Friday, 13 October 2017

मानसिक गायत्री-जप और सूर्यार्घ्य विहित है

मुख्य मेनू खोलें Wikibooks खोजें संपादित करेंइस पृष्ठ का ध्यान रखें पुराण और इतिहास पुराण और इतिहास भारतीय इतिहास संकलन समिति गोरक्षप्रान्त, उत्तर प्रदेश सम्पादक मण्डल प्रदीप कुमार राव मिथिलेश कुमार तिवारी ओमजी उपाध्याय रत्नेश कुमार त्रिपाठी महेश नारायण त्रिगुणायत इन्द्रा पब्लिकेशन्स नयी दिल्ली-गोरखपुर ISBN 978.81.921516.03 प्रथम संस्करण, गुरुपूर्णिमा, 2012 परामर्श प्रो. माता प्रसाद त्रिपाठी प्रो. अशोक श्रीवास्तव श्री बाल मुकुन्द पाण्डेय सम्पादक मण्डल प्रदीप कुमार राव मिथिलेश कुमार तिवारी ओमजी उपाध्याय रत्नेश कुमार त्रिपाठी महेश नारायण त्रिगुणायत मूल्य मूल्य रु. 50/- प्रकाशक इन्द्रा पब्लिकेशन्स * जी-19, द्वितीय तल_ विजय चौक लक्ष्मीनगर, दिल्ली-110092 : +91-9911042001 * इन्द्रा निकेतन, दक्षिणी हुमायूँपुर गोरखपुर, 273001, +91-7668402925 e-mail: indrapublications@gmail.com नमस्तस्मै मुनीशाय तपोनिष्ठाय धीमते। वीतरागाय कवये व्यासायामिततेजसे॥ तं नमामि महेशानं मुनिं धर्मविदां वरम्। श्यामं जटाकलापेन शोभमानं शुभाननम्॥ मुनीन सूर्यप्रभान् धर्मान् पाठयन्तं सुवर्चसम्। नानापुराणकर्तारं वेदव्यासं महाप्रभम्॥ (बृहद्धर्मपुराण, 1.1.23-25) जो तपोनिष्ठ, मुनीश्वर, अमित तेजस्वी, महाकवि, राग से सर्वथा शून्य तथा अत्यन्त निर्मल बुद्धि से संयुक्त एवं महामुनि शिवस्वरूप, श्यामवर्ण के हैं, जिनका मुखमण्डल जटाजूट से सुशोभित है, और जो ध र्मज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं तथा सूर्य के सामान प्रभा वाले मुनियों को धर्मशास्त्रों का पाठ पढ़ाने वाले हैं, ज्योतिर्मय हैं, अत्यन्त कान्तिमान हैं, सभी पुराणों तथा उपपुराणों के रचयिता हैं, उन महाप्रभु वेदव्यास को बारम्बार नमस्कार है। भारतीय इतिहास संकलन योजना मुद्रक कमल ऑफसेट प्रिन्टर्स दुर्गाबाड़ी, गोरखपुर-273001 साम्राज्यवादी एवं साम्यवादी इतिहासकारों द्वारा बन्धक बनाये गये भारतीय इतिहास को वैश्विक इतिहास के मंच पर तथ्यों-प्रमाणों के साथ मुक्त कराकर भारत के वास्तविक इतिहास लेखन को समर्पित प्रतिष्ठित, तपस्वी एवं राष्ट्रभक्त इतिहासकारों- प्रो0 शिवाजी सिंह प्रो0 सतीशचन्द्र मित्तल डॉ0 राजेन्द्र सिंह कुशवाहा प्रो0 ठाकुर प्रसाद वर्मा डॉ0 कुँवर बहादुर कौशिक के दीर्घायु होने की कामना के साथ उनके शुभाभिनन्दन में समर्पित। 6  ;सम्पादकीय सामाजिक-मानविकी विषयों में ‘इतिहास’ विषय का अनेक दृष्टियों एवं कारणों से अपना अलग महत्त्व है। अन्य विषयों से यह विषय और महत्त्वपूर्ण इसलिए हो जाता है कि यह विषय सभी राष्ट्रों-समाजों का अस्तित्व, उनकी पहचान, उनकी विरासत का उद्घाटन करते हुए उस राष्ट्र-समाज के मान-सम्मान, उसकी श्रेष्ठता-न्यूनता आदि का विवेचन प्रस्तुत करता है। इतिहास के ही पन्नों से वह राष्ट्र एवं समाज अपने पूर्वजों, अपने अतीत एवं अपनी विरासत की श्रेष्ठतम विशेषताओं पर गर्व करता है तो कमियों से सीख लेता है। अतीत से भी प्रशस्त वर्तमान के निर्माण के लिए वह राष्ट्र एवं समाज अपने अतीत की विशिष्टताओं से प्रेरणा ग्रहण करता है। सभ्यताओं के श्रेष्ठतावादी संघर्ष में इन्हीं कारणों से ‘इतिहास’ महत्त्वपूर्ण हो जाता है। परिणामतः ‘इतिहास रचना’ में इतिहासकार एवं उसकी दृष्टि की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इतिहास क्या है? इतिहास लेखन में तथ्य एवं इतिहासकार की भूमिका क्या है? इन प्रश्नों पर अनवरत विचार होता रहा है। इतिहास की मनगढ़न्त व्याख्या करने वाले इतिहासकार भी यही दावा करते हैं कि इतिहास विज्ञान है और इतिहास लेखन की पद्धति वैज्ञानिक होनी चाहिए। इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या के समर्थक साम्यवादी इतिहासकारों की जमात भी यही ढोल पीटती है, किन्तु वास्तविकता में राज्याश्रित इतिहास, पाल्य इतिहासकारों द्वारा राज्य की रुचि, उसके उद्देश्य की पूर्ति के लिए निर्मित दृष्टि के अनुसार खींचे गये साँचे के अनुरूप तथ्य संग्रह कर लिखा गया इतिहास होता है, क्योंकि राज्याश्रित इतिहास लेखन शासन द्वारा पहले से तय किये गये एजेण्डे के अनुरूप होता है। साम्यवादी विचारधारा से प्रतिबद्ध इतिहासकारों पर भी यही बात लागू होती है। यद्यपि कि सच यही है कि ‘इतिहास’ विज्ञान नहीं है, वह विज्ञान हो भी नहीं सकता, उसका विज्ञान होना ही उसे अप्रासंगिक बना देता है। विज्ञान भौतिक पदार्थों की रचना का शास्त्र है, इतिहास मानव रचना का शास्त्र है। विज्ञान यन्त्र बनाने का शास्त्र है तो इतिहास चेतना निर्मित करने का शास्त्र है। विज्ञान सभ्यता-निर्मिति का शास्त्र है तो इतिहास संस्कृतियों की निर्मिति एवं उसकी सातत्यता बनाये रखने का शास्त्र है। वर्तमान समाज को गढ़ने के लिए अतीत से मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रेरणा-स्रोत होना ही इतिहास को प्रासंगिक बनाता है। ऐसे में इतिहास रचना के अन्तर्गत समकालीन इतिहासकार द्वारा तथ्यों पर आधारित अतीत के राष्ट्र-समाज एवं उसके अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का वह वास्तविक चित्र प्रस्तुत करना होता है जिससे कि वह राष्ट्र-समाज अपना वर्तमान अतीत से भी बेहतर गढ़ सके और वर्तमान से भी बेहतर भविष्य निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सके अथवा उसका सपना देख सके। अतः किसी भी राष्ट्र-समाज द्वारा इतिहास की रचना इसी दृष्टि से की जानी चाहिए तभी उसकी प्रासंगिकता है। अतः इतिहास रचना में जितना महत्त्वपूर्ण ‘तथ्य’ है उतना ही महत्त्वपूर्ण भूमिका ‘इतिहासकार’ की है। वह शास्त्र जिसकी रचना में मानव मस्तिष्क और चेतना का उपयोग होगा, वह शास्त्र रचने वाले व्यक्ति की सोच, उसके मानस के प्रभाव से अछूता रहेगा यह काल्पनिक हो सकता है वास्तविक नहीं। इतिहासकार के दृष्टि की प्रभावी भूमिका के कारण ही ‘इतिहास लेखन’ एवं ‘इतिहास रचना’ सदैव विवादास्पद रही है। विशेषतः ‘भारत का इतिहास’ अंग्रेज शासकों, उनके पाल्य इतिहासकारों एवं स्वतन्त्र भारत में उनके उत्तराधिकारी इतिहासकारों द्वारा ‘विशेष उद्देश्य’ एवं ‘विशेष दृष्टि’ से लिखा गया। रही-सही कमी पूरा किया स्वतन्त्र भारत के साम्यवादी इतिहासकारों की दृष्टि ने। वस्तुतः भारत का इतिहास पाश्चात्य के श्रेष्ठतावाद की कुण्ठा एवं साम्यवादी इतिहासकारों के ऐतिहासिक भौतिकवाद का शिकार हुआ। परिणामतः भारत का विपुल धार्मिक साहित्य, यथा- वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृतियाँ, अष्टाध्यायी, अर्थशास्त्र, रामायण, महाभारत, आदि का ऐतिहासिक स्रोत के रूप में उपयोग इतिहासकारों द्वारा सुविधानुसार किया गया। अर्थात् यदि भारत को गाली देना है तो उपर्युक्त ग्रन्थ के सन्दर्भित उल्लेख तथ्य हैं, किन्तु भारत की गौरव-गाथा के सन्दर्भ में उन्हीं ग्रन्थों के उल्लेख इन इतिहासकारों द्वारा कपोल-कल्पित घोषित किये जाते रहे। एक ही ग्रन्थ एक सन्दर्भ में ‘प्रमाण’ बना तो दूसरे सन्दर्भ में वही ग्रन्थ ‘बकवास’ कह दिया गया। इतिहासकारों की इसी दृष्टि-दोष के शिकार ‘भारतीय इतिहास’ के अनेक उज्ज्वल अध्याय यद्यपि कि राष्ट्रवादी इतिहासकारों के प्रयासों से प्रकाशित हुए तथापि भारत का सम्पूर्ण इतिहास आज भी दोषपूर्ण है, इतिहासकारों के दृष्टि-दोष का शिकार है। भारत की वर्तमान एवं भावी पीढ़ी को प्रेरणा देने की दृष्टि से असफल है। ब्रिटिश शासकों एवं साम्राज्यवादी-साम्यवादी इतिहासकारों द्वारा भारत का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक जीवन का इतिहास जान-बूझकर विकृत किया गया। इतिहास रचना में तथ्य को महत्त्वपूर्ण मानने वाले, तथ्याधारित प्रामाणिक इतिहास-रचना की घोषणा करने वाले इतिहासकारों ने ही ‘तथ्यों’ के चुनाव, उनकी व्याख्या में अपनी दृष्टि को महत्त्वपूर्ण माना और जो चाहा उसके अनुसार तथ्यों का संकलन किया। भारत के विपुल साहित्य से प्राप्त उज्ज्वल पक्षों को परम्परा, प्रगति-विरोधी एवं कल्पित कहकर उन्हें भारतीय इतिहास का हिस्सा ही नहीं बनने दिया। डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘पश्चिमी एशिया एवं ऋग्वेद’ की भूमिका लिखते हुए श्री श्याम कश्यप ने ठीक ही लिखा है कि- "इधर हम लोग समकालीनता के प्रति उत्साह से कुछ इस कदर आक्रान्त हैं कि इतिहास और परम्परा का तिरस्कार ‘आधुनिक’ होने की प्रथम शर्त बन गया है। साहित्य, कला, संस्कृति से लेकर शिक्षा तक सभी क्षेत्रों में इसी फैशन की छूत फैली हुई है।" भारतीय इतिहास को भारत-विरोधी दृष्टि में कैद करने वाले इतिहासकारों की भूमिका को प्रकारान्तर से रेखांकित करते हुए प्रो. शिवाजी सिंह अपनी पुस्तक ‘प्राग्वैदिक आर्य और सरस्वती-सिन्धु सभ्यता’ के आमुख में हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए लिखते हैं- "हमारी इतिहास-चेतना का निर्माण जिस इतिहास के आधार पर होता है उसके दो रूप हैं। एक इतिहास वह है जो किसी देश-काल के सन्दर्भ में घटित हुआ है। यह ऐतिहासिक यथार्थ है, इतिहास का सच, जो सदैव एक ही होता है और बदला नहीं जा सकता। दूसरा इतिहास यह है जो इतिहासकारों द्वारा लिखा गया है या लिखा जा रहा है। यह विविध प्रकार का दिखाई देता है और अक्सर संशोधित होता रहता है। घटित और लिखित इतिहासों के बीच इस विसंगति से अक्सर सम्भ्रमात्मक स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जिनसे इतिहास-चेतना के समुचित निर्माण में बाधा पड़ती है। किन्तु यह विसंगति क्यों, ऐतिहासिक यथार्थ एक, पर व्याख्याएँ अनेक क्यों? .....इतिहास निरूपण के सर्वोपरि नियामक तथ्य और प्रमाण हैं, इतिहासकार नहीं। इतिहास की स्वाभाविक संरचना में व्यतिक्रम तब प्रारम्भ होता है जब कोई इतिहासकार या इतिहासकारों का कोई समूह एक न्यायाधीश का रूप धारण किये हुए भी एक अधिवक्ता की तरह आचरण करने लगता है, जिसका उद्देश्य सत्य का निश्चयन नहीं अपितु अपने ग्राहक का पक्षपोषण होता है। वह तथ्यों और प्रमाणों की अनदेखी करने, उन्हें दबाने अथवा तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने का अभ्यस्त हो जाता है। फलतः इतिहास का विरूपीकरण होने लगता है। भारतीय इतिहास में जो विकृतियाँ दृष्टिगत होती हैं वे सब इन्हीं ‘अधिवक्ता छाप’ इतिहासकारों की देन है। राजनीतिक स्वार्थों और पूर्वाग्रहों से अभिप्रेरित एवं प्रतिबद्ध इन इतिहासकारों में प्रमुख हैं एक तो वे उपनिवेशवादी-मिशनरी लेखक जिन्होंने भारत में अपने राजनीतिक-धार्मिक वर्चस्व की स्थापना के लिए इस देश के इतिहास को विकृत किया, और दूसरे वे मार्क्सवादी विचारक जिनकी मताग्रही संकीर्ण सोच यह स्वीकार नहीं कर पाती कि मूलतः आध्यात्मिक नींव पर आधारित भारतीय संस्कृति के इतिहास की सम्यक व्याख्या भौतिकवादी दृष्टि से सम्भव नहीं है। अधिवक्तृता में ये इतिहासकार पारंगत रहे हैं और उन्हें राज्याश्रय भी प्राप्त रहा है। समाज में वे प्रायः आधिकारिक इतिहासकारों के रूप में प्रायोजित रहे हैं।" वस्तुतः ब्रिटिश भारत में उपनिवेशवादी-मिशनरी इतिहासकारों को राज्याश्रय प्राप्त था तो स्वतन्त्र भारत (नेहरू-इन्दिरा-सोनिया के भारत) में मार्क्सवादी इतिहासकार राजकीय संरक्षण में पुष्पित-पल्लवित हैं और भारत के सभी प्रमुख शिक्षण-प्रशिक्षण एवं उनसे सम्बन्धित संस्थानों पर वर्चस्व बनाए हुए हैं। उनके प्रभाव शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाये जाने वाले इतिहास के पाठ्यक्रमों के निर्माण एवं इतिहास रचना में आज भी देखा जा सकता है। सनातन युग से भारतीय समाज में आस्था के केन्द्र वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियों की इनके द्वारा मनमानी व्याख्या- उदाहरणार्थ वैदिक आर्य गोमांस खाते थे, हनुमान एक बन्दर था जो लंका के घरों में ताक-झांक करता था, इत्यादि- कर प्रगतिशील एवं धर्मनिरपेक्ष इतिहासकार होने का स्वांग रचा जाता है। इतिहास को वैज्ञानिक, तथ्यपूर्ण, निष्पक्ष होना चाहिए, का डंका पीटने वाले इन इतिहासकारों द्वारा ही ‘भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद्’ की सरकारी संस्था पर कब्जा कर ‘भारतीय इतिहास’ लेखन को ‘हिन्दू विरोध’ या यह कहा जाय कि ‘भारत विरोध’ पर केन्द्रित कर दिया गया। इसी अभियान के साथ ‘साम्यवाद’ के पक्षधर इतिहासकारों एवं राजनीतिक शक्ति का एक ऐसा संघ गठित एवं विकसित हुआ, जिसमें सम्मिलित होना ही आधिकारिक इतिहासकार होने का प्रमाण-पत्र पाना था। परिणामतः ‘भारत के इतिहास लेखन’ में भारतीयता विरोधी तथ्यों को ढूँढ़ने अथवा तथ्यों की भारतीयता विरोधी व्याख्या करने की होड़ मची रही। इन तथ्यों की पुष्टि अरुण शौरी द्वारा लिखी गयी पुस्तक- एमिनेन्ट हिस्टोरियन्स, देयर टेक्नॉलॉजी, देयर लाइन, देयर फ्राड - के प्रामाणिक विवरण से स्पष्ट हो जाता है। अरुण शौरी ने भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् की स्थापना से लेकर सन् 1998 तक इस संस्था को गिरवी रखकर साम्यवादी विचारधारा पर केन्द्रित इतिहास रचना करने वाले तथाकथित आधिकारिक इतिहासकारों का सरकारी दस्तावेजों के प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है। ये तथ्य ही ‘भारतीय इतिहास’ की रचना करने एवं उन्हें पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किये जाने की योजना-रचना बनाने वाले कर्णधार इतिहासकारों का वास्तविक चेहरा सामने ला देते हैं और तब यह बात और साफ हो जाती है कि भारत का इतिहास जान-बूझकरषड्यन्त्रपूर्वक तोड़-मरोड़कर भारत-विरोधी सांचे में लिखा गया। डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘पश्चिमी एशिया एवं ऋग्वेद’ की भूमिका में इसी बात को स्वीकारते हुए श्याम कश्यप लिखते हैं- "भारत पर आर्यों के आक्रमण के गलत सिद्धान्त..... की नींव पर ही सारी कपोल-कल्पनाओं के महल खड़े किये गये हैं। इस खोखली नींव के एक बार भहराकर गिर जाने के बाद प्राचीन भारत के इतिहास का सारा रूपवादी ढाँचा ध्वस्त हो जाता है और तथाकथित सर्वमान्य धारणाएँ कोरी दन्तकथाएँ साबित हो जाती हैं।.....ये धारणाएँ और मान्यताएँ कभी सर्वमान्य रहीं भी नहीं। यह बात दीगर है कि भारत के स्कूलों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के तमाम पाठ्यक्रमों से लेकर इतिहासवेत्ताओं तक आमतौर से इन एकपक्षीय धारणाओं को ही सर्वमान्य बताकर इतिहास का एक गलत और हास्यास्पद ढाँचा सामने रखा जाता रहा है।.....इन धारणाओं के पीछे उपनिवेशवादी स्वार्थों की निहित भूमिका रही है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ऋग्वेद की मनमानी व्याख्या ...के प्रयास किये जाते रहे हैं। यह सभी कुछ एक सोचे-समझे और सुनियोजित साम्राज्यवादीषड्यन्त्र का हिस्सा रहा है।" अर्थात् ब्रिटिश शासन में जो भूमिका साम्राज्यवादी इतिहासकारों की थी स्वतन्त्र भारत में वही भूमिका साम्यवादी इतिहासकार निभा रहे हैं। परिणामतः आजादी के साढ़े छः दशक बाद भी भारत का पूर्वाग्रह रहित भारत केन्द्रित वास्तविक इतिहास भारत की सरकारी अनुदान से संचालित संस्थाओं द्वारा नहीं लिखा जा सका। अपितु इसके विपरीत भारतीय जनता के खून-पसीने की कमाई पर मौज करने वाले सरकारी संरक्षण प्राप्त इतिहासकारों के एक गिरोह द्वारा ‘वैज्ञानिक इतिहास लेखन’ के नाम पर भारत के अतीत का माखौल उड़ाने वाला इतिहास लिखा जाता रहा। इन तथाकथित प्रतिष्ठित तथा प्रगतिशील इतिहासकारों द्वारा ‘हिन्दू विरोधी-मुस्लिम समर्थक’ इतिहास का ढाँचा तैयार किया गया। इनके द्वारा लिखित ‘भारत के इतिहास’ से यह बात सिद्ध हो गयी कि ‘इतिहास लेखन’ में इतिहासकारों की भूमिका तथ्य और प्रमाण से महत्त्वपूर्ण है। इतिहासकार का ‘मानस’ अथवा उसकीषड्यन्त्रकारी दृष्टि तथ्यों की व्याख्या अपने अनुरूप कर इतिहास का स्वरूप बदल सकती है। कई बार ऐसा जान-बूझकर किया जाता है तो कभी-कभी ऐसा अनजाने में इतिहासकार के मानस के अनुसार होता है। इस बात को और स्पष्ट रूप से समझाने के लिए एक प्रसंग का उल्लेख प्रासंगिक होगा। ज्योतिष शास्त्र पर चर्चा के दौरान एक बार श्री अजय ओझा ने कहा कि ज्योतिष की गणनाओं का निष्कर्ष ज्योतिषी के सोच, उसकी समझ अथवा उसकी दृष्टि पर निर्भर करता है। जैसे कि एक बार ब्रह्मा ने अपने दो शिष्यों बृहस्पति और शुक्र को दर्शन एवं ज्योतिष का ज्ञान कराने के बाद व्यावहारिक प्रशिक्षण हेतु एक गाँव में भेजा। दोनों गाँव में घूमते-घूमते एक बुढ़िया के दरवाजे पर रुके। बुढ़िया का बेटा ज्ञानार्थ काशी गया हुआ था। बुढ़िया यह जानना चाहती थी कि उसका बेटा घर कब लौटेगा। दोनों ऋषियों को देखकर बुढ़िया ने अपना प्रश्न किया और ऋषिद्वय को पानी पिलाने हेतु कुएँ से जल निकालने लगी। जल निकालते समय रस्सी टूट गयी और जल-पात्र कुएँ के पानी में जा गिरा। इस घटना के साक्षी बृहस्पति ने कहा कि- तुम्हारा बेटा अब इस लोक में नहीं है जबकि शुक्र ने कहा कि तुम्हारा पुत्र ढाई घड़ी में तुम्हारे पास आ रहा है। दोनों का निष्कर्ष रस्सी के टूट जाने पर ही आधारित था। बृहस्पति का कहना था कि रस्सी टूट गयी अतः तुमसे तुम्हारे बेटे का सम्बन्ध टूट चुका है जबकि शुक्र कह रहे थे कि जल से उसका हिस्सा दूर खींचा जा रहा था किन्तु अलग हुआ जल रस्सी टूट जाने से अपने उद्गम में तुरन्त जा मिला। तथ्य एक ही है निष्कर्ष दो हैं। यद्यपि कि इस दो निष्कर्ष मेंषड्यन्त्र नहीं है। ऐसे ही इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो नासमझी में अथवा दशकों से बनाये गये विकृत इतिहास के साँचे से भ्रमित अनजाने मेंषड्यन्त्रकारी इतिहासकारों के गिरोह का समर्थक हो जा रहा है। भारतीय इतिहास लेखन के समक्ष यह कठिन चुनौती है। भारतीय इतिहास को विकृत करने वाले गिरोहबन्द इतिहासकार भारत का पूर्वाग्रह मुक्त वास्तविक इतिहास लिखेंगे यह कल्पना ही बेमानी है किन्तु बड़ी संख्या में इतिहासकारों का वह समूह जो इनके भ्रमजाल का शिकार है, उन्हें इनकेषड्यन्त्र से मुक्त कर भारत का तथ्यपूर्ण, वास्तविक एवं भारत केन्द्रित इतिहास लेखन की ओर प्रेरित किया जा सकता है। यह कार्य संगठित होकर योजनापूर्वक दीर्घकालिक नियोजन के साथ ही सम्भव है। भारतीय इतिहास संकलन योजना ने इस दिशा में भगीरथ प्रयास प्रारम्भ किये हैं। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के प्रयास का परिणाम भी सामने आ रहा है। भारतीय इतिहास का प्रतिमान बदलने लगा है तथापि इस दिशा में अभी बहुत दूर तक चलना शेष है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है भारतीय इतिहास लेखन की इन्हीं उपर्युक्त विसंगतियों का शिकार भारत के विपुल ऐतिहासिक स्रोत पुराण हुए। पुराणों में अपनी विशिष्ट शैली में विविध कथानकों के माध्यम से प्राचीन भारत का इतिहास सुरक्षित है। साम्राज्यवादी एवं साम्यवादी इतिहासकारों ने अपनी दृष्टि एवं अपने उद्देश्य के अनुरूप निर्धारित साँचे में ठीक बैठने वाले तथ्य तो पुराणों से ग्रहण किये, किन्तु पुराणों में प्राप्त समस्त ऐतिहासिक सामग्री का उपयोग कर भारतीय राज्य एवं समाज का समग्र चित्र प्रस्तुत करने का कभी प्रयास नहीं किया। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना ने गत दो वर्षों से पुराणों में प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर पौराणिक भारत के इतिहास-लेखन का कार्य प्रारम्भ किया है। इस दृष्टि से पुराणों की ऐतिहासिक दृष्टि से समीक्षा, उनका अध्ययन, उनमें प्राप्त तथ्यों का संकलन पूरे देश में चल रहा है। किन्तु इस बात की सावधानी रखनी होगी कि साम्राज्यवादी एवं साम्यवादी इतिहासकारों की तरह ही कहीं भारत केन्द्रित इतिहास लेखन ही दूसरे अतिवाद के छोर पर न जा टिके। अर्थात ‘हमारा जो भी है वह अच्छा है’ की दृष्टि से भी लिखा गया भारत का पूर्वाग्रह युक्त इतिहास अस्वीकृत होगा। इतिहास तथ्य आधारित ही होना चाहिए। किन्तु राष्ट्र समाज की प्रेरणा के लिए उपयोगी होना चाहिए। तथ्यों का प्रस्तुतीकरण पूर्वाग्रह युक्त हो किन्तु उसकी व्याख्या राष्ट्र-समाज हित में एवं सकारात्मक ही होनी चाहिए। इसी योजना के अन्तर्गत भारतीय इतिहास संकलन समिति गोरक्ष प्रान्त द्वारा ऐतिहासिक स्रोत के रूप में पुराणों की समीक्षा एवं उनमें भरे-पड़े ऐतिहासिक तथ्यों का भारतीय इतिहास लेखन में उपयोग की दृष्टि से अब तक तीन कार्यशालाएँ की जा चुकी हैं। पहली कार्यशाला 14 मार्च, 2010 ई. को दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोरखपुर में सम्पन्न हुई। कार्यशाला का वृत्त प्रकाशित हुआ। कार्यशाला एवं उसके प्रकाशन को अकादमिक क्षेत्र मिले समर्थन से प्रोत्साहित भारतीय इतिहास संकलन समिति गोरक्षप्रान्त द्वारा ‘पुराणान्तर्गत इतिहास’ विषय पर दो और कार्यशालाएँ हुईं जिनमें युवा इतिहासकारों एवं शोध विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। पहली कार्यशाला 7 अगस्त, 2011 ई. को राजा रतनसेन डिग्री कालेज बाँसी, सिद्धार्थनगर में तथा दूसरी कार्यशाला 11 मार्च, 2012 ई. को महाराणा प्रताप पी. जी. कॉलेज जंगल धूसड़, गोरखपुर में सम्पन्न हुई। दोनों कार्यशालाओं में पुराणों पर प्रस्तुत शोध-पत्रों को इस ग्रन्थ में प्रकाशित किया जा रहा है। कुछ अन्य प्रमुख संकलित आलेख भी इस ग्रन्थ में सम्मिलित किये गये हैं। प्रकाशित किये जा रहे अनेक शोध-पत्रों में यद्यपि कि इतिहास की दृष्टि से विवेचना की कमी है, तथ्यों के संकलन एवं उनकी उद्देश्यपरक व्याख्या में क्रमबद्धता का अभाव है, युवा इतिहासकारों की न्यायाधीश जैसी सम्यक दृष्टि का पैनापन कम है, अनेक शोध-पत्र मात्र पुराणों में किये गये उल्लेखों के संकलन मात्र हैं तथापि यह प्रकाशन इस मायने में महत्त्वपूर्ण होगा कि पुराणों में उल्लिखित विविध पक्षों पर पाठकों, शोधार्थियों एवं अन्य अध्येताओं का ध्यान आकर्षित करेगा और वे पुराणों में प्राप्त विपुल ऐतिहासिक सामग्री का उपयोग करते हुए प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक नवीन अध्यायों का उद्घाटन करने में जुटेंगे। भारतीय इतिहास लेखन में पुराणों में प्राप्त ऐतिहासिक स्रोत के उपयोग से भारतीय इतिहास लेखन के एक नये युग का सूत्रपात होगा। इस ग्रन्थ के प्रकाशन में गत सत्र के ‘पुराणान्तर्गत इतिहास’ विषय पर राजा रतनसेन डिग्री कॉलेज बाँसी में आयोजित कार्यशाला का प्रमुख योगदान है। वह कार्यशाला सम्पन्न कराने में महाविद्यालय के प्रबन्धक एवं विधायक माननीय राजकुमार जयप्रताप सिंह जी एवं प्राचार्य डॉ. हरेश प्रताप सिंह के अमूल्य योगदान के हम हृदय से आभारी हैं। पुराणान्तर्गत इतिहास पर आयोजित कार्यशाला में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. शिवाजी सिंह एवं राष्ट्रीय संगठन मन्त्री श्री बालमुकुन्द जी, प्रो.अशोक श्रीवास्तव एवं श्रद्धेय गुरुवर डॉ. कुँवर बहादुर कौशिक के हम कृतज्ञ हैं जिनकी उपस्थिति एवं मार्गदर्शन के बिना कार्यशाला की सफलता सम्भव नहीं थी। मैं सम्पादक मण्डल के समस्त सहयोगियों एवं कार्यशाला में सम्मिलित समस्त विषय विशेषज्ञों तथा शोधार्थियों का भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। मुझे विश्वास है कि यह प्रकाशन पुराणों पर कार्य करने वाले शोधार्थियों को प्रेरणा देने की दिशा में एक छोटे से दीप का कार्य अवश्य करेगा। गुरुपूर्णिमा, 2012 (प्रदीप कुमार राव) अनुक्रम 1. पुराण श्रीमद्ब्रह्मानन्द सरस्वती 17 2. पुराणों में धर्म और सदाचार स्वामी करपात्रीजी महाराज 19 3. सिद्धों की पौराणिक प्रासंगिकता महन्त अवेद्यनाथजी महाराज 22 4. हमारे पुराण - एक समीक्षा अ. द. पुसालकर 25 5. विष्णुपुराण में राज्य एवं समाज बाल मुकुन्द पाण्डेय 39 6. विष्णुपुराण और भारत डॉ. कुँवर बहादुर कौशिक 45 7. श्रीविष्णुपुराण में वर्णित ......... डॉ. रत्नेश कुमार त्रिपाठी 55 8. पौराणिक राजवंश डॉ. प्रदीप कुमार राव 60 9. विष्णुपुराण में वर्णित मनु एवं..... लोकेश कुमार प्रजापति 73 10. पुराणों में विलक्षण विद्याएँ डॉ. रामप्यारे मिश्र 78 11. पुराणों में इतिहास संकल्पना डॉ. मिथिलेश कुमार तिवारी 85 12. पुराणों में विज्ञान रेनू यादव 89 13. पुराभवम् पुराणम् डॉ. किरन देवी 95 14. पौराणिक इतिवृत्त एवं पुरातत्त्व डॉ. अजय कुमार मिश्र 100 15. पुराणों का वैदिक धरातल स्वेजा त्रिपाठी 104 16. पुराण परिचय डॉ. प्रज्ञा मिश्रा 109 17. शैव धर्म से सम्बद्ध देवियाँ पुराणों..... डॉ. रत्न मोहन पाण्डेय 112 18. पुराणों में राजा की भूमिका डॉ. अखिलेश कुमार मिश्र 116 19. पुराणों की ऐतिहासिक विवेचना डॉ.संगीता शुक्ल 122 20. मध्यकालीन इतिहास का प्रमुख स्रोत डॉ. चन्द्रमौलि त्रिपाठी 129 21. पुराणों में नदियों का संक्षिप्त इतिहास डॉ. बृज भूषण यादव 133 22. पुराणों में नगर योजना डॉ. राम गोपाल शुक्ल 143 23. पुराण-वेद-इतिहास राजेश कुमार शर्मा 146 24. ऐतिहासिक स्रोत के रूप में ..... नीतू द्विवेदी 149 25. भारतीय इतिहास लेखन और..... राजेन्द्र देव मिश्र 154 26. पुराण विद्या कृतिका शाही 158 27. विष्णुपुराण में भारतीय समाज डॉ. भारती सिंह 167 28. भारतीय इतिहास का प्रस्थान बिन्दु.... गुंजन अग्रवाल 173 पुराण पुराणों में धर्म और सदाचार सिद्धों की पौराणिक प्रासंगिकता हमारे पुराण - एक समीक्षा विष्णुपुराण में राज्य एवं समाज विष्णुपुराण और भारत श्रीविष्णुपुराण में वर्णित नारी और शूद्र्र्र पौराणिक राजवंश विष्णु पुराण में वर्णित मनु एवं उनकी वंशावली पुराणों में विलक्षण विद्याएँ पुराणों में इतिहास-संकल्पना पुराणों में विज्ञान पुराभवम् पुराणम् पौराणिक इतिवृत्त एवं पुरातत्त्व पुराणों का वैदिक धरातल पुराण-परिचय शैव धर्म से सम्बद्ध देवियाँ , पुराणों के सन्दर्भ में पुराणों में राजा की भूमिका : एक अवलोकन पुराणों की ऐतिहासिक विवेचना मध्यकालीन इतिहास का प्रमुख स्रोतः भविष्य पुराण पुराणों में नदियों का संक्षिप्त इतिहास पुराणों में नगर योजना पुराण-वेद-इतिहास ऐतिहासिक स्रोत के रूप में भागवत पुराण का मूल्यांकन भारतीय इतिहास लेखन और इतिहास-पुराण परम्परा पुराण विद्या विष्णुपुराण में भारतीय समाज भारतीय इतिहास का प्रस्थान-बिन्दु एवं भगवान् बुद्ध की पौराणिक (ऐतिहासिक) तिथि स्रोत Last edited ७ months ago by JayprakashBot Wikibooks सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। 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हिन्दू-धर्म की आन्तरिक शक्ति, उसकी वैज्ञानिकता

हिन्दू-धर्म की आन्तरिक शक्ति, उसकी वैज्ञानिकता

हिन्दू-धर्म की ज्येष्ठता व श्रेष्ठता संसार में सर्वत्र मान्य हैं। विश्व के अगणित विद्वानों, विचारकों तथा दार्शनिकों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि यह धर्म कुछ सिद्धान्तों, संस्कारों या विश्वासों की धर्म-व्यवस्था मात्र नहीं, वरन् उन आधारभूत वैज्ञानिक तथ्यों पर व्यवस्थित है, जिनसे युग-युगान्तरों से यहाँ का नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन विकसित होता रहा हैं, और उनसे यह विशाल भू-खण्ड शक्ति एवं सम्पन्नता अनुभव करता रहा है। जो ज्ञान इस ऋषि-देश में प्रादुर्भूत हुआ है, वह कल्पना-भूत नहीं साधना-निर्गत होने के कारण ही प्रामाणिक माना गया हैं। उस में शंकाओं के लिये कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई। जो सिद्धान्त बनाये गये है, वे पूर्ण वैज्ञानिक हैं। यही कारण है कि अनेक ऐतिहासिक आघातों के बावजूद आज भी यह फल-फूल रहा है। कठिनाइयों में भी उसकी आन्तरिक शक्ति ज्यों की त्यों विद्यमान रही है और आगे भी बनी रहेगी।

इस जीवन व्यवस्था को “हिन्दू-धर्म” नाम देने से उसे मर्यादित या सीमा बद्ध नहीं मानना चाहिये। इसमें सम्प्रदायवाद या कुछ थोड़े से व्यक्तियों के हित संरक्षण की ही बात नहीं है, जैसा कि प्रायः संसार के सब धर्मों में पाया जाता है, वरन् विश्व-कल्याण की उद्दात्त भावनाओं से वह ओत-प्रोत है। एक नाम उसका ‘सनातन-धर्म’, भी है जिसका अर्थ ही है- आदि धर्म। अर्थात् जीवन की उत्पत्ति के साथ ही जो सार्वभौमिक व्यवस्था बनी, उसी को सनातन धर्म कहते हैं। आदि व्यवस्था का तात्पर्य है कि देश, जाति की संकीर्णता का भाव उसमें नहीं है। आज जो लोग उसे इस संकीर्ण रूप में देखते हैं, दरअसल उन्होंने उसकी वैज्ञानिकता पर दृष्टिपात नहीं किया, अन्यथा शंका करने जैसी कोई बात नहीं है। हिन्दू-धर्म विशुद्ध दर्पण की तरह है जिसमें जिसका जैसा चेहरा है, उसे वैसी ही शक्ल दिखाई देती है। छल-कपट या बनावट का उसमें कुछ भी स्थान नहीं है।

हिन्दू-धर्म शुद्ध तथा साँस्कृतिक जीवन पद्धति का नाम है और वह इसी रूप में विकसित हुआ है, अतः वह जाति-गत संकीर्णताओं से प्रतिबन्धित नहीं हुआ है। उन सिद्धान्तों को स्वीकार करने वालों का एक वर्ग, जाति या देश भले ही बन गया हो, पर इससे उसका स्वरूप परिवर्तित नहीं होता। हिन्दुओं की एक विशिष्ट जाति बन जाने के बावजूद भी उसमें भेद-भाव या पक्षपात नहीं है। कारण यह है कि वह पूर्णतया सनातन नियमों पर आधारित है। यहाँ जीव के आत्म-स्वरूप की कल्पना की गई है। शरीर और उसके हितों को आत्मा की दृष्टि से ही मान्यता और सेवा मिली है। शेष सारा जीवन ही आनन्द की सात्विक उपलब्धि, आत्म-कल्याण और विश्व की भलाई की भावना से ओत-प्रोत होता है, अतः इसमें अन्य देश, वर्ण जाति के मनुष्य भी जब कभी मिले हैं तो वे इस रंग में ऐसे रंग गये हैं कि अपनी सम्पूर्ण आत्म-शक्तियाँ इसी को समर्पित कर दी हैं।

अपनी विशिष्टता के कारण उसे गहन प्रतिशोधों का सामना करना पड़ा है। बार-बार खुली चुनौतियाँ उसने स्वीकार की हैं और जिस प्रकार पुनर्व्यवस्थित हुआ है, उससे उसकी महान् शक्ति और क्षमता का ही परिचय और प्रमाण मिलता है। हमारी यह मान्यता है कि जब तक पूर्ण रूप से एक भी हिन्दू इस संसार में बना रहेगा, तब तक इस धर्म का अन्त होना असम्भव ही है। हिन्दू-धर्म की यह विशेषता उसके सत्य, शील और शक्ति के कारण है। इन तीनों महा गुणों का विकास आत्म-शोध की पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया पर होता है। इसका स्पष्ट दर्शन यहाँ के योग ग्रन्थों से मिलता है। ऐसे उदाहरण यहाँ बहुत हैं, जब जाति की प्रसुप्त चेतना को एक व्यक्ति ने जगाया है। उसको दयनीय अवस्था से ऊँचा उठाया है। सभी जानते हैं कि महायानी बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव काल में जबकि हिन्दू-धर्म के बहुत थोड़े अवशेष बचे थे, तब तरुण तपस्वी जगतगुरु शंकराचार्य ने धार्मिक-ज्योति को प्रज्ज्वलित किया था और सम्पूर्ण देश में उसे नव-चेतना देने में सफल हुये थे। स्वामी रामतीर्थ, विवेकानन्द या ऋषि दयानन्द ने उतना काम करके दिखाया, जिसके लिये एक विधिवत मिशन लगाना पड़ सकता था। जो समाज और समूह की शक्ति हो सकती है, वह एक व्यक्ति में भी हो सकती है, यह मान्यता इस सनातन धर्म की कुछ विचित्र अवश्य जान पड़ती है, किन्तु शक्ति के आविर्भाव की योग पद्धति का जिन्हें थोड़ा भी अनुमान होगा, वे इस तथ्य को अस्वीकार न कर सकेंगे।

भारतीय बौद्धिक क्षमता और दर्शन संसार के अन्य दर्शनों से विलक्षण है। जो बातें आज भौतिक विज्ञान प्रदर्शित कर रहा है, उसे यहाँ केवल बालकों का खेल समझा जाता रहा है। रावण, भस्मासुर, सहस्रबाहु, यह सब ऐसे ही वैज्ञानिक थे जिनके कृत्यों को वहाँ बहुत छोटा माना गया है। पाश्चात्य जगत में जो शोध जड़ अणु की हुई है, वह यहाँ चेतन परमाणु की हुई है। जड़ से चेतन की शक्ति असंख्यों गुनी अधिक है। योग-पद्धति में सर्वत्र उसी शक्ति का विश्लेषण हुआ है, जिसे पाकर लोग अनन्त शक्ति के भाण्डागार बने विचरण करते थे। यहाँ प्रायः ऋषि से कम तो कोई होता ही नहीं था।

काल प्रभाव से इस साधना शक्ति का ह्रास हुआ। 16 वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक हिन्दू-धर्म पर निरन्तर प्रहार होते रहे, जिससे साधना का दक्षिण मार्ग प्रायः विलुप्त हो गया। मुसलिम शासकों ने हिन्दुओं को हीन जाति मानकर हमारे मन्दिरों को भ्रष्ट तथा शिक्षण पद्धति को नष्ट करके ऐसे भ्रामक तथ्य भर दिये, जिससे हिन्दुओं ने भी अपने आप पर अविश्वास करना प्रारम्भ कर दिया। असंरक्षित धर्म इस तरह गिरता ही चला गया। वेद लुटे, स्मृतियों, पुराणों में स्वार्थी और चाटुकार हिन्दुओं ने ही भ्रम पैदा करने वाले श्लोक गढ़-गढ़कर भर दिये। तप और उसके प्रभाव को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया कि या तो उसे लोग असम्भव ही मान बैठें या उन पर पूरी तरह से अविश्वास करने लगें। धर्म, आत्मा, ईश्वर यदि हैं तो उनका एक निश्चित विज्ञान भी होना चाहिये। हिन्दू-धर्म के इस विज्ञान पक्ष को सब तरह से निर्बल बनाने का प्रयत्न किया गया, किन्तु फिर भी अपनी विशेषताओं के कारण वह समूल नष्ट न हो सका।

सिकन्दर, औरंगजेब तथा इब्राहीम लोदी आदि विदेशी शासकों ने जो धार्मिक आस्थाओं और धर्म मन्दिरों को ध्वंस किया, उसे चैतन्य महाप्रभु ने पुनः जीवन दान दिया। इस अवधि में भक्ति-धारा का विकास हुआ। साँस्कृतिक एकता के अनेक केन्द्रों से वह सम्पूर्ण राष्ट्र में पुनः फूटी।

इसी बीच एक तीसरी शक्ति का प्रवेश इस देश में हुआ। अँगरेज भारत में आये और ईसाई मिशनरियों ने धर्म- परिवर्तन का कार्य शुरू कर दिया। यह ठीक है कि उन्होंने धर्म पर आक्षेप नहीं किया, किन्तु ईसाई-संस्कृति को मान्यता और प्रोत्साहन ने वही काम किया जो मुसलमानों के आघातों ने किया था। उन्होंने कठोरता पूर्वक दमन किया, इन्होंने प्रलोभन देकर वही काम किया। ईसाई मिशनरियों की प्रसार पद्धति की आकर्षक विशेषता के कारण कुछ लोगों ने धर्म-परिवर्तन किये और हिन्दू-धर्म को हीन प्रमाणित करने की कोशिश की। दूसरी तरफ शासक वर्ग ने अँगरेजी विचार धारायें, रीति-रिवाज और रहन-सहन भरना शुरू कर दिया। इस तरह हिन्दू-धर्म की मान्यतायें बिलकुल ही नष्ट हो चली। ईश्वर, धर्म और लोक-परलोक की प्राप्ति को सस्ता सौदा मान लिया गया। इस प्रकार उसमें जो वैज्ञानिकता थी वह पूरी तरह उपेक्षित होती गई। लोगों का जीवन विलासी बनता गया। ऐसे ही सिद्धान्त यहाँ फैलाये गये जिससे तप और शक्ति की साधनाओं को लोग बिलकुल ही भूल गये। धर्मान्तर ने इस ह्रास को और सहयोग दिया। कुल मिला कर साधना शक्ति का यहाँ लोप-सा हो गया।

हिन्दू धर्म के प्रति उपेक्षा एवं विरोध की यह भावनायें जितना अधिक बढ़ीं, उतना ही लोगों में संकीर्णता, स्वार्थ, लोभ, घृणा, अनुभूति, विलासिता आदि दुष्प्रवृत्तियां भी-बढ़ी और अशान्ति के लक्षण दिखाई देने लगे। सुखभोग के साधन बढ़े, पर विडंबना यह है कि सुख में वृद्धि नहीं हुई। धर्म का स्वरूप यदि विकृत हो जाय, तो सुख की आशा की भी नहीं की जा सकती हैं। वह धर्म ही है जो मनुष्य की भावनाओं और विचारों को शुद्ध करता है। स्वार्थ-हीन तथा गौरवपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति और समाज को शुद्ध रखने की शक्ति केवल धर्म से ही है। आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता को बल या कानून द्वारा कभी नहीं दबाया जा सकता। धर्म ही उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है।

हिन्दू धर्म राष्ट्रीय एकता की रीढ़ है पर दुःख है कि धर्म-शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है। इसमें किसी को दोष देने की भी आवश्यकता नहीं, वरन् उन कारणों को ढूँढ़ना है, जिससे धर्म की अवनति हुई है। उन्हें यदि समाज के सामने वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया जाय तो लोगों की सुषुप्त धार्मिक आस्थायें पुनः जागृत हो सकती हैं। यह प्रसार सैद्धान्तिक और संस्कारात्मक तो हो, पर उसके साथ में साधना के पूर्ण वैज्ञानिक अभ्यासों का भी समावेश होना चाहिये। धर्म की रक्षा भी शक्ति से ही होती है। वह शक्ति व्यक्ति की भी हो सकती है, और समाज की भी। पर भारतीय धर्म में साधना-शक्ति का जो सुन्दर योग रहा है, वह अधिक श्रेष्ठ है, अब उसी के विकास का आवश्यकता भी अधिक है।

हिन्दू धर्म की आन्तरिक शक्ति, उसके विज्ञान की अवहेलना करने से ही हिन्दू-धर्म का पतन हुआ है। आज भी इस चेतना को यदि जागृत किया जा सके तो यहाँ हाइड्रोजन या एटमबम बनाने की जरूरत न रहे। हर व्यक्ति शक्ति चेतना का पुँज बना हुआ हो तो किसी भी बाहरी आक्रमण की आशंका न रहेगी। राष्ट्र का यह साधना बल जागृत हो जाय तो हिन्दू धर्म पुनः अपना पूर्व गौरव प्राप्त कर सकता है। इसे ही अब जगाना शेष रहा है।

साभार :-
http://literature.awgp.org/akhandjyoti

स्वामी विरजानंद (दंडी स्वामी)

हिन्दी / Hindi खबर-संसारज्योतिषबॉलीवुडदीपावलीधर्म-संसारक्रिकेटवीडियोसामयिकफोटो गैलरीअन्यProfessional Courses महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात के मोरवी के टंकारा गांव में हुआ था। मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया था। उनके पिता का नाम अम्बाशंकर था। माता का नाम अमृतबाई था। उन्होंने वेदों के प्रकांड विद्वान स्वामी विरजानंद जी से शिक्षा ग्रहण की थी।    एक समय की बात है। स्वामी विरजानंद (दंडी स्वामी) की पाठशाला में कई शिष्य आते, कुछ समय तक रहते मगर उनके क्रोध, उनकी प्रताड़ना को सहन न कर सकने के कारण भाग जाते। कोई-कोई शिष्य ऐसा निकलता, जो उनके पास पूरा समय रहकर पूरी शिक्षा पा सकता। यह दंडी स्वामी (स्वामी विरजानंद) की एक बड़ी कमजोरी थी। दयानंद सरस्वती को भी उनसे कई बार दंड मिला, मगर वह दृढ़ निश्चयी थे अत: पूरी शिक्षा प्राप्त करने का संकल्प किए, डटे रहे।   एक दिन दंडी स्वामी को क्रोध आया और उन्होंने अपने हाथ के सहारे ली हुई छड़ी से दयानंद की खूब पिटाई करते हुए उसकी खूब भर्त्सना कर दी। मूर्ख, नालायक, धूर्त... पता नहीं क्या-क्या कह कहते चले गए।   दयानंद के हाथ में चोट लग गई, काफी दर्द हो रहा था, मगर दयानंद ने बिलकुल भी बुरा नहीं माना बल्कि उठकर गुरुजी के हाथ को अपने हाथ में ले लिया और सहलाते हुए बोले- 'आपके कोमल हाथों को कष्ट हुआ होगा। इसके लिए मुझे खेद है।'   दंडी स्वामी ने दयानंद का हाथ झटकते हुए कहा- 'पहले तो मूर्खता करता है, फिर चमचागिरी। यह मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं।' पाठशाला के सब विद्यार्थियों ने यह दृश्य देखा। उनमें एक नयनसुख था, जो गुरुजी का सबसे चहेता विद्यार्थी था। नयनसुख को दयानंद से सहानुभूति हो आई, वह उठा और गुरुजी के पास गया तथा बड़े ही संयम से बोला- 'गुरुजी! यह तो आप भी जानते हैं कि दयानंद मेधावी छात्र है, परिश्रम भी बहुत करता है।'   दंडी स्वामी को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। अब उन्होंने दयानंद को अपने करीब बुलाया। उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले- 'भविष्य में हम तुम्हारा पूरा ध्यान रखेंगे और तुम्हें पूरा सम्मान देंगे।' जैसे ही छुट्टी हुई, दयानंद ने नयनसुख के पास जाकर कहा- 'मेरी सिफारिश करके तुमने अच्‍छा नहीं किया, गुरुजी तो हमारे हितैषी हैं। दंड देते हैं तो हमारी भलाई के लिए ही। हम कहीं बिगड़ न जाएं, उनको यही चिंता रहती है।'    यही दयानंद आगे चलकर महर्षि दयानंद बने और ‍वैदिक धर्म की स्थापना हेतु 'आर्य समाज' के संस्थापन के रूप में विश्वविख्यात हुए। आर्य समाज की स्थापना के साथ ही भारत में डूब चुकी वैदिक परंपराओं को पुनर्स्थापित करके विश्व में हिन्दू धर्म की पहचान करवाई। उन्होंने हिन्दी में ग्रंथ रचना आरंभ की तथा पहले के संस्कृत में लिखित ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद भी किया। महर्षि दयानंद सरस्वती का भारतीय स्वतंत्रता अभियान में भी बहुत बड़ा योगदान था।  विज्ञापन विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं? भारत मैट्रीमोनी में निःशुल्क रजिस्टर करें!   by Taboola Sponsored Links You May Like Is it a Migraine or Headache? Find Info - Search for Migraine treatments. Health Living Today Melissa Gilbert Hated The One Person She Had To Work Most With IcePop 11 Cheapest Places in the US to Buy a Home TheFinancialWord.com 20 Pictures of Cartoon Logic That People Think Are Extremely Ridiculous Appurse Check Out The 15 Most Generous Billionaires In The World WikiPuppet What Jennifer Grey Looks Like Now Doesn't Make Any Sense LawyersFavorite मुख पृष्ठ | हमारे बारे में | विज्ञापन दें | अस्वीकरण | हमसे संपर्क करें Copyright 2016, Webdunia.com

शब्द-बोध 

मुख्य मेनू खोलें खोजें संपादित करेंइस पृष्ठ का ध्यान रखेंकिसी अन्य भाषा में पढ़ें स्वामी विरजानन्द पेज समस्याएं स्वामी विरजानन्द(1778-1868), एक संस्कृत विद्वान, वैदिक गुरु और आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के गुरु थे। इनको मथुरा के अंधे गुरु के नाम से भी जाना जाता था। बचपन संपादित करें इनका जन्म मोह्याल दत्त परिवार में पंजाब के कर्तारपुर में 1778 इस्वी में हुआ। इनका बचपन का नाम - वृज लाल था। पाँच साल की उम्र में चेचक के कारण ये पूर्ण अंधे हो गए। 12वें साल में माँ-बाप चल बसे और भाई-भाभी के संरक्षण में कुछ दिन गुजारने के बाद ये घर से विद्याध्ययन के लिए निकल पड़े। कुछ काल तक इधर भटकने के उपरांत ये आध्यात्मिक नगरी के रूप में विख्यात ऋषिकेश आए और कुछ काल ऋषिकेश में रहने के बाद किसी की प्रेरणा से ये हरिद्वार किसी आश्रम में रहने लगे। वहाँ ये स्वामी पूर्णानन्द से मिले। पूर्णानन्द ने इन्हें वैदिक व्याकरण और आर्ष शास्त्रों से अवगत कराया। इसके बाद वे संस्कृत विद्वानों के लिए प्रसिद्ध काशी (बनारस) आए जहाँ 10 सालों तक उन्होंने 6 दर्शनों (वेदान्त, मीमांसा, न्यायादि)तथा आयुर्वेदादि ग्रंथों का अध्ययन किया। इसके बाद गया आए जहाँ उपनिषदों के तुलनात्मक अध्ययन का काम जारी रखा। यहाँ से वे कलकत्ता गए जहाँ अपने संस्कृत ज्ञान के लिए उन्हे प्रशंसा मिली। इसके बाद ये निमंत्रण पर अलवर आए और यहाँ उन्होंने शब्द-बोध ग्रंथ की रचना की। इसकी मूल प्रति अब भी वहाँ के संग्रहालय में रखी है। इसके बाद वे मथुरा में रहे जहाँ उन्होंने पाठशाला स्थापित की। इसमें देश भर से संस्कृत जिज्ञासु आए और राजपूतों की तरफ से दान भी मिले। दयानन्द सरस्वती से भेंट संपादित करें लगभग इसी समय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्य को जानने की अभिलाषा से घर परिवार त्यागकर सच्चे गुरू की खोज में निकल पड़े थे। भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए वे सन् १८६० में गुरूवर स्वामी विरजानन्द के आश्रम में पहुंचे। जहां उन्हें नई दृष्टि, सद्प्रेरणा और आत्मबल मिला। वर्षों तक भ्रमण करने के बाद जब वे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में गुरू विरजानन्द जी की कुटिया पर पहुंचे तो गुरू विरजानन्द ने उनसे पूछा कि वे कौन हैं। तब स्वामी दयानन्द ने कहा, गुरूवर यही तो जानना चाहता हूं कि वास्तव में, मैं कौन हूं? प्रश्न के उत्तर से संतुष्ट होकर गुरूवर ने दयानन्द को अपना शिष्य बनाया। स्वामी विरजानन्द उच्च कोटि के विद्वान थे, उन्होंने वेद मंत्रों को नई दृष्टि से देखा था और वेदों को एक नवीन व्यवस्था प्रदान की थी। उन्होंने दयानन्द जी को वेद शास्त्रों का अभ्यास कराया। दक्षिणा संपादित करें अध्ययन पूरा होने के बाद जब दयानन्द जी गुरू विरजानन्द जी को गुरू दक्षिणा के रूप में थोडी से लौंग, जो गुरू जी को बहुत पसन्द थी लेकर गये तो गुरू जी ने ऐसी दक्षिणा लेने से मना कर दिया। उन्होंने दयानन्द से कहा कि गुरू दक्षिणा के रूप में, मैं यह चाहता हूं कि समाज में फैले अन्ध विश्वास और कुरीतियों को समाप्त करो। गुरू जी के आदेश के अनुसार स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक उत्थान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। सम्मान और महत्व संपादित करें इनका स्मृति में करतारपुर के ग्रैंड ट्रंक रोड पर एक स्मारक बनवाया गया जिसकी आधारशिला श्री बद्रीनाथ आर्य ने रखी (उन्होंने बाद में आर्य समाज नैरोबी की स्थापना भी की)। 14 सितम्बर 1971 को डाक विभाग ने इनकी स्मृति में एक टिकट भी जारी किया। आजादी के आन्दोलन और वैदिक पुनरुत्थान में आर्य समाज का योगदान अतिप्रशंसित रहा है और इनके संस्थापक दयान्नद जी को ज्ञान स्वामी विरजानन्द से ही मिला इसलिए आधुनिक भारत में इनके योगदान को और सराहे जाने की आवश्यकता है। बाहरी कड़ियाँ संपादित करें स्वामी विरजानन्द आश्रम पाणिनि महाविद्यालय भारत में वैदिक युग के सूत्रधार – स्वामी विरजानन्दजी दण्डी (आर्य मन्तव्य) Last edited 4 months ago by an anonymous user RELATED PAGES आर्य समाज स्वामी दयानन्द सरस्वती दयानंद एंग्लो वैदिक विद्यालय सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। गोपनीयताडेस्कटॉप

यज्ञ+उपवीत

मुख्य मेनू खोलें खोजें संपादित करेंइस पृष्ठ का ध्यान रखेंकिसी अन्य भाषा में पढ़ें यज्ञोपवीत यज्ञोपवीत यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) शब्द के दो अर्थ हैं- उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है और विद्यारंभ होता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं।[1] जनेऊ पहनाने का संस्कार[2] सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है।[3][4] यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, यज्ञसूत्र या जनेऊ[5] यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं। ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है।[6]तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं।[7]अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। बिना यज्ञोपवीत धारण कये अन्न जल गृहण नहीं किया जाता। यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।। सन्दर्भ संपादित करें ↑ आप्टे, वामन शिवराम (1969). संस्कृत हिन्दी कोश. दिल्ली, पटना, वाराणसी भारत: मोतीलाल बनारसीदास. प॰ 823. ↑ प्रसाद, कालिका (2000). बृहत हिन्दी कोश. वाराणसी भारत: ज्ञानमंडल लिमिटेड. प॰ 925. ↑ "The Sacred Thread" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). कामत.कॉम. http://www.kamat.com/indica/culture/sub-cultures/sacred-thread.htm. अभिगमन तिथि: 2007. ↑ आप्टे, वामन शिवराम (1969). संस्कृत हिन्दी कोश. दिल्ली, पटना, वाराणसी भारत: मोतीलाल बनारसीदास. प॰ 823. ↑ प्रसाद, कालिका (2000). बृहत हिन्दी कोश. वाराणसी भारत: ज्ञानमंडल लिमिटेड. प॰ 925. ↑ "Brahma-granthi" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). हिंदुइज़्म.कॉम. http://www.hinduism.co.za/sacred1.htm. अभिगमन तिथि: 2007. ↑ "Aavani Avittam" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). चेन्नाईऑनलाइन.कॉम. http://www.chennaionline.com/specials/aavani/articles/sacred.asp. अभिगमन तिथि: 2007. बाहरी कड़ियाँ संपादित करें यज्ञोपवीत धारण करने से संबंधित जानकारी अंग्रेज़ी में गुरु नानक और यज्ञोपवीत अंग्रेज़ी में Last edited 2 years ago by Sanjeev bot RELATED PAGES आशीर्वाद दोपहर आचार्य (बहुविकल्पी) सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। गोपनीयताडेस्कटॉप

 प्रजापति के पुत्र कुश के पुत्र कुशनाभ के पुत्र गाधि के पुत्र विश्वामित्र  

Phonetic Go  देवनागरी खोज विश्वामित्र   संक्षिप्त परिचय विश्वामित्र अन्य नाम विश्वरथ वंश-गोत्र कुशिक गोत्रोत्पन्न 'कौशिक'[1] पिता गाधि समय-काल रामायण काल संतान सौ पुत्रों के पिता थे। विद्या पारंगत धनुर्विद्या रचनाएँ 'विश्वामित्रकल्प', 'विश्वामित्रसंहिता', 'विश्वामित्रस्मृति' प्रसिद्ध घटनाएँ वसिष्ठ ऋषि से कामधेनु माँगना, अप्सरा मेनका से प्रेम, त्रिशंकु की स्वर्ग जाने की इच्छा। यशकीर्ति ऋग्वेद के दस मण्डलों में तृतीय मण्डल, जिसमें 62 सूक्त हैं, इन सभी सूक्तों के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र ही हैं। अपकीर्ति वसिष्ठ द्वारा कामधेनु न देने पर उनसे युद्ध और फिर पराजय। संबंधित लेख वसिष्ठ, मेनका, श्रीराम अन्य जानकारी विश्वामित्र तपस्या के धनी थे। इन्हें गायत्री-माता सिद्ध थीं और इनकी पूर्ण कृपा इन्होंने प्राप्त की थी। नवीन सृष्टि तथा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आदि भेजने और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने जैसे असम्भव कार्य विश्वामित्र ने किये। विश्वामित्र गाधि के पुत्र थे। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि उन्होंने कई वर्ष तक सफलतापूर्वक राज्य किया था। विश्वामित्र अपने समय के वीर और ख्यातिप्राप्त राजाओं में गिने जाते थे। लम्बे समय तक राज्य करने के बाद वे पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकले। पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के रूप में महर्षि विश्वामित्र के समान शायद ही कोई हो। इन्होंने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व प्राप्त किया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने, देवताओं और ऋषियों के लिये पूज्य बन गये। विश्वामित्र को सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त हुआ था। अपनी तपस्या के बल और योग से वे सभी के लिए वन्दनीय भी बन गय थे। ऋषि वशिष्ठ का आथित्य मिथिला के राजपुरोहित शतानन्द राम से विशेष रूप से प्रभावित हुए थे। शतानन्द ने श्रीराम से कहा- "हे राम! आपका बड़ा सौभाग्य है कि आपको विश्वामित्र जी गुरु के रूप में प्राप्त हुये हैं। ऋषि विश्वामित्र बड़े ही प्रतापी और तेजस्वी महापुरुष हैं। ऋषि धर्म ग्रहण करने के पूर्व ये बड़े पराक्रमी और प्रजावत्सल नरेश थे। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। ये सभी शूरवीर, पराक्रमी और धर्मपरायण थे। विश्वामित्र जी उन्हीं गाधि के पुत्र हैं। एक दिन राजा विश्वामित्र अपनी सेना को लेकर वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में गये। उस समय वशिष्ठ ईश्वर भक्ति में लीन होकर यज्ञ कर रहे थे। विश्वामित्र उन्हें प्रणाम करके वहीं बैठ गये। यज्ञ क्रिया से निवृत होकर वशिष्ठ ने विश्वामित्र का खूब आदर सत्कार किया और उनसे कुछ दिन आश्रम में ही रह कर आतिथ्य ग्रहण करने का अनुरोध किया। इस पर यह विचार करके कि मेरे साथ विशाल सेना है और सेना सहित मेरा आतिथ्य करने में वशिष्ठ जी को कष्ट होगा, विश्वामित्र ने नम्रता पूर्वक अपने जाने की अनुमति माँगी, किन्तु वशिष्ठ के अत्यधिक अनुरोध करने पर थोड़े दिनों के लिये उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया। वशिष्ठ ऋषि ने कामधेनु गौ का आह्वान करके उससे विश्वामित्र तथा उनकी सेना के लिये छः प्रकार के व्यंजन तथा समस्त प्रकार के सुख-सुविधा की व्यवस्था करने की प्रार्थना की। उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके कामधेनु गौ ने सारी व्यवस्था कर दी। वशिष्ठ के आतिथ्य से विश्वामित्र और उनके साथ आये सभी लोग बहुत प्रसन्न हुये।[2] कामधेनु को माँगना कामधेनु गौ का चमत्कार देखकर राजा विश्वामित्र ने उस गौ को प्राप्त करने के विचार से वशिष्ठ से कहा- "मुनिवर! कामधेनु जैसी गौ वनवासियों के पास नहीं, राजा महाराजाओं के पास शोभा देती हैं। अतः आप इसे मुझे दे दीजिये। इसके बदले में मैं आपको सहस्त्रों स्वर्ण मुद्रायें दे सकता हूँ।" इस पर वशिष्ठ ऋषि बोले- "राजन! यह गौ मेरा जीवन है और इसे मैं किसी भी कीमत पर किसी को नहीं दे सकता।" वशिष्ठ के इस प्रकार कहने पर विश्वामित्र ने बलात् उस गौ को पकड़ लेने का आदेश दे दिया और उनके सैनिक उस गौ को डण्डे से मार-मार कर हाँकने लगे। कामधेनु गौ ने क्रोधित होकर उन सैनिकों से अपना बन्धन छुड़ा लिया और वशिष्ठ के पास आकर विलाप करने लगी। वशिष्ठ बोले- "हे कामधेनु! यह राजा मेरा अतिथि है, इसलिये मैं इसको शाप भी नहीं दे सकता और इसके पास विशाल सेना होने के कारण इससे युद्ध में भी विजय प्राप्त नहीं कर सकता। मैं स्वयं को विवश अनुभव कर रहा हूँ।" उनके इन वचनों को सुन कर कामधेनु ने कहा- "हे ब्रह्मर्षि! एक ब्राह्मण के बल के सामने क्षत्रिय का बल कभी श्रेष्ठ नहीं हो सकता। आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं एक क्षण में इस क्षत्रिय राजा को उसकी विशाल सेना सहित नष्ट कर दूँगी।" कोई उपाय न देख कर वशिष्ठ ऋषि ने कामधेनु को अनुमति दे दी। दिव्य शक्ति तथा धनुर्विद्या की प्राप्ति आज्ञा पाते ही कामधेनु ने योगबल से पह्नव सैनिकों की एक सेना उत्पन्न कर दी। वह सेना विश्वामित्र की सेना के साथ युद्ध करने लगी। विश्वामित्र ने अपने पराक्रम से समस्त पह्नव सेना का विनाश कर डाला। अपनी सेना का नाश होते देखकर कामधेनु ने सहस्त्रों शक, हूण, बर्वर, यवन और काम्बोज सैनिक उत्पन्न कर दिये। जब विश्वामित्र ने उन सैनिकों का भी वध कर डाला तो कामधेनु ने अत्यंत पराक्रमी मारक शस्त्रास्त्रों से युक्त पराक्रमी योद्धाओं को उत्पन्न किया, जिन्होंने शीघ्र ही शत्रु सेना को गाजर-मूली की भाँति काटना आरम्भ कर दिया। अपनी सेना का नाश होते देख विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यन्त कुपित हो वशिष्ठ को मारने दौड़े। वशिष्ठ ने उनमें से एक पुत्र को छोड़ कर शेष सभी को भस्म कर दिया।" अपनी सेना तथा पुत्रों के नष्ट हो जाने से विश्वामित्र बड़े दुःखी हुये। अपने बचे हुये पुत्र को राज सिंहासन सौंप कर वे तपस्या करने के लिये हिमालय की कन्दराओं में चले गये। कठोर तपस्या करके विश्वामित्र ने महादेव को प्रसन्न कर लिया ओर उनसे दिव्य शक्तियों के साथ सम्पूर्ण धनुर्विद्या के ज्ञान का वरदान प्राप्त कर लिया।[2] वसिष्ठ से पराजय इस प्रकार सम्पूर्ण धनुर्विद्या का ज्ञान प्राप्त करके विश्वामित्र प्रतिशोध लेने के लिये वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुँचे। उन्हें ललकार कर विश्वामित्र ने अग्नि बाण चला दिया। अग्नि बाण से समस्त आश्रम में आग लग गई और आश्रमवासी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। वशिष्ठ ने भी अपना धनुष संभाल लिया और बोले- "मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, तू मुझ पर वार कर। आज मैं तेरे अभिमान को चूर-चूर करके बता दूँगा कि क्षात्र बल से ब्रह्म बल श्रेष्ठ है।" क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने एक के बाद एक 'आग्नेयास्त्र', 'वरुणास्त्र', 'रुद्रास्त्र', 'ऐन्द्रास्त्र' तथा 'पाशुपतास्त्र' एक साथ छोड़ दिये, जिन्हें वशिष्ठ ने अपने मारक अस्त्रों से मार्ग में ही नष्ट कर दिया। इस पर विश्वामित्र ने और भी अधिक क्रोधित होकर 'मानव', 'मोहन', 'गान्धर्व', 'जूंभण', 'दारण', 'वज्र', 'ब्रह्मपाश', 'कालपाश', 'वरुणपाश', 'पिनाक', 'दण्ड', 'पैशाच', 'क्रौंच', 'धर्मचक्र', 'कालचक्र', 'विष्णुचक्र', 'वायव्य', 'मंथन', 'कंकाल', 'मूसल', 'विद्याधर', 'कालास्त्र' आदि सभी अस्त्रों का प्रयोग कर डाला। वशिष्ठ ने उन सबको नष्ट करके ब्रह्मास्त्र छोड़ने के लिये जब अपना धनुष उठाया तो सब देव-किन्नर आदि भयभीत हो गये, किन्तु वशिष्ठ तो उस समय अत्यन्त क्रुद्ध हो रहे थे। उन्होंने ब्रह्मास्त्र छोड़ ही दिया। ब्रह्मास्त्र के भयंकर ज्योति और गगनभेदी नाद से सारा संसार पीड़ा से तड़पने लगा। सब ऋषि-मुनि उनसे प्रार्थना करने लगे कि आपने विश्वामित्र को परास्त कर दिया है। अब आजप ब्रह्मास्त्र से उत्पन्न हुई ज्वाला को शान्त करें। इस प्रार्थाना से द्रवित होकर उन्होंने ब्रह्मास्त्र को वापस बुलाया और मन्त्रों से उसे शान्त किया।[2] तपस्या पराजित होकर विश्वामित्र मणिहीन सर्प की भाँति पृथ्वी पर बैठ गये और सोचने लगे कि निःसन्देय क्षात्र बल से ब्रह्म बल ही श्रेष्ठ है। अब मैं तपस्या करके ब्राह्मण की पदवी और उसका तेज प्राप्त करूँगा। इस प्रकार विचार करके वे अपनी पत्नी सहित दक्षिण दिशा की और चल दिये। उन्होंने तपस्या करते हुये अन्न का त्याग कर केवल फलों पर जीवन-यापन करना आरम्भ कर दिया। एक हज़ार वर्ष तक तपस्या करने के पश्चात ब्रह्मा ने प्रकट होकर कहा- "हे राजर्षि, तुमने अपने तप से सब लोक जीत लिये हैं।" ब्रह्मा के मुँह से 'राजर्षि' शब्द सुनकर उन्हें बहुत बुरा लगा और विश्वामित्र ने सोचा कि उनकी तपस्या में अभी भी कुछ कमी है।[3] मेनका और विश्वामित्र तपस्या करते हुए सबसे पहले मेनका अप्सरा के माध्यम से विश्वामित्र के जीवन में काम का विघ्न आया। ये सब कुछ छोड़कर मेनका के प्रेम में डूब गये। जब इन्हें होश आया तो इनके मन में पश्चात्ताप का उदय हुआ। ये पुन: कठोर तपस्या में लगे और सिद्ध हो गये। काम के बाद क्रोध ने भी विश्वामित्र को पराजित किया। त्रिशंकु और विश्वामित्र राजा त्रिशंकु सदेह स्वर्ग जाना चाहते थे। यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होने के कारण वसिष्ठ जी ने उनका कामनात्मक यज्ञ कराना स्वीकार नहीं किया। विश्वामित्र के तप का तेज़ उस समय सर्वाधिक था। त्रिशंकु विश्वामित्र के पास गये। वसिष्ठ ने पुराने बैर को स्मरण करके विश्वामित्र ने उनका यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया। सभी ऋषि इस यज्ञ में आये, किन्तु वसिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आये। इस पर क्रोध के वशीभूत होकर विश्वामित्र ने उन्हें मार डाला। अपनी भयंकर भूल का ज्ञान होने पर विश्वामित्र ने पुन: तप किया और क्रोध पर विजय करके ब्रह्मर्षि हुए। सच्ची लगन और सतत उद्योग से सब कुछ सम्भव है, विश्वामित्र ने इसे सिद्ध कर दिया। रामचन्द्र और विश्वामित्र श्री विश्वामित्र जी को भगवान श्रीराम का दूसरा गुरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये दण्डकारण्य में यज्ञ कर रहे थे। रावण के द्वारा वहाँ नियुक्त ताड़का सुबाहु और मारीच जैसे- राक्षस इनके यज्ञ में बार-बार विघ्न उपस्थित कर देते थे। विश्वामित्र जी ने अपने तपोबल से जान लिया कि त्रैलोक्य को भय से त्राण दिलाने वाले परब्रह्म श्रीराम का अवतार अयोध्या में हो गया है। फिर ये अपनी यज्ञ रक्षा के लिये श्री राम को महाराज दशरथ से माँग ले आये। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हुई। इन्होंने भगवान श्री राम को अपनी विद्याएँ प्रदान कीं और उनका मिथिला में श्री सीता जी से विवाह सम्पन्न कराया। महर्षि विश्वामित्र आजीवन पुरुषार्थ और तपस्या के मूर्तिमान प्रतीक रहे। सप्तऋषि मण्डल में ये आज भी विद्यमान हैं। क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के रूप में महर्षि विश्वामित्र के समान शायद ही कोई हो। इन्होंने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व प्राप्त किया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने, देवताओं और ऋषियों के लिये पूज्य बन गये और उन्हें सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही सबके लिये वे वन्दनीय भी बन गये। इनकी अपार महिमा है। इन्हें अपनी समाधिजा प्रज्ञा से अनेक मन्त्रस्वरूपों का दर्शन हुआ, इसलिये ये 'मन्त्रद्रष्टा ऋषि' कहलाते हैं। ऋग्वेद के दस मण्डलों में तृतीय मण्डल, जिसमें 62 सूक्त हैं, इन सभी सूक्तों (मन्त्रों का समूह) के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र ही हैं। इसीलिये तृतीय मण्डल 'वैश्वामित्र-मण्डल' कहलाता है। इस मण्डल में इन्द्र, अदिति, अग्निदेव, उषा, अश्विनी तथा ऋभु आदि देवताओं की स्तुतियाँ हैं और अनेक ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म आदि की बातें विस्तृत हैं, अनेक मन्त्रों में गौ-महिमा का वर्णन है। तृतीय मण्डल के साथ ही प्रथम, नवम तथा दशम मण्डल की कतिपय ऋचाओं के द्रष्टा विश्वामित्र के मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्र हुए हैं। वैसे तो वेद की महिमा अनन्त है ही, किंतु महर्षि विश्वामित्र जी के द्वारा दृष्ट यह तृतीय मण्डल विशेष महत्त्व का है, क्योंकि इसी तृतीय मण्डल में ब्रह्म-गायत्री का जो मूल मन्त्र है, वह उपलब्ध होता है। इस ब्रह्म-गायत्री-मन्त्र के मुख्य द्रष्टा तथा उपदेष्टा आचार्य महर्षि विश्वामित्र ही हैं। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के 62वें सूक्त का दसवाँ मन्त्र 'गायत्री-मन्त्र' के नाम से विख्यात है, जो इस प्रकार है- तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्॥ यदि महर्षि विश्वामित्र न होते तो यह मन्त्र हमें उपलब्ध न होता, उन्हीं की कृपा से, साधना से यह गायत्री-मन्त्र प्राप्त हुआ है। यह मन्त्र सभी वेदमन्त्रों का मूल है- बीज है, इसी से सभी मन्त्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिये गायत्री को 'वेदमाता' कहा जाता है। यह मन्त्र सनातन परम्परा के जीवन में किस तरह अनुस्यूत है तथा इसकी कितनी महिमा है, यह तो स्वानुभव-सिद्ध है। उपनयन-संस्कार में गुरुमुख द्वारा इसी मन्त्र के उपदेश से द्विजत्व प्राप्त होता है और नित्य-सन्ध्याकर्म में मुख्य रूप से प्राणायाम, सूर्योपस्थान आदि द्वारा गायत्री-मन्त्र के जप की सिद्धि में ही सहायता प्राप्त होती है। इस प्रकार यह गायत्री-मन्त्र महर्षि विश्वामित्र की ही देन है और वे इसके आदि आचार्य हैं। अत: गायत्री-उपासना में इनकी कृपा प्राप्त करना भी आवश्यक है। इन्होंने गायत्री-साधना तथा दीर्घकालीन संध्योपासना की तप:शक्ति से काम-क्रोधादि विकारों पर विजय प्राप्त की और ये तपस्या के आदर्श बन गये। महर्षि ने केवल वैदिक मन्त्रों के माध्यम से ही गायत्री-उपासना पर बल दिया, अपितु उन्होंने अन्य जिन ग्रन्थों का प्रणयन किया, उनमें भी मुख्य रूप से गायत्री-साधना का ही उपदेश प्राप्त होता है। 'विश्वामित्रकल्प,' 'विश्वामित्रसंहिता' तथा 'विश्वामित्रस्मृति' आदि उनके मुख्य ग्रन्थ हैं। इनमें भी सर्वत्र गायत्री देवी की आराधना का वर्णन दिया गया है और यह निर्देश है कि अपने अधिकारानुसार गायत्री-मन्त्र के जप से सभी सिद्धियाँ तो प्राप्त हो ही जाती हैं। इसीलिये केवल इस मन्त्र के जप कर लेने से सभी मन्त्रों का जप सिद्ध हो जाता है। महामुनि विश्वामित्र तपस्या के धनी हैं। इन्हें गायत्री-माता सिद्ध थीं और इनकी पूर्ण कृपा इन्होंने प्राप्त थी। इन्होंने नवीन सृष्टि तथा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आदि भेजने और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने-सम्बन्धी जो भी असम्भव कार्य किये, उन सबके पीछे गायत्री-जप एवं संध्योपासना का ही प्रभाव था। भगवती गायत्री कैसी हैं, उनका क्या स्वरूप है, उनकी आराधना कैसे करनी चाहिये, यह सर्वप्रथम आचार्य विश्वामित्र जी ने ही हमें बताया है। उन्होंने भगवती गायत्री को सर्वस्वरूपा बताया है और कहा है कि यह चराचर जगत स्थूल-सूक्ष्म भेद से भगवती का ही विग्रह है, तथापि उपासना और ध्यान की दृष्टि से उनका मूल स्वरूप कैसा है- इस विषय में उनके द्वारा रचित निम्न श्लोक द्रष्टव्य है, जो आज भी गायत्री के उपासकों तथा नित्य सन्ध्या- वन्दनादि करने वालों के द्वारा ध्येय होता रहता है- [4]'जो मोती मूँगा, सुवर्ण, नीलमणि तथा उज्ज्वल प्रभा के समान वर्णवाले पाँच मुखों से सुशोभित हैं। तीन नेत्रों से जिनके मुख की अनुपम शोभा होती है। जिनके रत्नमय मुकुट में चन्द्रमा जड़े हुए हैं, जो चौबीस वर्णों से युक्त हैं तथा जो वरदायिनी गायत्री अपने हाथों में अभय और वरमुद्राएँ, अंकुश, पाश, शुभ्रकपाल, रस्सी, शंख, चक्र और दो कमल धारण करती हैं, हम उनका ध्यान करते हैं'। इस प्रकार महर्षि विश्वामित्र का इस जगत पर महान् उपकार ही है। महिमा के विषय में इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि साक्षात भगवान जिन्हें अपना गुरु मानकर उनकी सेवा करते थे। महर्षि ने सभी शास्त्रों तथा धनुर्विद्या के आचार्य श्रीराम को बला, अतिबला आदि विद्याएँ प्रदान कीं, सभी शास्त्रों का ज्ञान प्रदान किया और भगवान श्रीराम की चिन्मय लीलाओं के वे मूल-प्रेरक रहे तथा लीला-सहचर भी बने। क्षमा की मूर्ति वसिष्ठ के साथ विश्वामित्र का जो विवाद हुआ, प्रतिस्पर्धा हुई, वह भी लोकशिक्षा का ही एक रूप है। इस आख्यान से गौ-महिमा, त्याग का आदर्श, क्षमा की शक्ति, तपस्या की शक्ति, उद्यम की महिमा, पुरुषार्थ एवं प्रयत्न की दृढ़ता, कर्मयोग, सच्ची लगन और निष्ठा एवं दृढ़तापूर्वक कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। इस आख्यान से लोक को यह शिक्षा लेनी चाहिये कि काम, क्रोध आदि साधना के महान् बाधक हैं, जब तक व्यक्ति इनके मोहपाश में रहता है; उसका अभ्युदय सम्भव नहीं, किंतु जब वह इन आसुरी सम्पदाओं का परित्याग कर दैवी-सम्पदा का आश्रय लेता है तो वह सर्वपूज्य, सर्वमान्य तथा भगवान का प्रियपात्र हो जाता है। महर्षि वसिष्ठ से जब वे परास्त हो गये, तब उन्होंने तपोबल का आश्रय लिया, काम-क्रोध के वशीभूत होने का उन्हें अनुभव हुआ, अन्त में सर्वस्व त्याग कर वे अनासक्त पथ के पथिक बन गये और जगद्वन्द्य हो गये। ब्रह्मा जी स्वयं उपस्थित हुए, उन्होंने उन्हें बड़े आदर से ब्रह्मर्षिपद प्रदान किया। महर्षि वसिष्ठ ने उनकी महिमा का स्थापन किया और उन्हें हृदय से लगा लिया। दो महान् संतों का अद्भुत मिलन हुआ। देवताओं ने पुष्पवृष्टि की। सत्यधर्म के आदर्श राजर्षि हरिश्चन्द्र महर्षि विश्वामित्र की दारुण परीक्षा से ही हरिश्चन्द्र की सत्यता में निखार आया, उस वृत्तान्त में महर्षि अत्यन्त निष्ठुर से प्रतीत होते हैं, किंतु महर्षि ने हरिश्चन्द्र को सत्यधर्म की रक्षा का आदर्श बनाने तथा उनकी कीर्ति को सर्वश्रुत एवं अखण्ड बनाने के लिये ही उनकी इतनी कठोर परीक्षा ली। अन्त में उन्होंने उनका राजैश्वर्य उन्हें लौटा दिया, रोहिताश्व को जीवित कर दिया और महर्षि विश्वामित्र की परीक्षा रूपी कृपा प्रसाद से ही हरिश्चन्द्र राजा से राजर्षि हो गये, सबके लिये आदर्श बन गये। ऐतरेय ब्राह्मण आदि में भी हरिश्चन्द्र के आख्यान में महर्षि विश्वामित्र की महिमा का वर्णन आया है। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में 30वें, 33वें तथा 53वें सूक्त में महर्षि विश्वामित्र का परिचयात्मक विवरण आया है। वहाँ से ज्ञान होता है कि ये कुशिक गोत्रोत्पन्न कौशिक थे। [5] ये कौशिक लोग महान् ज्ञानी थे, सारे संसार का रहस्य जानते थे। [6] ऋग्वेद 53वें सूक्त के 9वें मन्त्र से ज्ञात होता है कि महर्षि विश्वामित्र अतिशय सामर्थ्यशाली, अतीन्द्रियार्थद्रष्टा, देदीप्यमान तेजों के जनयिता और अध्वर्यु आदि में उपदेष्टा हैं तथा राजा सुदास के यज्ञ के आचार्य रहे हैं। महाभारत और पुराणों में विश्वामित्र महर्षि विश्वामित्र के आविर्भाव का विस्तृत आख्यान पुराणों तथा महाभारत आदि में आया है। भरत वंश की परंपरा राजा अजमीढ़, जह्नु, सिंधुद्वीप, बलाश्व, बल्लभ, कुशिक से होती हुई गाधि तक पहुंची। गाधि दीर्घकाल तक पुत्रहीन रहे तथा अनेक पुण्यकर्म करने के उपरांत उन्हें सत्यवती नामक कन्या की प्राप्ति हुई। च्यवन के पुत्र भृगुवंशी ऋचीक ने सत्यवती की याचना की तो गाधि ने उसे दरिद्र समझकर शुल्क रूप में उससे एक सहस्त्र श्वेत वर्ण तथा एक ओर से काले कानों वाले एक सहस्त्र घोड़े मांगे। ऋचीक ने वरुणदेव की कृपा से शुल्क देकर सत्यवती से विवाह कर लिया। कालांतर में पत्नी से प्रसन्न होकर ऋचीक ने वर मांगने को कहा। सत्यवती ने अपनी माँ की सलाह से माँ के तथा अपने लिए एक-एक पुत्र की कामना की। *ऋचीक ने सत्यवती को दोनों के खाने के लिए एक-एक मन्त्रपूत चरु दिया तथा ऋतुस्नान के उपरांत माँ को पीपल के वृक्ष का आलिंगन तथा सत्यवती को गूलर का आलिंगन करने को कहा। माँ ने यह सोचकर कि अपने लिए निश्चय ही ऋचीक ने अधिक अच्छे बालक की योजना की होगी, बेटी पर अधिकार जमाकर चारू बदल लिए तथा स्वयं गूलर का और सत्यवती को पीपल का आलिंगन करवाया। गर्भवती सत्यवती को देखकर ऋचीक पर यह भेद खुल गया। उसने कहा-'सत्यवती, मैंने तुम्हारे लिए ब्राह्मण पुत्र तथा माँ के लिए क्षत्रियपुत्र की योजना की थी।' सत्यवती यह जानकर बहुत दुखी हुई। उसने ऋचीक से प्रार्थना की कि उसका पौत्र भले ही क्षत्रिय हो जाय, पर पुत्र ब्राह्मण हो। यथासमय सत्यवती की परम्परा में पुत्र रूप में जमदग्नि पैदा हुए और उन्हीं के पुत्र परशुराम हुए। जमदग्नि तथा गाधि नामक विख्यात राजा को विश्वामित्र नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। गाधि ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक कर अपने शरीर का त्याग कर दिया। प्रजा के मन में पहले से ही संशय था कि विश्वामित्र प्रजा की रक्षा कर पायेंगे कि नहीं। कालांतर में स्पष्ट हो गया कि वे गाधि जितने समर्थ राजा नहीं हैं। प्रजा राक्षसों से भयभीत थी, अत: विश्वामित्र अपनी सेना लेकर निकले। वे वसिष्ठ के आश्रम के निकट पहुंचे। वसिष्ठ उनके सैनिकों को अन्याय आदि करते देख उनसे रुष्ट हो गये तथा अपनी गौ नंदिनी से उन्होंने भयानक पुरुषों की सृष्टि करने के लिए कहा। उन भयानक पुरुषों ने राजसैनिकों को मार भगाया। अपनी पराजय देखकर विश्वामित्र ने तप को अधिक प्रबल मानकर तपस्या में अपना मन लगाया। वे ब्रह्माजी के सरोवर से उत्पन्न हुई सरस्वती नदी के तट पर चले गये। वहां उन्होंने अर्ष्टिषेण तीर्थ का सेवन कर ब्रह्मा से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। कालांतर में तपस्या करते हुए उनको वसिष्ठ से स्पर्धा तदनंतर बैर हो गया। सरस्वती के पूर्वी तट पर वसिष्ठ तथा पश्चिमी तट पर विश्वामित्र तपस्या में लगे थे। एक दिन उन्होंने सरस्वती को बुलाकर कहा कि वह वसिष्ठ को बहाकर उनके पास ले आये ताकि वे वसिष्ठ का वध कर पायें। सरस्वती दोनों में से किसी का भी अहित करने से शाप की संभावना का अनुभव कर रही थी, अत: उसने वसिष्ठ से जाकर सब कह सुनाया। उन्होंने उसे विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करने के लिए कहा। सरस्वती ने पूर्वी तट को तोड़कर बहाया तथा उस तट को वसिष्ठ सहित विश्वामित्र के पास पहुंचा दिया। विश्वामित्र जप और होम कर रहे थे। वे वसिष्ठ को मारने के लिए कोई अस्त्र ढूंढ़ ही रहे थे कि सरस्वती ने पुन: बहाकर उन्हें दूसरे तट पर पहुंचा दिया। वसिष्ठ को फिर से पूर्वी तट पर देख विश्वामित्र सरस्वती से रुष्ट हो गये। उन्होंने शाप दिया कि वहां उसका जल रक्तमिश्रित हो जाये। उस स्थल पर सरस्वती का जल रक्त की धारा बन गया तथा उसका पान विभिन्न राक्षस इत्यादि करने लगे। कालांतर में कुछ मुनि तीर्थाटन करते हुए वहां पहुंचे। वहां रक्त देख तथा सरस्वती से समस्त घटना के विषय में जानकर उन लोगों ने शिव की उपासना की। उनकी कृपा से शापमुक्त होकर सरस्वती पुन: स्वच्छ जल-युक्त हो गयी। जो राक्षस निरंतर प्रवाहित रक्त का पान कर रहे थे, वे अतृप्त और भूखे होने के कारण मुनियों की शरण में गये। उन्होंने अपने पापों को मुक्त कंठ से स्वीकार किया तथा उनसे छुटकारा प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। उन्हें पापमुक्त करने की मुनियों की इच्छा जानकर सरस्वती अपनी ही स्वरूपभूता 'अरुणा' को ले आयी। उसके जल में स्नान करके राक्षस अपने शरीर का त्याग कर स्वर्ग चले गये। अरुणा ब्रह्महत्या का निवारण करने वाली नदी है। त्रेता युग और द्वापर युग की संधि के समय बारह वर्ष तक अनावृष्टि रही। विश्वामित्र भूख से पीड़ित हो अपने परिवार को जनसमुदाय में छोड़कर भक्ष्य-अभक्ष्य ढूंढ़ने निकल पड़े। उन्हें एक चांडाल के घर में कुत्ते की जांघ का मांस दिखायी दिया। वे उसे चुराने की इच्छा से वहीं रह गये। रात्रि के समय यह सोचकर कि सब सो रहे हैं, वे घर में घुसे। चांडाल जगा हुआ था। अत: उसने पूछा, कौन है। परिचय पाकर तथा प्रयोजन जानकर उसने उन्हें इस कुकर्म से विरक्त होने के लिए कहा। यह भी कहा कि मुनि के लिए कुत्ते की जांघ का मांस अभक्ष्य है। विश्वामित्र ने आपत्धर्म मानकर वह मांस वहां से ले लिया तथा अपने परिवार के साथ भक्षण करने का विचार किया। मार्ग में उन्हें ध्यान आया कि इसमें से यज्ञादि के द्वारा देवताओं का भाग भी निकाल देना चाहिए। उनके यज्ञ करते-करते ही वर्षा प्रारंभ हो गयी तथा दुर्भिक्ष दूर हो गया। [7] विश्वामित्र ने अपने सातों लड़कों से रुष्ट होकर उन्हें अपने आश्रम से निकाल दिया तथा शाप दिया। वे गर्ग मुनि को गुरु बनाकर रहने लगे। मुनि के पास एक गाय थी। वह हर साल एक बच्चा देती थी। एक दिन उसे जंगल से लाने गये तो सातों ने सबसे छोटे की सलाह से पितरों का आवाहन करके श्राद्ध निमित्त उस गाय को मारकर खा लिया तथा मुनि से यह कह दिया कि सिंह उसे खा गया है। मुनि ने मान लिया। गाय मारते हुए पितरों का आवाहन करने के कारण वे ज्ञान से च्युत नहीं हुए। पाप कर्म के कारण वे मरकर व्याध के घर में पैदा हुए। इसी प्रकार वे क्रमश: हरिण, चकवा-चकवी, हंस हुए, तदनंतर उनमें से चार ब्राह्मण घर में उत्पन्न हुए और जो राजा बनने के लोभी थे, वे राजा ब्रह्मदत्त और उसके दो मन्त्रियों के रूप में जन्मे। गोवध करते हुए भी पितरों का आवाहन करने के कारण वे अपने पूर्वज्ञान को भूले नहीं। राजा ब्रह्मदत्त की पत्नी राजा से काम-संबंध स्थापित नहीं करती थी। उसे सब ज्ञात था और वह राजा को धर्म के मार्ग की ओर अग्रसर करना चाहती थी। संयोग से चार ब्राह्मण भाई तीर्थाटन के लिए उद्यत हुए तो उन्होंने अपने बूढ़े पिता के हाथ राजा और मन्त्रियों को पूर्वजन्म का आख्यान लिख भेजा। राजा ने ब्राह्मण को धन देकर विदा किया तथा अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर वह योग की ओर प्रवृत्त हुआ। मन्त्रियों ने भी वही मार्ग अपनाकर मुक्ति प्राप्त की। इस प्रकार विश्वामित्र के सातों पुत्रों की इहलोक से मुक्ति हुई। इसका श्रेय पितरों की भक्ति को दिया गया है। [8] पन्ने की प्रगति अवस्था आधार प्रारम्भिक माध्यमिक पूर्णता शोध टीका टिप्पणी और संदर्भ ऊपर जायें ↑ ऋग्वेद(3।26।2-3)। ↑ इस तक ऊपर जायें: 2.0 2.1 2.2 विश्वामित्र की कथा (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 10 मई, 2013। ऊपर जायें ↑ बाल्मीकि रामायण, बाल कांड,सर्ग 52 1-23, सर्ग 53, 1-25, सर्ग 54,1-23, सर्ग 55, 1-28, सर्ग 56, 1-24, सर्ग 57 श्लोक 1-9, ऊपर जायें ↑ मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणैर्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम्। गायत्रीं वरदाभयांकुशकशा: सुभ्रं कपालं गुणं शंख चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे॥ (देवीभागवत 12।3 ऊपर जायें ↑ ऋग्वेद(3।26।2-3)। ऊपर जायें ↑ ऋग्वेद(3।29।15)। ऊपर जायें ↑ महाभारत, शल्यपर्व, 40।13-32।–42, 43। 1-31, शांतिपर्व, 141।–, दानधर्मपर्व, 4। ऊपर जायें ↑ शिव पुराण, 11। 25-26 संबंधित लेख [छिपाएँ] देखें • वार्ता • बदलें रामायण रामायण संदर्भ अंगद · अंगद (लक्ष्मण पुत्र) · अज · अयोध्या · असमंजस · अहिल्या · उत्तर कुरु · उर्मिला · किष्किन्धा · वाल्मीकि आश्रम · वरूथ · कुबेर · कुम्भकर्ण · केसरी · कैकसी · प्रहस्त · कैकेयी · कौशल्या · खर दूषण · गरुड़ · चित्रकूट · जयंत · जटायु · जनक · जामवन्त · ताड़का · तारा · दशरथ · नल · नाभाग · निमि · नील · पंचवटी · पम्पासर · बालि · शरभ (रामायण) · सुलोचना · सुमन्त्र · 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