर परिक्रमा करते हैं, क्योंकि इसी दिन सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था। वैसे तो 'व्यास' नाम के कई विद्वान हुए हैं, लेकिन चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता व्यास ऋषि की पूजा इसी दिन की जाती है। मनुष्य को वेदों का ज्ञान देने वाले व्यास जी ही थे। इसलिए वे हमारे 'आदिगुरु' हुए। आदि गुरू की स्मृति को बनाए रखने के लिए अपने-अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा का विधान है। प्राचीन काल में विद्यार्थी इस दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा किया करते थे। इस दिन गुरु के अलावा वरिष्ठ परिजनों अर्थात माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझना चाहिए। गुरु पूर्णिमा का महत्व गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं। गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरु पूर्णिमा। गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती। जो स्वयं में पूर्ण है, तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है। गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है। गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है। ऐसा सनातन विश्वास है। गुरु की महिमा सनातन परंपरा के अनुसार गुरु को गोविंद से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। शास्त्रों में गु का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ उसका निरोधक बताया गया है। इसीलिए कहा जाता है कि गुरु अपने शिष्य को अज्ञान रूपी तिमिर को हटाकर प्रकाश की ओर अग्रसर करता है। सनातन मान्यता के अनुसार सद्गरू की कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। ''तमसो मा ज्योतिगर्मय' अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुत्व है। आगम-निगम-पुराण का निरंतर संपादन ही व्यास रूपी सद्गुरू शिष्य को परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार का माध्यम है। वर्तमान में जितनी भी वैश्विक समस्याएं हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना । आज विद्या का लक्ष्य 'मोक्ष' न होकर धनार्जन हो गया है। इसी का परिणाम है कि अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचारादि और सबसे बढ़कर आतंकवाद का प्रसार तेजी से हो रहा है। व्रत का विधान सनातन परंपरा के अनुसार गुरू पूर्णिमा के दिन प्रात:काल स्नान- पूजा आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तथा शुद्ध व उत्तम वस्त्र धारण कर तैयार हो जाएं। घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए। इसके बाद गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए। सकंल्प के बाद दसों दिशाओं में अक्षत छोडऩा चाहिए। फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए। अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए। गुरु पूजन का मन्त्र है- गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:। गुरु साक्षातपरब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:।। इस पावन पर्व पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना उत्तम है।  हैप्पी क्रिसमस ... Dec-2016  देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी Nov-2016  'क्रांतिकारी साधु' से बने जगद्गुरू शंकराचार्य Oct-2016  सही मार्गदर्शन से होगी परम की प्राप्ति Sep-2016  'क्रांतिकारी साधु’ से बने जगद्गुरू शंकराचार्य Sep-2016  सही मार्गदर्शन से होगी परम की प्राप्ति Aug-2016  रामकथा के अप्रतिम रचयिता गोस्वामी तुलसीदास Aug-2016  सनातन संस्कृति का उदात्त स्वरूप नाग पूजन Aug-2016  गंगा- जमुनी संस्कृति का जीवंत प्रतीक नौचंदी मेला Jul-2016  तमसो माँ ज्योतिर्गमय Jul-2016  आत्मा और परमात्मा के संबंध की खोज है Jul-2016  रामदूत अतुलित बलधामा Jun-2016  पापों से मुक्ति का पर्व गंगा दशहरा Jun-2016  हम सब प्राप्त कर सकते हैं: पूर्णता Jun-2016  एक है मानव समाज का धर्म May-2016  आस्था का महापर्व: सिंहस्थ कुंभ मेला May-2016  परमात्मा से अपना रंग मिलाने का त्योहार Mar-2016  सृष्टि के प्रारंभ का पर्व महाशिवरात्रि Mar-2016  ऐतिहासिक सांस्कृतिक के रूप में एक और दक्षिण काशी श Mar-2016  धार्मिक व सामाजिक परंपराओं का उदात्त स्वरूप है होल Mar-2016   Copyright © Mission Tehkikat 2016 Term & Condition| About Us| Degital Magazine| Contact Us डिजिटल मैगज़ीन