Thursday, 12 October 2017

ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62 वें सूत्र का 10वाँ मन्त्र है।

  awgp.org आप यहाँ क्लिक करके अथवा फोनाटिक टाइपिंग से हिंदी टाइप कर सकते हैं ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ <-- अ आ ऽ ा ँ क ख ग घ ङ क़ इ ई ि ी ं च छ ज झ ञ ख़ उ ऊ ु ू ः ट ठ ड ढ ण ग़ ऋ ऌ ृ ॄ ॑ त थ द ध न ज़ ऍ ऎ ॅ ॆ ॒ प फ ब भ म ड ए ऐ े ै ॓ य र ऱ ल ळ ढ़ ऑ ऒ ॉ ॊ ॔ व श ष स ह फ ओ औ ो ौ ़ क्ष त्र ज्ञ ऴ ः य ॻ ॼ ॽ ॾ ॿ ॰ ॱ ॲ ् ँ ं । ॥   Space ॐ ॠ ॡ 🔍 PAGE TITLES July 1958 गायत्री के प्रथम मन्त्र-दृष्टा-महर्षि विश्वामित्र वैदिक साहित्य और परवर्ती हिन्दू धार्मिक तथा दर्शन साहित्य में गायत्री-मन्त्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। गायत्री-मन्त्र का प्रथम दर्शन वैदिक युग के क्राँतिकाल में ऐतिहासिक महर्षि विश्वामित्र द्वारा हुआ है। क्रम के अनुसार यह ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62 वें सूत्र का 10वाँ मन्त्र है। ऋग्वेद तृतीय मंडल के ऋषि विश्वामित्र हैं अतः गायत्री के महत्व को समझने के लिए यह आवश्यक है कि महर्षि विश्वामित्र के जीवन-परिचय और कार्यकलापों का मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने का प्रयत्न करें। पौराणिक वार्त्ताओं और हिन्दू समाज में प्रचलित अनेक कथाओं से सिद्ध होता है कि वैदिक युग में महर्षि विश्वामित्र एक बहुत ही क्राँतिकारी और महान व्यक्तित्व लेकर अवतरित हुए थे। बोधायन सूत्र और अध्यात्म रामायण दोनों के अनुसार सप्त ऋषियों में उनका नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। (1) नई सृष्टि की रचना, त्रिशंकु और सदेह स्वर्ग भेज देना, जीवन रक्षा के लिए कुत्ते के माँस का भक्षण भी उचित समय पर करना, ब्रह्मर्षि और राजर्षि के सैद्धांतिक प्रश्न को लेकर वशिष्ठ से निरन्तर संघर्ष करना, बिना नरमेध यज्ञ किए ही राजा हरिश्चंद्र को रोग मुक्त करना और मेनका द्वारा तपस्या भंग किया जाना आदि अनेक पौराणिक कथाएं इनके नाम के साथ जुड़ी हुई हैं, जो इनके ऐतिहासिक अस्तित्व और महत्व को सिद्ध करती हैं। इन कथाओं और वैदिक सूत्रों के आधार पर इनके जीवन के क्राँतिपूर्ण कार्यों को खोजकर प्रकाश में लाना बहुत मनोरंजक और जिज्ञासु पाठकों के लिए बड़ा लाभकारी सिद्ध होगा। यद्यपि इस प्राचीनकाल की घटनाओं का यथातथ्य विवरण देना उतना सरल नहीं है किन्तु उनका वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण करना अनुचित न होगा। ऋग्वेद के मन्त्रों से सिद्ध होता है कि उन दिनों त्वष्टा, पर्जन्य और द्यावा पृथ्वी जैसे देवताओं के स्थान पर इन्द्र, वरुण, अग्नि, सूर्य, और सोम जैसे देवता अधिक लोक-प्रिय हो चले थे। राजनैतिक, सामाजिक और साँस्कृतिक नेतृत्व ऋषियों के हाथ में था जो मन्त्र दृष्टा होने के साथ-साथ अच्छे योद्धा भी होते थे और शस्त्र तथा शास्त्र दोनों के द्वारा समाज की रक्षा करते थे। आर्यों और दस्युओं में पारस्परिक संघर्ष होने के कारण एक दूसरे के विषय में 1- विश्वामित्रोऽथ जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गोतमः। अत्रिर्वशिष्ठः कश्यपः इत्येते सर्प्तषयः। (बोधायन सूत्र, प्रवर अध्याय) 2- विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासः भृगुरंगिरा। वशिष्ठो वामदेवोऽभिस्तथा सर्प्तषयोऽमला। (अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड) समाज में अनेक अनर्गल बातें प्रचलित थीं। आगे चलकर दोनों सभ्यताओं में समन्वय स्थापित हुआ और दस्युओं के उपास्यदेव शिवलिंग उग्रदेव को आर्यों ने भी अपनाया जो ‘शंकर’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। ऐसी ही सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों में विश्वामित्र का जन्म हुआ। सप्तसिन्धु में उस समय भरत, तृस्तु, श्रंजय, मरुत, भृगु और पक्थ आदि प्रमुख कुल थे। विश्वामित्र इनमें से प्रसिद्ध भरत वंश में उत्पन्न हुए। वे जन्हु के प्रप्रोत्र, कुशिक के पौत्र, और महाराज गाधि के पुत्र थे। इतिहास प्रसिद्ध भगवान परशुराम के पिता और महर्षि ऋचीक और सत्यवती के पुत्र महर्षि जमदग्नि विश्वामित्र के भानजे थे। जमदग्नि और प्रसिद्ध ऋग्वेद कालीन राजा दिवोदास के पुत्र और सुदास के साथ महर्षि मैत्रावरुण अगस्त्य के आश्रम में इन्होंने शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ग्रहण की। ऋषि-पत्नी लोपामुद्रा इनकी प्रतिभा, बुद्धि और विद्या पर मोहित थी और इन्हीं गुणों के कारण इन्हें लोपामुद्रा का विशेष स्नेह प्राप्त था। आश्रम में बाण विद्या का अद्भुत कौशल दिखाकर इन्होंने अपने से वरिष्ठ सहपाठियों का भी हृदय जीत लिया था। वे वहाँ बड़े लोकप्रिय थे। एक बार दस्युराज शम्बर ने आश्रम पर छापा मारा और इनके एक सहपाठी ऋक्ष के साथ इनका अपहरण कर ले गया। शम्बर ने इन्हें अपने लोहे के किले में बन्द कर दिया और अनेक प्रकार की यातनाएं देने लगा। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों में इन्हें एक बार कुत्ते का माँस खाकर अपनी प्राण-रक्षा करनी पड़ी होगी। अपने कौशल और बुद्धि चातुर्य से वे वहाँ विपत्तियों पर विजय पाने में सफल हुए। उन्होंने शम्बर की पुत्री उग्रा को प्रणय-सूत्र में बाँधकर अपने वश में कर लिया और उसकी सहायता से शम्बर का वध करके वहाँ से निकल भागे। शम्बर के कारागार से लौटकर विश्वामित्र ने तृस्तु कुल को पौरोहित्य पद स्वीकार कर लिया। तृस्तु कुल का राजा सुदास अत्यन्त पराक्रमी और दबदबे वाला था। इस पौराहित्य को लेकर ही सम्भवतः विश्वामित्र और वशिष्ठ में संघर्ष आरम्भ हुआ। वशिष्ठ और विश्वामित्र के वैमनस्य के अनेक संकेत ऋग्वेद के विश्वामित्र द्वारा रचे गये मन्त्रों में मिलते हैं। राजा सुदास के पुरोहित के पद से उसकी मंगल कामना का संकेत भी ऋग्वेद के मन्त्रों में है (1) इन मन्त्रों से सिद्ध होता है कि वशिष्ठ के साथ विश्वामित्र का सैद्धान्तिक मतभेद था, (2) और एक एक बार संघर्ष में विश्वामित्र को वशिष्ठ के भृत्यों के हाथों बन्दी तक होना पड़ा था (3) इस मतभेद का सूत्रपात विश्वामित्र द्वारा शम्बर पुत्री उग्रा का पाणिग्रहण करने पर ही हो गया था। महर्षि वशिष्ठ आर्यों की रक्त शुद्धि के पक्षपाती थे और वे अनार्यों के साथ आर्यों के संपर्क और वैवाहिक सम्बन्धों को अनुचित इमे भोजा अंगिरसो विरुपा दिवस्युभासा असुरस्य वीराः। विश्वमित्राय ददत्तो मद्यानि सहस्त्र सवि प्रतिरन्त आयुः। -ऋग्वेद मण्डल 3, सूत्र 53, अध्याय 7 इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपितवं चिकितुर्न प्रपित्वम्। हिन्वन्त्यश्व मरणं न नित्यं ज्या वाजं परिणामन्त्याजौ। -ऋग्वेद मण्डल 3, सूत्र 53, मंत्र 24 न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः। ना वाजिनं वाजिना हायन्तिनं गर्गभं पुरो अश्वान्नयन्ति। -ऋग्वेद, मण्डल 3, सूत्र 53, तन्त्र 23। और अनियमित ठहराते थे। उसके विपरीत विश्वामित्र कर्म के आधार पर जाति और धर्म की स्थापना करते थे तथा वे शुद्ध करके दस्युओं को भी आर्य बनाने के पक्ष में थे। यही झगड़ा बढ़ते-बढ़ते व्यापक हो गया और इसकी परिणिति आगे चलकर दशराज्ञ (दश राजाओं का युद्ध) में हुई। उग्रा के पाणिग्रहण के प्रश्न को लेकर स्वयं भरतवंश में विश्वामित्र का विरोध होने लगा। महर्षि अगस्त्य उनके अनुज वशिष्ठ, भरत और तृस्तु कुल के राजवंश और यहाँ तक कि विश्वामित्र की माँ घोषा तक उनके विरोध में हो गई। किन्तु विश्वामित्र ने हिम्मत नहीं हारी। अब वे खुले आम दस्युओं की शुद्धि की व्यवस्था देने लगे। इस ‘अनर्थ’ को देखकर वशिष्ठ तो तृस्तु राज्य-क्षेत्र में स्थापित अपना आश्रम तक त्याग कर चले गये। किन्तु धीरे धीरे लोग विश्वामित्र की बातों को समझने और ग्रहण करने लगे। उनके पराक्रम, विद्वता, शीलता, दानवीरता और त्याग वृत्ति का लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। लोग उनके नये दर्शन, नई विचारधारा और आचार विचारों के सम्बन्ध में नई व्यवस्था को स्वीकार करने लगे। स्वयं राजा सुदास ने अपने पूर्व व्यवहार के लिए उनसे क्षमा-याचना की। उग्रा की मृत्यु को चुकी थी, अब अगस्त्य और लोपामुद्रा ने अपनी पुत्री रोहिणी से विश्वामित्र का पाणिग्रहण करा दिया। इस प्रकार सफलता से उत्साहित होकर विश्वामित्र ने गायत्री-मन्त्र की घोषणा की और कहा कि जो कोई व्यक्ति इन मन्त्र का विधिवत् जप करेगा उसे विशुद्ध आर्य समझा जायेगा चाहे उसका जन्म किसी भी प्रकार के वंश में हुआ हो। किन्तु सफलता के साथ ही विश्वामित्र के जीवन का संघर्ष आरम्भ हुआ। प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ अपने रूढ़िगत विचारों के कारण खुलकर उनका विरोध करने लगीं। महर्षि वशिष्ठ ने व्यवस्था दी कि विश्वामित्र का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ है अतः वे तपस्या करने पर भी केवल राजर्षि हो सकते हैं, ब्रह्मर्षि कहलाने के अधिकारी वे नहीं है। विश्वामित्र ने इन सब रूढ़ियों का विरोध किया। उनका एक अनुयायी त्रिशंकु वशिष्ठ से निराश होकर उनके पास संदेह स्वर्ग जाने की इच्छा लेकर आया। विश्वामित्र ने नरक और स्वर्ग की व्याख्या करके उसे समझाया कि नरक और स्वर्ग सब इसी जीवन में हैं। यद्यपि आगे चलकर अपने अभिमान के कारण त्रिशंकु का पतन हुआ किन्तु इतिहास जानता है कि एक बार विश्वामित्र की कृपा से शंकाओं से मुक्त होकर वह स्वर्ग का अधिकारी हुआ था। विश्वामित्र और वशिष्ठ का संघर्ष केवल पुरोहित पद के लिए उनकी प्रतिद्वन्द्विता के आधार पर ही नहीं था बल्कि यह प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद के बीच में होने वाला संघर्ष था। निस्संदेह इस संघर्ष में प्रगतिशील तत्वों का नेतृत्व विश्वामित्र करते थे। वे स्वर्ग और नरक दोनों का भोग वर्तमान जीवन में ही मानते थे और इस गहन दर्शन को सर्वसाधारण के लिए सुगम बना देने की क्षमता भी उनमें थी। उनके द्वारा नई सृष्टि की रचना की घटना भी इसी बात की ओर संकेत कर रही है कि तत्कालीन सामाजिक विधान उन्हें अमान्य थे और वे उनमें मौलिक परिवर्तन करना चाहते थे, जिनसे भद्र समाज भयभीत हो गया था। मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग कराने की घटना भी इसी ओर संकेत करती है कि वे तत्कालीन अभिजात वर्ग के लिए एक चुनौती के रूप में थे और किसी प्रकार उन्हें समाज की दृष्टि से पतित सिद्ध कर देना ही उस वर्ग को अभीष्ट था। बिना नरमेध के हरिश्चंद्र को रोग-मुक्त कर देने की घटना बताती है कि वे अन्धविश्वास और मिथ्या कर्मकाण्ड में विश्वास न करके वस्तुओं के वैज्ञानिक विवेचन में विश्वास करते थे। वशिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष के फलस्वरूप होने वाले ‘दशराज्ञ’ का स्पष्ट उल्लेख ऋग्वेद में है। कथा सूत्रों और ऋग्वेद के संकेतों से ऐसा लगता है कि यह युद्ध निरा आर्यों और दस्युओं के बीच होने वाला युद्ध न होकर एक सैद्धान्तिक युद्ध था। एक पक्ष का नेतृत्व वशिष्ठ करते थे जो आर्यों की रक्त शुद्धि के पक्षपाती तथा दस्युओं और आर्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के प्रबल विरोधी थे; दूसरे पक्ष का नेतृत्व विश्वामित्र के हाथों में था जो कर्म के अनुसार ही आर्य जाति का अस्तित्व मानते थे और जिनका विश्वास था कि आर्य धर्म का पालन और गायत्री का जप करके दस्यु भी आर्य धर्मी हो सकता है। युद्ध में भले ही विश्वामित्र की पराजय हुई किन्तु हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था साक्षी है कि व्यवहार में उनके ही सिद्धान्त की विजय हुई और अन्त में वशिष्ठ ने भी कर्म के अनुसार जाति का अस्तित्व स्वीकार करके उन्हें ‘ब्रह्मर्षि’ कहकर सम्बोधन किया था। उनका यह कर्मवाद का सिद्धाँत आज भी मानव जाति के कल्याण के लिए आदर्श रूप है। Months January February March April May June July August September October November December अखंड ज्योति कहानियाँ प्रवास पर भेजा (kahani) अनगढ़ शिष्य (kahani) सज्जनता बुराई को सज्जनता से खत्म कर देती है (Kahani) जड़ को नमन (Kahani) See More 13_Oct_2017_5_6683.jpg More About Gayatri Pariwar Gayatri Pariwar is a living model of a futuristic society, being guided by principles of human unity and equality. It's a modern adoption of the age old wisdom of Vedic Rishis, who practiced and propagated the philosophy of Vasudhaiva Kutumbakam. Founded by saint, reformer, writer, philosopher, spiritual guide and visionary Yug Rishi Pandit Shriram Sharma Acharya this mission has emerged as a mass movement for Transformation of Era. Contact Us Address: All World Gayatri Pariwar Shantikunj, Haridwar India Centres Contacts Abroad Contacts Phone: +91-1334-260602 Email: shantikunj@awgp.org Subscribe for Daily Messages Books Magazine Language English Hindi Gujrati Kannada Malayalam Marathi Telugu Tamil Stories Collections Articles Open Pages (Folders) Kavita Quotations Visheshank Quick Links Book Catalog Whats New Downloads All WorldGayatri Pariwar

गायत्री मंत्र' किस वेद से लिया गया है?

1. 'गायत्री मंत्र' किस वेद से लिया गया है?

ऋग्वेद

2. वेदों को 'अपौरुषेय' क्यों कहा जाता है?

क्योंकि वेदों की रचना देवताओं द्वारा की गई है।
3. राष्ट्र एवं राजा शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम कब हुआ?
उत्तरवैदिक काल में
4. आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में सर्वाधिक मान्य मत कौन-सा है?
मध्य एशिया में बैक्ट्रिया
5. भागवत धर्म का प्रधान ग्रंथ निम्न में से कौन-सा था?
श्रीमदभागवदगीता
6. जैन मत का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार किस समुदाय में हुआ?
व्यापारी वर्ग

7. जैन धर्म 'श्वेताम्बर' एवं 'दिगम्बर' सम्प्रदायों में कब विभाजित हुआ?
चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में
8. जैन धर्म के विषय में कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
वर्ण व्यवस्था की निन्दा की गई है।
9. बाल गंगाधर तिलक को 'भारतीय असंतोष का पिता' किसने कहा था?
वेलेंटाइल शिरॉल
10. सुभाषचन्द्र बोस से पूर्व 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का कमाण्डर कौन था?
कैप्टन मोहन सिंह

11. ऋग्वेद में 'निष्क' शब्द का प्रयोग किस आभूषण के लिए किया गया है?
गले का हार
12. अथर्ववेद में किन दो संस्थाओं को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है?
सभा एवं समिति

13. विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में वर्णित नाम 'चन्द्रसिरी' (चन्द्र श्री) के रूप में किस राजा की पहचान की गई है?
चन्द्रगुप्त
14. निम्नलिखित में से कौन-सा प्रांत मौर्य साम्राज्य से बाहर था?
असम

15. 'अवतारवाद' का प्रथम उल्लेख निम्न में से किसमें मिलता है?
रामायण

((14))

1. तमिल राष्ट्र में दुर्गा का तादात्म्य तमिल देवी 'कोरवई' से किया गया है। वे किस तत्त्व की तमिल देवी थीं?
युद्ध और विजय
2. वह प्रथम भारतीय शासक, जिसने रोमन मुद्रा प्रणाली के अनुरूप अपने सिक्कों का प्रसारण किया, उसका सम्बन्ध किस साम्राज्य से था?
कुषाण
3. हैदराबाद नगर की स्थापना किसने की थी?
मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह ने
4. बहमनी साम्राज्य में प्रान्तों को क्या कहा जाता था?
तराफ़ या अतराफ़
5. औरंगज़ेब के शासनकाल में जाट विद्रोह का नेता कौन था?
ज़मींदार गोकुल सिंह

6. जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रतों में महावीर स्वामी ने पाँचवें व्रत के रूप में क्या जोड़ा?
ब्रह्मचर्य

7. ऋग्वैदिक आर्यों की भाषा क्या थी?
संस्कृत भाषा

8. ऋग्वैदिक काल में समाज का स्वरूप किस प्रकार का था?
पितृसत्तात्मक
9. बुद्ध को किस नदी के तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ था?
निरंजना

10. पूर्णिमा की रात के बारे में कौन-सा कथन महात्मा बुद्ध के लिए महत्त्वपूर्ण है?
पूर्णिमा को बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया
11. महात्मा बुद्ध के विषय में निम्न में से क्या असत्य है?
पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते थे।

12. बौद्ध धर्म के किस ग्रंथ में सर्वप्रथम संस्कृत का प्रयोग हुआ?
अभिधम्मपिटक

13. बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कहाँ पर दिये?
श्रावस्ती

14. शिव-भक्ति के विषय में प्रारम्भिक जानकारी निम्न में से किसमें मिलती है?

सैन्धव सभ्यता से

15. राजा राममोहन राय के प्रथम शिष्य, जिन्होंने उनके मरणोपरांत 'ब्रह्म समाज' का नेतृत्व सँभाला, कौन था?
रामचन्द्र विद्यावागीश

((15))

1. वह राष्ट्रकूट शासक कौन था, जिसकी तुलना उदार तथा विद्वानों के संरक्षक के रूप में विख्यात राजा विक्रमादित्य से की गई है?
अमोघवर्ष

2. भावी बुद्ध की किस रूप में जन्म लेने की कल्पना की गई है?

मैत्रेय

3. कृष्ण का प्रारम्भिक नाम 'वासुदेव' किस समय प्रचलन में आया?

पाणिनी काल

4. 'आना' सिक्के का प्रचलन किस मुग़ल सम्राट ने करवाया?
जहाँगीर
5. वैष्णव मत किन शासकों के संरक्षण में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा?
गुप्त

6. जैन परम्परा के अनुसार जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं?
24

7. निम्नलिखित में से किस मुग़ल बादशाह ने राजा राममोहन राय को दूत बनाकर लंदन भेजा था?
अकबर द्वितीय

8. 'वैज्ञानिक समाज' की स्थापना किसने की थी?
सर सैयद अहमद ख़ाँ ने

9. महाभारत में माद्री, देवकी, भद्रा, रोहिणी और मदिरा, आदि स्त्रियों का वर्णन किस सन्दर्भ में किया गया है?
पति के साथ सती होने के सन्दर्भ में

10. अशोक के कुल कितने गुहालेख अब तक मिले हैं?
3
11. 'कोपेनहेगन संग्रहालय' की सामग्री से पाषाण, कांस्य और लौहयुग का त्रियुगीय विभाजन किया था-

थॉमसन ने
12. निम्नलिखित में से ऋग्वेद की किन नदियों का उल्लेख अफ़ग़ानिस्तान के साथ आर्यों के सम्बन्ध का सूचक है?
कुभा (काबुल), क्रम (कुर्रम)

13. बुद्ध का अंकन किसके सिक्कों पर हुआ है?
कनिष्क

14. माउण्ट आबू का जैन मन्दिर किससे बना है?
संगमरमर से

15. 'यापनीय' किसका सम्प्रदाय था?
जैन धर्म का

((16))

1. किस देवता के लिए ऋग्वेद में 'पुरंदर' शब्द का प्रयोग हुआ है?

इंद्र

2. 'असतो मा सदगमय' कहाँ से लिया गया है?

ऋग्वेद

3. आर्य भारत में बाहर से आए। वे सर्वप्रथम किस स्थान पर बसे थे?
पंजाब में

4. वैशेषिक दर्शन के प्रतिपादक कौन हैं?
उलूक कणद

5. 'गोत्र व्यवस्था' प्रचलन में कब आई?
उत्तर वैदिक काल में

6. किस राजा के शासनकाल में ईसाई धर्म प्रचारक 'सेंट थॉमस' भारत आया?
गोन्दोफ़ैरस

7. सातवाहन शासकों की राजकीय भाषा क्या थी?
प्राकृत

8. किस कुषाण शासक ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्रायें जारी कीं?
कडफ़ाइसिस द्वितीय

9. किस वंश के शासकों ने 'क्षत्रप प्रणाली' का प्रयोग किया?

कुषाणों ने
10. प्राचीन भारत में सर्वप्रथम किस वंश के शासकों ने 'द्वैध शासन प्रणाली' की शुरुआत की?
कुषाणों ने

11. निम्न में से किस विद्वान ने कनिष्क की राजसभा को सुशोभित नहीं किया?
वसुबन्धु

12. सर्वप्रथम रोम के साथ किन लोगों का व्यापार प्रारम्भ हुआ?
तमिलों एवं चेरों का

13. प्रसिद्ध 'रेशम मार्ग' पर किस वंश के शासकों का अधिकार था?
कुषाणों का

14. किस काल में अछूत की अवधारणा स्पष्ट रूप से उदित हुयी?
धर्मशास्त्र के काल

15. प्राचीन भारत में 'निष्क' नाम से किसे जाना जाता था?

स्वर्ण आभूषण

((17))

1. कौन-सा वेद अंशतः गद्य रूप में भी रचित है?
यजुर्वेद
2. आर्य भारत में संभवतः कहाँ से आये थे?
मध्य एशिया से
3. 'सभा और समिति प्रजापति की दो पुत्रियाँ थी', का उल्लेख किस वेद में मिलता है?
अथर्ववेद में

4. ब्राह्मण ग्रंथों में सर्वाधिक प्राचीन कौन-सा है?
शतपथ ब्राह्मण

5. महात्मा गाँधी द्वारा 'असहयोग आन्दोलन' स्थगित कर देने का मुख्य कारण क्या था?

आन्दोलन का हिंसात्मक हो जाना।
6. वैदिक काल में 'यव' किसे कहा जाता था?
जौ को

7. निम्न में से कौन-सी स्मृति प्राचीनतम है?
मनुस्मृति

8. थानेश्वर में वर्धन वंश की स्थापना किसने की थी?
पुष्यभूतिवर्धन

9. हर्षवर्धन प्रत्येक पाँच वर्ष के बाद कहाँ पर सम्मेलन आयोजित करता था?
प्रयाग
10. कदम्ब राज्य के संस्थापक 'मयूरदर्शन' ने किसे अपनी राजधानी बनाया था?
वैजयंती या बनवासी

11. ऋग्वेद में सबसे पवित्र नदी किसे माना गया है?
सरस्वती
12. संगमयुगीन किस चेर शासक ने 'पत्तिनी पूजा' या 'कण्णगी पूजा' की प्रथा को प्रारम्भ करवाया था?
शेनगुट्टुवन

13. प्राचीनतम व्याकरण ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' के रचनाकार कौन हैं?
पाणिनि

14. संगम युगीन अंत्येष्टि सम्बन्धी कथन में कौन-सा असत्य है?

पक्षियों व जानवरों के लिए खुला छोड़ देना

15. निम्न में से किसे 'आदि काव्य' की संज्ञा किसे दी जाती है?

रामायण

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दुनिया का प्रथम चमत्कारिक मंत्र...

हिन्दी / Hindi खबर-संसारज्योतिषबॉलीवुडदीपावलीधर्म-संसारक्रिकेटवीडियोसामयिकफोटो गैलरीअन्यProfessional Courses यह है दुनिया का प्रथम चमत्कारिक मंत्र... FILE दुनिया का एकमात्र ऐसा मंत्र है, जो ईश्वर के प्रति, ईश्वर का साक्षी और ईश्वर के लिए है। यह मंत्रों का मंत्र सभी हिन्दू शास्त्रों में प्रथम और महामंत्र कहा गया है। प्राचीनकाल में हमारे ऋषि-मुनियों ने इसी मंत्र के माध्यम से सिद्धियां और मोक्ष पाया और महाभारत काल में इसी मंत्र के माध्यम से अस्त्रों का निर्माण होता था। वेद, पुराण, स्मृति और संहिताओं में इस मंत्र की महिमा का वर्णन मिलता है। हर समस्या का बस एक उपाय हम आपको बताएंगे कि वह कौन-सा मंत्र है और उसके क्या चमत्कार है? यह भी कि इस मंत्र का जाप कैसे किया जाए और इस मंत्र का जप करने से क्या-क्या लाभ मिलते हैं?   जानिए अगले पन्ने पर कौन-सा है ये मंत्र...   ; FILE सभी हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि मंत्रों का मंत्र महामंत्र है गायत्री मंत्र। यह प्रथम इसलिए कि विश्व की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद की शुरुआत ही इस मंत्र से होती है। माना जाता है कि भृगु ऋषि ने इस मंत्र की रचना की है। यह मंत्र इस प्रकार है-ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। गायत्री मंत्र का अर्थ :सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करे। दूसरा अर्थ :उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। तीसरा अर्थ :ॐ : सर्वरक्षक परमात्मा, भू : प्राणों से प्यारा, भुव : दुख विनाशक, स्व : सुखस्वरूप है, तत् : उस, सवितु : उत्पादक, प्रकाशक, प्रेरक, वरेण्य : वरने योग्य, भर्गो : शुद्ध विज्ञान स्वरूप का, देवस्य : देव के, धीमहि : हम ध्यान करें, धियो : बुद्धि को, यो : जो, न : हमारी, प्रचोदयात् : शुभ कार्यों में प्रेरित करें। अर्थात :स्वामी विवेकानंद कहते हैं इस मंत्र के बारे में कि हमें उसकी महिमा का ध्यान करना चाहिए जिसने यह सृष्टि बनाई। मंत्र की महिमा और चमत्कार का शास्त्र प्रमाण अगले पन्ने पर... शास्त्रकारों ने गायत्री की सर्वोपरि शक्ति, स्थिति और उपयोगिता को एक स्वर से स्वीकार किया है। इस संदर्भ में पाए जाने वाले अगणित प्रमाणों में से कुछ नीचे प्रस्तुत हैं:- सर्वेषां जपसूक्तानां ऋचांश्च यजुषां तथा। साम्नां चौकक्षरादीनां गायत्री परमो जप:।। -वृहत् पाराशर स्मृति। अर्थ : समस्त जप सूत्रों में समस्त वेद मंत्रों में, एकाक्षर बीज मंत्रों में गायत्री ही सर्वश्रेष्ठ है। इति वेद पवित्राण्य भिहितानि एभ्य सावित्री विशिष्यते। -शंख स्मृति अर्थ : यों सभी वेद के मंत्र पवित्र हैं, पर इन सब में गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है। सप्त कोटि महामंत्रा, गायत्री नायिका स्मृता। आदि देवा ह्मुपासन्ते गायत्री वेद मातरम्।। -कूर्म पुराण अर्थ : गायत्री सर्वोपरि सेनानायक के समान है। देवता इसी की उपासना करते हैं। यही चारों वेदों की माता है। तदित्पृचा समो नास्ति मंत्रों वेदचतुष्टये। सर्ववेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपांसि च।। समानि कलपा प्राहुर्मुनयो न तदित्यृक्।। -याज्ञवल्क्य अर्थ : गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। समस्त वेद, यज्ञ, दान, तप मिलकर भी एक कला के बराबर भी नहीं हो सकते, ऐसा ऋषियों ने कहा है- दुर्लभा सर्वमंत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता। न गायत्र्यधिंक किचित् त्रयीषुपरिगीयते।। -हारीत अर्थ : इस संसार में गायत्री के समान परम समर्थ और दुर्लभ मंत्र कोई नहीं है। वेदों में गायत्री से श्रेष्ठ कुछ और नहीं है। नास्ति गंगा, समं तीर्थ, न देव: केशवात्पर:। गायत्र्यास्तु परं जाप्यं न भूतं न भविष्यति। -अत्रि ऋषि अर्थ : गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव के समान कोई देवता नहीं और गायत्री से श्रेष्ठ कोई जप न कभी हुआ है और न कभी होगा। गायत्री सर्वमंत्रणां शिरोमणिस्तथा स्थिता। विद्यानामपि तेनैतां साधने सर्वसिद्धये।। त्रिव्याहृतियुतां देवीमोंकारयुगसम्पुटाम्।। उपास्यचतुरो वर्गान्साधयेद्यो न सोsन्धधी:।। देव्या द्विजत्वमासाद्य श्रेयसेsन्यरतास्तु ये। ते रत्नानिवां‍छन्ति हित्वा चिंतामणि करात्। -महा वार्तिक अर्थ : गायत्री सब मंत्रों तथा सब विद्याओं में शिरोमणि है। उससे इंद्रियों की साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना के द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त करने से चूकते हैं, वे मंदबुद्धि हैं। जो द्विज गायत्री मंत्र के होते हुए भी अन्य मंत्रों की साधना करते हैं वे ऐसे ही हतभागी हैं, जैसे कि चिंतामणि को फेंककर छोटे-छोटे चमकीले पत्थर ढूंढने वाले हैं। यथा कथं च जप्तैषा त्रिपदा परम पावनी। सर्वकामप्रदा प्रोक्ता विधिना किं पुनर्नृय।। अर्थ : हे राजन! जैसे-तैसे उपासना करने वाले की भी गायत्री माता कामना पूर्ण करती है, फिर विधिवत साधना करने के सत्परिणामों का तो कहना ही क्या? कामान्दुग्धे विप्रकर्षत्वलक्ष्मी, पुण्यं सुते दुष्कृतं च हिनस्ति। शुद्धां शान्तां मातरं मंगलाना, धेनुं धीरां गायत्रीमंत्रमाहु:।। -वशिष्ठ अर्थ : गायत्री कामधेनु के समान मनोकामनाओं को पूर्ण करती है, दुर्भाग्य, दरिद्रता आदि कष्टों को दूर करती है, पुण्य को बढ़ाती है, पाप का नाश करती है। ऐसी परम शुद्ध शांतिदायिनी, कल्याणकारिणी महाशक्ति को ऋषि लोग गायत्री कहते हैं। प्राचीनकाल में महर्षियों ने बड़ी-बड़ी तपस्याएं और योग-साधनाएं करके अणिमा-महिमा आदि ऋद्धि-सिद्धियां प्राप्त की थीं। इनकी चमत्कारी शक्तियों के वर्णन से इतिहास-पुराण भरे पड़े हैं। वह तपस्या थी ‍इसलिए महर्षियों ने प्रत्येक भारतीय के लिए गायत्री की नित्य उपासना करने का निर्देश दिया था। चत्वारिश्रंगा त्रयो अस्य पादा, द्वे शीर्षे सप्त हस्तासोsअस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महादेवो मर्त्यां अविवेश।। -यजुर्वेद 17/19 अर्थात : चार सींग वाला, तीन पैर वाला, दो सिर वाला, सात हाथों वाला, तीन जगह बंधा हुआ, यह गायत्री महामंत्ररूपी वृषभ जब दहाड़ता है, तब महान देव बन जाता है और अपने सेवक का कल्याण करता है। चार सींग :चार वेद। तीन पैर :आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण। दो सिर :ज्ञान और विज्ञान। सात हाथ :सात व्याहृतियां जिनके द्वारा सात विभूतियां मिलती हैं। तीन जगह बंधा हुआ :ज्ञान, कर्म, उपासना से। अंत में :जब यह वृषभ दहाड़ता है, तब देवत्व की दिव्य परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं जिसके सान्निध्य में रहकर सब कुछ पाया जा सकता है। देवी भागवत पुराण के अश्वपति उपाख्यान में अनुदान का वर्णन इस प्रकार आता है- तत: सावित्र्युपाख्यानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि। पुरा केन समुद्‍भूता सा श्रुता च श्रुते: प्रसू:।। केन वा पूजिता लोके प्रथमे कैश्च वा परे।। ब्राह्मणा वेदजननी प्रथमे पूजिवा मुने। द्वितीये च वेदगणैस्तत्पश्चाद्विदुषां गणै:।। तदा चाश्वपतिर्भूप: पूजयामास भारत। तत्पश्चात्पूजयामासुवर्णाश्‍चत्वार एव च।। -देवी भागवत (सावित्री उपाख्‍यान) नारदजी ने भगवान से पूछा-प्रख्‍यात हैं कि श्रुतियां गायत्री से उत्पन्न हुई हैं, कृपा करके उस गायत्री की उत्पत्ति बताइए। भगवान ने कहा-देव जननी गायत्री की उपासना सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने की, फिर देवता उनकी आराधना करने लगे, फिर विद्वान, ज्ञानी-तपस्वी उसकी साधना करने लगे। राजा अश्वपति ने विशेष रूप से उसकी तपश्चर्या की और फिर तो चारों वर्ण (रंग) उस गायत्री की उपासना में तत्पर हो गए। कैसे करें गायत्री मंत्र का जप, अगले पन्ने पर... आप भी गायत्री मंत्र की शक्ति और शुभ प्रभाव से सफलता चाहते हैं, तो गायत्री मंत्र जप से जुड़े नियमों का ध्यान जरूर रखें- * गायत्री मंत्र के लिए स्नान के साथ मन और आचरण पवित्र रखें, किंतु सेहत ठीक न होने या अन्य किसी वजह से स्नान करना संभव न हो तो किसी गीले वस्त्रों से तन पोंछ लें। * साफ और सूती वस्त्र पहनें। * तुलसी या चंदन की माला का उपयोग करें। * पशु की खाल का आसन निषेध है। कुश या चटाई का आसन बिछाएं। * गायत्री मंत्र जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। इन तीन समयों को संध्याकाल भी कहा जाता है। गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है- प्रात:काल। सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के पश्चात तक करना चाहिए। * मंत्र जप के लिए दूसरा समय है-दोपहर मध्याह्न का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। इसके बाद तीसरा समय है- शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले। मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए। * सुबह पूर्व दिशा की ओर मुख करके गायत्री मंत्र जप करें। शाम के समय सूर्यास्त के घंटे भर के अंदर जप पूरे करें। शाम को पश्चिम दिशा में मुख रखें। * इस मंत्र का मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है। * गायत्री मंत्र जप करने वाले का खान-पान शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। * शौच या किसी आकस्मिक काम के कारण जप में बाधा आने पर हाथ-पैर धोकर फिर से जप करें, बाकी मंत्र जप की संख्या को थोड़ी-थोड़ी पूरी करें। साथ ही एक से अधिक माला कर जप बाधा दोष का शमन करें। गायत्री मंत्र के लाभ, जानिए अगले पन्ने पर... जीवन में किसी भी प्रकार का दुख हो या भय इस मंत्र का जाप करने से दूर हो जाते हैं। किसी भी प्रकार का संकट हो या कोई भूत बाधा हो तो यह मंत्र जपते ही पल में ही दूर हो जाती है। यदि आपको सिद्धियां प्राप्त करना हो या मोक्ष तो इस मंत्र का जाप करते रहने से यह इच्छा भी पूरी हो जाती है, लेकिन शर्त यह है कि इसके जाप के पहले व्यक्ति को द्विज बनना पड़ता है। हर तरह के व्यसन छोड़ना पड़ते हैं। मंत्र के अन्य लाभों को जानने के लिए प्रथम पेज पर दी गई लिंक पर क्लिक करें। साभार :अखंड ज्योति (पं. श्रीराम शर्मा 'आचार्य') विज्ञापन विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं? 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सफल जीवन की तीन मूल्यवान बातें 

 महापंडित रावण ने लक्ष्मण को तीन बातें बताईं जो जीवन में सफलता की कुंजी है By: Gulneet Kaur  दैत्य रावण हम जब तक सामाजिक रूप से प्रमाणित अच्छे कार्य करते जाते हैं, तब तक समाज भी हमारी प्रशंसा करता है, लेकिन जैसे ही समाज के विरुद्ध एक बुरा काम किया नहीं कि हम सदा के लिए बुराई का पात्र बन जाते हैं। लंकापति रावण के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ...  केवल एक बुराई... हम यह नहीं कहते कि रावण ने जो कुछ भी किया वह गलत था, परन्तु सीताजी का अपहरण करना ही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। यदि वो सीता जी का हरण ना करता तो कभी श्रीराम अपनी अर्धांगिनी को बचाने लंका ना आते और ना ही दैत्य रावण का अंत होता। यदि रावण सीता जी का हरण ना करता तो उसकी ज़िंदगी ही कुछ और होती... शायद वह भी आज देवता के समान पूजा जाता।  महापंडित रावण हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि रावण, जिसे पूरा विश्व राक्षस राजा के नाम से जानता है, वह एक महापंडित था। उसके तप में जो कठोरता थी, जो अग्नि थी वह शायद ही उस काल के किसी अन्य ऋषि-मुनि एवं पंडित में थी। कठोर तपस्या के मार्ग से ही रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न किया।  रावण का स्वार्थ शिवजी जानते थे कि रावण एक राक्षस है और अपने सवार्थ के लिए ही तप कर रहा है, लेकिन रावण की भक्तिपूर्ण तपस्या को वे भी दरकिनार ना कर सके और विवश होकर उन्हें रावण को वरदान देना ही पड़ा.... जिसके बाद रावण अत्यंत शक्तिशाली हो गया था।  पिता ऋषि थे शायद यह बात काफी कम लोग जानते हैं कि रावण के पिता एक ऋषि और माता एक असुर कन्या थी। इसलिए माता के गुणों के कारण ही रावण में असुरों के गुण आ गए... लेकिन पिता से मिला तपस्या का गुण ही रावण के लिए सर्वश्रेष्ठ साबित हुआ।  तपस्या का मार्ग दुनिया पर राज करने के लिए रावण ने तपस्या का मार्ग चुना, दिन-रात शिव जी का जाप किया। आखिरकार वर्षों की तापस्या पूर्ण करके रावण ने शिवजी का वरदान पाया। लेकिन वो कहते हैं ना यदि भगवान विवश होकर बुराई को भी वरदान देते हैं तो उसके अंत के लिए भी पहले से ही मार्ग चुन लेते हैं।  भगवान शिव का वरदान कहते हैं कि जैसे ही भगवान शिव ने रावण को वरदान दिया था, उसी के साथ भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम के जन्म का फैसला कर लिया गया था। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार माता कैकेयी की इच्छा के मुताबिक श्रीराम, उनकी पत्नी सीता एवं अनुज लक्ष्मण को 14 वर्षों के वनवास के लिए अयोध्या छोड़कर जाना पड़ा।  सीता हरण वनवास के कुछ वर्ष बीत गए थे कि अचानक राक्षस रावण की बहन शूर्पणखा ने वन में लक्ष्मण को देखा और देखकर मोहित हो गई। लेकिन लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटकर उसे वहां से भगा दिया, परन्तु जाते-जाते शूर्पणखा ने सुंदर सीता को देख लिया था। लंका जाते ही उसने अपने भाई रावण को सीता के बारे में बताया और षडयंत्र रचा ताकि रावण सीता का हरण कर उसे लंका ले आए।  वनवास वन में अचानक एक सुनहरे हिरण को देख सीता ने श्रीराम से उसे लेकर आने को कहा, परिणाम स्वरूप राम घने जंगल की ओर निकल पड़े। कुछ देर बाद श्रीराम की मदद की पुकार सुन लक्ष्मण भी उन्हें बचाने वन में निकल गए लेकिन सीताजी की रक्षा के लिए कुटिया के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींच गए जिसे सीता के सिवा कोई पार नहीं कर सकता था।  सीता हरण कुछ देर बाद रावण ऋषि का रूप धारण करके आया और सीता को लक्ष्मण रेखा पार कर भीक्षा देने को कहा। कुछ झिझकने के बाद सीता ने बाहर आकर जैसे ही भीक्षा देना चाहा रावण अपने असली रूप में आ गया और सीता का हरण कर उन्हें लंका ले गया। बस यहीं से रावण का बुरा समय आरंभ हो गया....  खोज निकाला सीता को श्रीराम नहीं जानते थे कि सीता कहां हैं.... लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद उन्हें मालूम हुआ कि लंकापति रावण उन्हें ले गया है। लंका का रास्ता खोजने में हनुमानजी और वानर सेना ने उनकी सहायता की। आखिरकार वे लोग पत्थरों का पुल बनाकर लंका पहुंचे...  शांति संदेश भिजवाया आरंभ में श्रीराम ने रावण को कुछ शांति संदेश भिजवाए और कहा कि वो सीता को छोड़ दे। लेकिन रावण ने अहंकारवश उसे स्वीकार नहीं किया।  आरंभ हुआ युद्ध और फिर हुआ भीषण युद्ध... एक ओर वानर सेना और दूसरी ओर राक्षसी सेना। युद्ध के कुछ दिनों में ही रावण के पुत्र, भाई कुम्भकर्ण और अन्य राक्षस मारे गए। इधर वानर सेना का भी भारी नुकसान हुआ.... लेकिन आखिरी दिन वह था जब श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ।  श्रीराम की जीत हुई वो कहते हैं ना कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी हो, अच्छाई के सामने छोटी ही पड़ जाती है। रावण ने अपनी दैत्य शक्तियों का भरपूर उपयोग किया लेकिन श्रीराम के वार को वह सह ना सका और अंत में अपना आखिरी श्वास लेता हुआ धरती पर जा गिरा।  वह पल जब... यह वह समय था जब रावण भूमि पर लेटे हुए अपनी अंतिम सांस का इंतजार कर रहा था। तब श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण को बुलाया और कहा, “जाओ, रावण के पास जाओ और उससे सफल जीवन के अनमोल मंत्र ले लो”।  श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण से कहा यह बात सुनकर पहले तो अनुज लक्ष्मण को श्रीराम की बात पर कुछ संदेह हुआ... वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिरकार एक दुश्मन से सफलता का क्या पाठ मिलेगा। लेकिन ज्येष्ठ भ्राता के आदेश को लक्ष्मण नकार नहीं सकते थे और आखिरकार वे रावण के सिर के पास जाकर खड़े हो गए।  रावण रावण काफी कठिन हालत में श्वास ले रहा था और सिर के पास खड़ा लक्ष्मण उसे काफी ध्यान से देख रहा था और प्रतीक्षा कर रहा था कि कब वह कुछ बोले। लेकिन रावण ने अपने मुख से एक शब्द ना कहा और निराश होकर लक्ष्मण अपने भाई श्रीराम के पास लौटा और कहा कि ‘रावण तो कुछ कह ही नहीं रहे’।  श्रीराम ने समझाया तब श्रीराम मुस्कुराए और बोले, “जब हमें किसी से शीक्षा प्राप्त करनी हो तो कभी भी उसके सिर के पास खड़े नहीं होना चाहिए। जाओ, रावण के चरणों के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करो, वे तुम्हे सफलता की कुंजी अवश्य प्रदान करेंगे।“  लक्ष्मण गए रावण के पास श्रीराम के यह वचन सुनकर लक्ष्मण को अचंभा हुआ लेकिन आज्ञानुसार उसने ठीक वैसा ही किया जैसा प्रभु चाहते थे। वह राक्षस राजा रावण के चरणों के समीप गया, हाथ जोड़े और आग्रह किया कि रावण उन्हें सफल जीवन के मंत्र प्रदान करें।  वह तीन बातें उस समय रावण ने अपने मुख से कुछ वचन बोले और उन्हें सफल जीवन की तीन मूल्यवान बातें बताईं... जिन्हें आप आगे की स्लाइड्स में जान सकते हैं...  पहली बात पहली बात जो रावण ने लक्ष्मण को बताई वह ये थी कि शुभ कार्य जितनी जल्दी हो कर डालना और अशुभ को जितना टाल सकते हो टाल देना चाहिए यानी ‘शुभस्य शीघ्रम्’। रावण ने लक्ष्मण को बताया, ‘मैं श्रीराम को पहचान नहीं सका और उनकी शरण में आने में देरी कर दी, इसी कारण मेरी यह हालत हुई’।  दूसरी बात इसके बाद रावण ने लक्ष्मण को जो दूसरी बात बताई वह और भी हैरान कर देने वाली थी। उसने कहा, “अपने प्रतिद्वंद्वी, अपने शत्रु को कभी अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए, वह आपसे भी अधिक बलशालि हो सकता है। मैंने श्रीराम को तुच्छ मनुष्य समझा और सोचा कि उन्हें हराना मेरे लिए काफी आसान होगा, लेकिन यही मेरी सबसे बड़े भूल थी।“  रावण की भूल रावण ने आगे कहा, “मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा उन्होंने मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा था तब मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई मेरा वध न कर सके ऐसा कहा था क्योंकि मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था। यही मेरी गलती थी।“  तीसरी बात रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अंतिम बात ये बताई कि अपने जीवन का कोई राज हो तो उसे किसी को भी नहीं बताना चाहिए। यहां भी मैं चूक गया क्योंकि विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था, अगर उसे मैं यह ना बताता तो शायद आज मेरी यह हालत ना होती।“     Recommended section  मृत्यु से पहले कर लें ये 4 काम  सफलता के लिए इन्हें करें ज़िंदगी से बाहर  786 अंक क्यों शुभ माने जाते हैं इस्लाम में?  हमें प्रभु के और करीब लाता है संगीत और मंत्रजाप  दरिद्रता और बदहाली लाता है शनि-चंद्र से बना विष योग Popular section  पेट होगा अंदर, कमर होगी छरहरी अगर अपनायेंगे ये सिंपल नुस्खे  एक ऋषि की रहस्यमय कहानी जिसने किसी स्त्री को नहीं देखा, किंतु जब देखा तो...  किन्नरों की शव यात्रा के बारे मे जानकर हैरान हो जायेंगे आप  कामशास्त्र के अनुसार अगर आपकी पत्नी में हैं ये 11 लक्षण तो आप वाकई सौभाग्यशाली हैं  ये चार 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ब्राह्मण के नौ गुण

-ब्राह्मण के नौ गुण -----

रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलाे जितेन्र्दियः।
दाता शूर दयालुश्च ब्राह्मणाे नवभिर्गुणैः।।

रिजुः = सरल हो
तपस्वी = तप करनेवाला हो
सन्ताेषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट रहनेवाला हो
क्षमाशीलाे= क्षमा करनेवाला हो
जितेन्र्दियः = इन्र्दियाें को वश में रखनेवाला हाे
दाता= दान करनेवाला हो
शूर = बहादुर हो
दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हाे
इन नौ गुणों से सम्पन्न व्यक्ति ही ब्राह्मण हाेता है।                                  श्री राम जी ने श्री परशुराम जी से कहा,
देव  एक  गुन  धनुष  हमारे।
नौ गुन  परम  पुनीत तुम्हारे।।
                                      जय सिया राम