Friday, 13 October 2017

गायत्री मंत्र सबसे श्रेष्ट

my Poems by Suresh Chand Kalhan गायत्री मंत्र —gaytri mantra  sckalhan 1 year ago Advertisements  गायत्री मंत्र और उसका इतिहास —————————————. ॐ भूर, भुव , स्वः — ॐ तत सवितुर वरेण्यम भर्गो देवस्य धीमहि –धियो योनः प्रचोदयात.. जहाँ तक गायत्री मंत्र के जाप शुरू होने के समय का सवाल है , वह समेत ज्ञात नहीं है पर इतना कह सकते हैं कि इसका समय वेदों के समय से ही है और या फिर इस सृष्टि के उत्पन होने के समय से है अर्थात आदि काल से है/ पराचीन हिन्दू धर्म ग्रन्थ बताते हैं कि किस प्रकार संत विश्वामित्र ने प्रभु से गायत्री मंत्र को काफी समय तक तपस्या के द्वारा परापत किया/ विश्वामित्र का असली नाम राजा विश्वरथ था ./राजा विश्वरथ जब अपने किसी अभियान से वापिस आ रहे थे तब थकान के कारन रास्ते में मुनि वशिष्ट के आश्रम में ठहरे और वहां पर कामधेनु नाम की गाये को देखा और उन्होंने संत वशिस्ट से वे गाये मांगी पर संत वशिष्ट ने देने मन कर दिया / इस पर राजा विश्वरथ ने वशिष्ट के साथ लड़ाई की पर वह हार गए. इस हार के कारन उनको बहुत हीन भावना हुई और वह अपना राजपथ छोड़ तपस्या करने चले गए, / इसी तपस्या के कारन वह संत वशिस्ट से आशीर्वाद परापत करके ब्रह्मऋषि कहलाये और इसी तपस्या के दौरान उन्होंने बहुत सूंदर कविता के रूप में अच्छी शब्दावली में गायत्री मंत्र की संरचना की जो बाद में एक अनोखी परार्थना बन गयी ./ इसी गायत्री मंत्र के कारन ही विश्वामित्र का नाम दुनिया में उच्चश्रेणी में कहलाया / यही है वह जो हमारा भारतीय पराचीन इतिहास संत विश्वामित्र के बारे में गायत्री मंत्र सम्बंधित कथा बताता है / यूरोपियों और खास कर इंग्लैंड के इतिहासकारों ने इस भारतीय इतिहास को झूठा साबित करने की कोशिस की है /जबकि यह सर्वविदित है की भारत का प्राचीन इतिहास उतना ही पूरा है जितना इस संसार का उत्पन होना है /.. * यह बताया गया है कि एक बार अपनी सभा में आये सभी लोंगो के समक्ष आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा था कि पराचीन भारत के लोग जंगल में नहीं रहते थे वह सभ्य समाज के नागरिक थे / उन लोंगो ने ही दुनिया में सभ्य समाज की सभ्यता को चारों और फैलाया ,हमारा इतिहास झूठा नहीं है हम दुनिया में अपनी पताका फ़ैलाने वालों में से थे और हैं / हमारा वैदिक इतिहास झूठा नहीं है./हमारे यहाँ श्री राम और श्री कृष्ण जैसी पवित्र आत्माओं ने जन्म लिया है/ यह बताया गया है कि यह गायत्री मंत्र हिन्दू ब्राह्मणों के अलावा सभी मनुष्यो और औरतों की पहुँच से बाहर था /परंतु यह कहना गलत है / हिंदुओं के सर्वउच्च मुनि द्वारा रचित मनु स्मृति के अनुसार गुरु की शिक्षा लेने के लिए सभी लड़के और लड़कियों को उपनयन संस्कार करवाना होता था, /. महाभारत के समय में माता सबसे बड़ी गुरु कहलाती थी/ औरत को सबसे अधिक इज़्ज़त दी जाती थी उनको उपनयन संस्कार करवाने पड़ते थे वह गायत्री मंत्र और चारों वेदों के ज्ञाता होती थी/फिर कैसे कहा जाता है कि औरतों को गायत्री मंत्र के जाप की मनाही थी/ यह बात गलत थी/ यह एक साधना है जो साधक के दिल को छु जाती है / इसके जाप से शांति मिलती है और प्रभु से मिलने का एक रास्ता है / इसके जाप से मनुष्य की कई मुश्किलें दूर होती हैं / गायत्री मंत्र का जाप प्रभु की पूजा है/. वेदों के अनुसार इस संसार में कार्य करने के सात 7 क्षेत्र या जगह हैं जो एक दूसरे से आध्यात्मिक तौर पर बढ़ कर हैं ,/यह माना गया है कि इस आध्यात्मिक जागरूपता से हम अपनी तरक्की करते हुए उस परमपिता परमात्मा को पा सकते हैं/ बहुत से बुद्ध धर्म के मानने वाले इन् 7 कार्य करने वाले क्षेत्रों को मानते हैं /इस गायत्री मंत्र द्वारा हमको आध्यात्मिक शक्ति और रौशनी मिलती है. और हमसे एक दूसरे क्षेत्र से सम्बन्ध बनाये रखने में सहायक होती है यह भी कहा गया है कि जो इस गायत्री मंत्र की साधना–आराधना करता है वह व्यक्ति अपने भीतर अंतर्यामी शक्ति को महसूस करने लगता है जिससे उसके मन और मस्तिष्क को सर्वाधिक शांति मिलती है / पराचीन समय के सन्तों ने इस गायत्री मंत्र को बहुत ध्यानपूर्वक शक्तिशाली शब्दों में बनाया है. /इस गायत्री शब्द को निम्न शब्दो से प्राप्त किया गया है/ गाये –अर्थात — ,महत्वपूर्ण ऊर्जा और अत्रि –अर्थात –संभालना , रक्षा , मुक्ति दाता मंत्र –अर्थात –आराधना और पराथना गायत्री मंत्र -की महत्वता ———————— हम इस मंत्र को गायत्री मंत्र , सावित्री मंत्र और महामंत्र के नाम से भी जानते हैं / . इसको समझ ने के लिए हम इसको 5 भागों में बाँट सकते है पहला : ॐ , भूर भव सवः — वह व्यक्ति जो इस का सत्ताधारी सर्व्वयापक .,बुद्धि देने वाला , सर्वशक्तिमान, और जीवन देने वाला है/ ॐ : वह प्रभु जो इस सृष्टि को बचाता है . भूर: वह जो इस संसार का जीवन है =ब्रहम्म और हमको मुक्ति प्रदान करने वाला है / भवः: वह जो तकलीफ से ऊपर सर्वशक्तिमान, सर्व्वयापक है और शांति प्रदान करने वाला है स्वः : वह जो सर्व्वयापक है और इस संसार को खुशियां देने वाला है तत्सवितुर वरेण्यम —इन् शब्दों के द्वारा उस सर्वशकितमान प्रभु की प्रशंशा की गई है — भर्गो देवस्य धी महि — वह जो सभी प्रांणियों से सम्बन्ध रखता है धियो यो नः प्रचोदयात — इसके द्वारा हम उस प्रभु से अपने लिए बुद्धि की कामना करना करते हैं तत: वह जो हमारा पिता है सवितुर : वह जो इस ब्रह्माण्ड का रचिता है और इसको जीवन देकर चलायमान रखता है वरेण्यम : जो सबका विश्ववसनीय है दूसरे == जब हमें तकलीफें और मुश्किल आती है तब यह परमात्मा हमें उनसे बचाता है तीसरे” —यह मंत्र गुरु मंत्र है , जो हमें धर्म का पालन करने को कहता है और ठीक शिक्षा लेने को कहता है / चौथे :यह मंत्र सविता शब्द से सम्बंधित है इसीलिए इस ब्रह्मांड को बनाने वाला ईश्वर कहते हैं / इस सविता द्वारा इस ब्रह्माण्ड में जीवन सञ्चालन करने वाला कहते हैं/ पांचवे : इसको महामंत्र भी कहते हैं क्योंकि यह गायत्री मंत्र चारों वेदों से ऊपर है और पूजा करने के लिए उचित है / गायत्री मंत्र सभी वैदिक मन्त्रों में सर्वउच्च है/. इसके द्वारा हम सूर्य की पूजा करते हैं ताकि हमारे सभी पाप ख़त्म हो जाएँ. /इससे हमें बुद्धि, स्वस्थ्य और लंबा जीवन मिलता है/ गायत्री मंत्र का बार आर जाप सूर्य उदय से पूर्व सुबह , दोपहर और सूर्य अस्त होने के समय संध्या को दिन में तीन बार करनी चाहिए / गायत्री मंत्र खुद एक वंदना है . एक आत्मस्वरूप है और सांसारिक वस्तुओं को चलायमान गति देता है. तथा हमें बुद्धिवान बनाता है/ इसीलिए यह हम पराणियों को प्रभु का उपहार है जिसके उच्चारण से हम शक्तिशाली प्रभु की और आकर्षित होते हैं/ इस मंत्र को भगवद गीता और चारो वेदों का सार कहा गया है/इस मंत्र की शब्दावली को बहुत ही खूबसूरती के साथ बनाया गया है/यह बहुत अच्छी परार्थना है जो सभी हिन्दू परिवार के लोग जाप करते हैं/यह संस्कृति में आज से 10000 से भी अधिक वर्ष पहले लिखी गयी है/बहुत समय से . यह पश्चमी लोंगो के लिए एक अलौकिक है / जिसके कारण वह इसकी खोज करके पता करने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों इसको स्वयं जागरूकता का साधन माना गया है/ यह हम सब के लिए उपहार है और यह गायत्री सभी वेदों की माता है/ इसीलिए यह गायत्री मंत्र सभी वेदों का भाग है और इसको ऋग्वेद में से लिया गया है/ इसका एक एक शब्द प्रत्येक वेद का हिस्सा है/.इसको यजुर वेद का तैत्तरीय ब्रह्म कहा गया है/ इससे तीन प्रकार का ज्ञान मिलता है/ अर्थात रिग से अग्नि –यजुर से दिल और साम से दिल का आदित्य है./ इस अर उस शक्तिशाली परमात्मा ने हमें तीन प्रकार का ज्ञान रूपी प्रकाश दिया है/ . , यह पृथ्वी या भूलोक रिग की दें है — यजुर से अंतरिक्ष (भुव लोक –आकाश ) तथा सामवेद से देवलोक या सव: लोक मिला है/ तभी वेदों में इस प्रकार कहा गया है : गायत्री मंत्र का जप या उच्चारण ——साधक को पवित्र करता है . गायत्री मंत्र को सुनना ——————.सुनने वाले को पवित्र करता है गायत्री मंत्र का जाप अपने आप में खुद व्यक्ति के लिए पवित्रता लाती है./यह जाप करने वाले को आत्मशक्ति प्रदान करती है और मनुष्य को सभी प्रकार की गलतियों और कष्टों से बचाती है /गायत्री मंत्र में महा शक्ति का भंडार है/ सभी मानव जाति के लिए उपनयन संस्कार उसकी जीवन शैली को बदलता है और वह इसकी बाद जिंदगी की नयी शुरुआत करता है./ यह उपनयन संस्कार गायत्री मंत्र के जाप से ही शुरू होता है,/ यह मंत्र सभी पराण धारियों के लिए एक आध्यात्मिक शक्ति है / यह मंत्र उस व्यक्ति को शांति, बुद्धि और अंतरात्मा द्वारा शांति और खुशियां प्रदान होती हैं जो व्यक्ति इसकी सच्चे दिल से आराधना करता है/ इस गायत्री मंत्र के जाप से हम आध्यात्मिक बुद्धि द्वारा वह सब कुछ पर्याप्त कर सकते हैं जिसकी हमें इस संसार में जरूरत है/ साधक इसके जाप से उस शक्तिशाली प्रभु से बुद्धि को पाते हैं // और हमें शुद्ध विचार रखने की शक्ति मिलती है / वेदों के अनुसार इस मंत्र का उच्चारण नित्यपूर्वक करना चाहिए ताकि आध्यात्मिक बुद्धि का विकास और आत्म -प्रतिरोध की शक्ति मिली है / जिससे साधक की जीवन शैली बदल जाती है. परंतु इसका जाप करने से सब कुछ नही मिलता जब तक इस मंत्र के सही अर्थ नहीं मालूम हों कि क्या उच्चारण कर रहे हैं/ बहुत से साधक हिंदुओं के लिए गायत्री एक दिव्य जागरूकता पैदा करता है/ जिसके द्वारा आत्मा की शुद्धि और इसके द्वारा प्राणी ब्रह्म की और अग्रसर होता है/ . गायत्री मंत्र द्वारा सूर्य उपासना , संध्या की उपासना होती है/ इसके द्वारा हमें बुद्धि रूपी रौशनी और सूर्य रूपी दिव्या प्रकाश मिलता है / इसके द्वारा ब्रह्म तक पहुँचने की शक्ति और सच्चा मार्ग प्राप्त होता है./ इसकी सच्ची महत्वता जानने के लिए हम संशिप्त में कह सकते है कि हम इस सृष्टि के करता से दिव्या शक्ति के लिए परार्थना करते है जिसने इस संसार को बनाया–वह पूजनीय है./–जो सच्ची आधयात्मिक रौशनी देता है/जो हमारे पापों और गलतियों को दूर करता है–हम परार्थना करते हैं कि वह हमें दिलों को सन-मार्ग और अच्छी बुद्धि की और लेजाए/ ॐ भूर, भुव , स्वः — ॐ तत सवितुर वरेण्यम भर्गो देवस्य धीमहि –धियो योनः प्रचोदयात् अगर आप गायत्री मंत्र का जाप करना चाहते हैं तो यह सबसे महत्वपूरण बात है कि इसका उच्चारण यही प्रकार से किया जाये और वह भी सच्चे मन से किया जाये/तात्पर्य यह है कि हमें मालूम होना चाहिए कि इस मंत्र के सही अर्थ क्या है/इस संस्कृत में लिखे गए मंत्र में अगर ठीक प्रकार और सच्चे दिल से जाप किया जाये तो इसमें भरपूर्व शक्ति है / .आओ इस मंत्र के एक एक शब्द के क्या अर्थ है ;– गायत्री मंत्र के अर्थ ———————– 1 .ॐ का सही उच्चारण AUM ॐ है /हमने इस शब्द का उच्चारण हज़ार बार किया होगा /परंतु क्या आप को मालूम है यह ॐ शब्द क्या है/जिसको एक योगी बहुत ही दिल से जाप करता है/ ॐ शब्द की आवाज मनुष्य पराणियों की एक अपनी अलग भाषा है / . ॐ आवाजों से मिला एक अपना साँचा है/ इसीलिए ॐ aum – एक ब्रहम्म और शक्तिशाली प्रभु है./ ॐ की आवाज सनातन है/ यह वह आवाज है जो ईश्वर ने पराकृत माता को पैदा करते समय आत्मा के रूप में दी थी./ॐ एक संस्कृत का शब्द है जो ऋषि मुनि अपनी साधना के समय इस्तेमाल करते हैं/ इस शब्द को समझाना अति मुश्किल है क्योंकि ॐ सबकुछ है और इस संसार की जननी है/ ॐ सभी आवाजों में मुख्य आवाज है/ ॐ ब्रह्म और सर्वउच्च है./ ॐ संतान धर्म के अनुसार श्री गणेश का शारीरिक स्वरूप है/ॐ का ऊपर का चंद्रमुख कर्व गणेश जी का सर का भाग है और ॐ का निचला हिस्सा गणेश जी की सूंड का प्रतीक है / ॐ शब्द परमात्मा का पहला नाम है जो तीन स्वरों से बना है/ जिसको बोलने से यह महसूस होता है कि यह इस सृश्टी का उत्पन करने वाला , संरक्षक , और समाप्त करने वाला परमात्मा है./ ] अ==ब्रह्माण्ड या इस सृश्टी का बनाने वाला प्रभु है/————-ब्रहम्मा उ==इस ब्रह्माण्ड और सृष्टि का संरक्षक है/———————-विष्णु म== इस सृश्टी या ब्रह्माण्ड का नाशक कहा गया है ———-शिव अतः ॐ एक ऐसा शब्द है जो प्रभु के तीनों गुणो का दर्शता है और प्रभु के तीन आकर्ति ब्रह्मा विष्णु और शिव/महेश बताता है / इस मंत्र द्वारा हमें शांति, ख़ुशी/आनंद ., और आध्यात्मिक रौशनी मिलती है तभी इसको महामंत्र कहा गया है / दूसरे शब्दों में अ से सृश्टी की शारीरिक रूप मानसिक रूप से उत्पत्ति और ब्रहम्म की परापति है और यह शब्द हिंदी शब्दावली का पहला अक्षर और सर्व है/ जब हम इसका उच्चारण करते हैं तो यह गले से होते हुए मुंह खुलता है/ उ -इसको बोलते समय होंठ थोड़ा तिरछा होते हुए जबान तक आता है./इससे इस सृश्टी में जिंदगी और संरक्षण का कार्य बताया है. इस सृश्टी में शक्ति का समायोजन और मष्तिष्क का कार्य करना बताया है. यह एक अंतर आत्म का रूप है. यह स्वप्न में लेजाने वाला सूक्षम स्थान तथा विष्णु है / म- जब इस म को बोलते हैं तब हमारे होंठ बंद होने की प्रकिर्या दिखाते हैं – इसके द्वारा हम उस प्रभु को सर्वयापी संरक्षक और सन्मार्ग दिखने वाला समझते हैं/ इसकी साथ हम इसको सृश्टी का नाशक भी मानते हैं/ यह साधारण , स्वप्न रहित , नाशक , रूद्र और आनंदायी है / इसकी चौथी स्थिति चुप रहने वाली है..अर्थात त्रिया और सृष्टि से ऊपर है और इसके बोलने में कम्पन होता है इस प्रकार यह स्वयं आत्मा है इस पृथ्वी को बनाने वाला है /. जिसमे हवा पानी इत्यादि दीगई हैं / यह स्वयम ब्रहम्म का जनम से रहने का स्थान है /. प्रकृति रूप से ॐ के बोलने में अपनी अलग शैली है / अर्थात अ=जागना उ – स्वप्न देखना– म –नींद में सोना ॐ अपने आप में सर्वयापी .शक्तिशाली, और संरक्षण है / सर्वयापी का अर्थ है कि ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ वह मौजूद नहीं / वह सम्पूर्ण शक्ति वाला और शासक है / अर्थात: हे सर्वयापक संरक्षक हमें आप धर्म की राह पर सन्मार्ग की और चलने का आशर्वाद देवे /. 2.भूर—-प्रथम भू; यह शब्द परमात्मा को इस संसार के उत्पन होने से पूर्व सर्वयापी होना और सर्वशक्तिमान होना बताता है./ नाश होने के बाद भी रहेगा क्योंकि वह परिवर्तनशील है / दूसरे : यह पृथ्वी जहाँ हम पैदा हुए हैं दिव्यस्वरूप है./ भू जीवन देने वाली है हम पैदा हुए हैं तो मौत भी आनी है/ हम को ज़िंदा रखने के लिए उसने हमें वायु,पानी इत्यादि दिए हैं./वह इस ब्रह्माण्ड का सञ्चालन करता है.और जीवन देता है/ और अंत में भूर प्राण और जीवन देने वाला है/ जब उस प्रभु की इच्छा होती है वह हमें मौत दे सकता है./वह प्राणस्वरूप है और औरआध्यात्मिक शक्ति देता है ./(भू) अर्थात: हे प्रभु आप जीवन देने वाले है और जिन्दा रखने के लिए शक्ति देते है इसीलिए आप यह शक्ति हमें प्रदान करें/ . 3.भुवः —इस शब्द भुवः परमात्मा का इस संसार में होना दर्शाता है./जो इस ब्रह्माण्ड का चलायमान और सञ्चालन करता है./ इस शब्द का अर्थ है कि यह हमारे दुखों और तकलीफो जैसे भूचाल, बाढ़ इत्यादि को दूर करता है ,/ इसी कारन हम उस प्रभु के भक्त बनते हैं/यह ध्यान देने वाली बात है कि यह सब तकलीफे हमारे अपने मस्तिष्क की उपज हैं / जो हम सोचते हैं वैसा ही हो जाता है./ इसीलिए यह शब्द भवः परमात्मा और हम सांसारिक पराणियों का संपर्क करने वाला है./परमात्मा की महत्वता आकाश के होने ही जानी जा सकती है./ अर्थात: हे प्रभु खुशियों को देने वाले हम आप केऔर आप की शक्ति का अपने पास होने अंदाज़ा कर सकते हैं इसीलिए आप हमें तकलीफो और दुखों को दूर करने के लिए अपना आशीर्वाद प्रदान करें ————————————————————- 4 :स्व ; यह बताता है कि परमात्मा सर्व-वयापी और सब जगह है इसीलिए वह प्रभु इस संसार से जिसको उसने बनाया है सम्बन्ध बनाये रखता है और अपने अधिकार रखता है ताकि वह इस ब्रह्मांड को ठीक प्रकार से चलायमान रख सकेऔर स्व; का शब्द परमात्मा के आशीर्वाद से भी सम्बंधित है/ हमारे पास दुःख और खुशियां है पर वह सब क्षणिक मात्र समय के लिए हैं / मगर हम ऐसा महसूस करते हैं कि हमारे दुःख अन्तकाल के लिए होते है / मनुष्य के पास खुशियां हैं वह भी कुछ समय तक के लिए हैं/ जबकि परमात्मा का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है/ परन्तु यह सब प्रकृतिक हैं/ वह मनुष्य जिसने परमात्मा के आशीर्वाद को प्राप्त कर लिया है और अपने आप को प्रभु के आश्रित करलिया है उसको दिव्य जयोति मिलती है और वह सुख स्वरूप कहलाता है/ परमात्मा के पास आध्यात्मिक ज्ञान का सागर है और वह परमात्मा इस ब्रह्माण्ड का संचालित करता है/ यह तीन शब्द अपने आप में निम्न बातों का उलेख करते हैं : –भू : जीवन, पृथ्वी और खुद का इस संसार में मौजूद होने का अहसास / –भुवः: आकाश और स्वम,/ –स्वः:- धयान, स्वर्ग , आराधना और खुशियां / अर्थात: हे प्रभु खुशियों के देने वाले , आप के खुशियों का भंडार है,अमृत है / कृपया हमें इन सब में अपना भागीदार बनाये ताकि हमारे पास हमेशा खुशियां ही खुशियों हों / तत्सवितुर्वरेण्यं 5 . तत—–इस शब्द को संस्कृत में इस्तेमाल किया गया है और इसको तीसरे व्यक्ति के लिए प्रयोग किया गया है यह एक मनुष्य की विचारशक्ति है/ भगवद गीता में श्री कृष्ण ने स्वयम कहा है कि मनुष्य को स्वारथी नहीं होता चाहिए/ जब वह पूजा कर रहा हो या फिर वह कोई कार्य कर रहा हो तब इसको अपना कर्तव्य या धर्म समझ कर बिना किसी स्वार्थ के कर रहा होता है/ तत शब्द गायरी मंत्र में साधक द्वारा परमात्मा की पूजा से सम्बंधित है./ जिसमे वह बिना किसी प्रकार के लाभ के प्रभु के लिए अपनी आराधना कर रहा हो/ आत्म-विवेचन द्वारा मनुष्य परमात्मा को सर्वशक्तिमान मानता है जिसको वह मनुष्य जानता और समझता है. अर्थात: हे प्रभु आपने इस सृश्टी को या ब्रह्माण्ड को उत्पन किया है/ और आप हमारे माता पिता हैं/ इसीलिए हम आप से सन्मार्ग की और जाने की शक्ति मांगते हैं./ 6-सवितुर् ” :यह शब्द सविता शब्द का परारूप है जो प्रभु का दूसरा नाम है./इसीलिए गायत्री मंत्र का सावित्री मंत्र से भी जाना जाता है/ और यह प्रभु की उत्पन करने वाली और इस संसार को सब कुछ देने वाली शक्ति का स्रोत्र है/ इसी से प्रभु ने इस ब्रह्माण्ड की रचना की है/इस के साथ साथ संरक्षक और नाश करने वाली शक्ति भी इसके द्वारा प्रभु के पास है/ प्रभु की दिव्या शक्ति ही इस ब्रह्माण्ड को जीवन देने वाली कही जा सकती है/ और प्रभु को मालूम है की किस समय इस सृश्टी का नाश किया जाना चाहिए/ सविता परमात्मा का हम मनुष्यों को उपहार है./ इसी उपहार द्वारा हम मनुष्यों के पास अपने लिए अविष्कार और कला करने की शक्ति मिली हुई है/ जो आविष्कार हमारे साइंटिस्ट्स ने किये हैं वह सब इस सविता के द्वारा दी गयी शक्ति का उपयोग है/ क्योंकि मनुष्य शांत नहीं बैठ सकता और कुछ ना कुछ अविष्कार करता रहता है/ / इसीलिए हम सविता को अपना माता और पिता कह सकते हैं/ इसी सविता से हमें अच्छे और बुरे की पहचान करनी आती है/ .सविता हमें स्वयम मार्ग दर्शन करके जीवन जीना सिख लाती है / इस सविता शब्द का मंत्र में इस्तेमाल हमें समझाता है कि हम कुछ अपने लिए परिश्रम करें क्योंकि प्रभु हमें तब तक कोई मदद नहीं करेगा जब तक हम खुद अपनी मदद ना करें/ यह सब सविता की आधयात्मिक शक्ति द्वारा ही संभव है/ सारांश में: सविता प्रभु का दूसरा नाम है जो संसार को उत्पन,संरक्षण , और नाश करने की शक्ति रखता है.और इस सविता द्वारा मनुष्य को अपनी तरक्की के लिए अविष्कार करना सिखलाता है./और अच्छे बुरे की पहचान करना सिख लाता है तभी यह हम मनुष्यों के लिए माता पिता कह लाता है/ 7. वरेण्यम : इस शब्द से हमें परमात्मा का होना बताया गया है./वह प्रभु जो विश्वाश करने योग्य है /इसीलिए हम इस प्रभु को सर्वउच्च मानते हुएअपने आप को उसको समपर्ण करते है/इस संसार में हम हर किसी पर विश्वास नहीं कर सकते और जिस पर हम विश्वास करते हैं उस पर हम पूरी तरह से निर्भर हो जाते हैं/ क्योंकि हम हर एक पर विश्वास नहीं कर सकते इसीलिए हम उस प्रभु पर पूर्ण विश्वास करते हुए निर्भर हो जाते हैं और उसको अपना नेता या मार्ग दर्शक कहते हैं/ तथा उसको शक्तिमान मानते हुए उसकी आरधना करते हैं/ .इसी को हम वरेण्यम कहते हैं और विश्वास करते हैं / सारांश में: हे प्रभु हम किसी और पर निर्भर ना रहते हुए आप पर विश्वास करते हुए निर्भर रह कर आप की आरधना करते हैं/ हमारे लिए वरेण्यम और माननीय हैं/. . भर्गो देवस्य धीमहि यह तीन शब्दों का मिलन परमात्मा की अच्छाईयों और उसके द्वारा किये कार्य बताता है/ उसके कार्य करने के तरीके बताता है जिसके द्वारा वह हमारे संपर्क में है / भर्गो: 8. भर्ग: इसके अर्थ है कि वह परमात्मा जो शोभनीय और प्रकाश से भरपूर है और प्यार और शक्ति है जिसके द्वारा हमारे दुःख और तकलीफें दूर होती है / वह शक्तिशाली परमात्मा है जिसका प्रकाश सभी सूर्यों के प्रकाश से उच्चतम है और वह सबसे अधिक विद्वान् है/ वह उनके पाप नष्ट करता है जो उसके संपर्क में आते है/जब हम सोने को पिघलाते हैं तो वह सोना अपने आप में निखर जाता है उसी प्रकार हम मनुष्य भी परमात्मा के सम्पर्क मे आकर अपनी आत्मा को पवित्र करते हैं/ और उसको पूजा करके उससे दिव्या रौशनी प्राप्त करके अपने सांसारिक अंधकार को दूर करते हैं/ हमारी आत्मा पाप करने के कारण अपवित्र हो जाती है जबकी वह आत्मा खुद प्रकृति द्वारा दिव्या ज्योति वाली होती है/ और परमात्मा की दिव्य शक्ति से हमारी आत्मा अन्धकार को दूर करके पवित्र होती है/और हम स्वयं तेजस्वी हो जाये / सारांश में: हे ईश्वर हम आपकी दिल से पूजा करते हैं ताकि आपके दिव्य तेज द्वारा हमारे भीतर की आत्मा भी अंधकार को दूर करके और गलत कार्यो को समाप्त करके पवित्र हो जाये/ देवस्य 9. देवस्य : पुरे भारत में देव शब्द पवित्र माना जाता है/ वह मनुष्य जो अच्छे आचरण वाला. अच्छे कार्य करने वाला और अच्छी आदतों वाला है वह देव माना जाता है/क्योंकि वह दूसरों से कोई गलत बात–वव्यहार नहीं करता/ इसिलए ऐसे देव पुरुष को परमात्मा के निकट होना कहा गया है/ देव शब्द अच्छे संस्कार और कार्यों के कारण देवता और देवी से सम्बंधित है क्योंकि उसके पास गुणों का भंडार है/ जैसे ब्रहम्म को सृष्टि करता., कामदेव को प्यार करने वाला इर्यादि/ भारत में बहुत से देवता और देवियों के नाम परमात्मा रूपी कार्यओं के अनुरूप रखे हैं / यहाँ तक हम भारत के लोग अपने माता पिता और आचार्य को भी देव तुल्य मानते हैं/ इस प्रकार देवता शब्द को परमात्मा के गुणों वाला कह सकते हैं/ यह देव शब्द गायत्री मंत्र में सविता देव के अनुरूप खुशियों वाला, सब जगह मौजूद रहने वाला जैसे गुणों को वाला होने के कारण इस्तेमाल किया गया है अर्थात उत्पन-करता, वरेण्यम और अच्छाई से भरपूर और आधयात्मिक रौशनी वाला कहते हैं/ सारांश में: पराकृति द्वारा अच्छे कार्य करने वाला ही देवता माना गया है./ दूसरों के लिए दिव्य शक्ति द्वारा अच्छे कार्य करने वाले को देवता स्वरुप मानते हैं./इसीलिए हम देवों के देव महादेव प्रभु का ध्यान करते हैं और परार्थना करते हैं कि वह हमारी आत्मा को दिव्य-रौशनी और हमें दिव्य- जीवन प्रदान करें / धीमही 10. धीमही: इस शब्द से तात्पर्य है कि हम प्रभु की पूजा कर रहे हैं/जब हम दिल से पूजा करते हैं तब हमारा मन एक चित होना चाहिए ताकि हमारे मष्तिष्क में गंदे विचार ना आएं/ हम परमात्मा की पुरे तौर पर पवित्र आरधना नहीं कर सकते क्योंकि हमारे भीतर के सांसारिक विचार हमारे मष्तिष्क अपवित्र करते हैं/ इसीलिए हमारा कर्तव्य है कि हम बुरे विचार ना सोचे/ गायत्री मंत्र को समझ ने के लिए पूजा और साधना के लिए परमात्मा की दिव्यता को याद रखे/उस प्रभु से सम्बन्ध के लिए हमें खुद को भूल कर स्वार्थी भाव छोड़ना होगा/ तभी हम अपने दुःख दूर कर सकेंगे / सारांश में:हे प्रभु हम आपकी पूजा करने के लिए आप ध्यान करते हुए परार्थना करते हैं कि आप हमें अपनी दिव्य ज्योति प्रदान करे / धियो; क्योंकि कुदरत के द्वारा हमारी आत्मा को दिव्या ज्योति पर्याप्त है ताकि हम अपने मस्तिष्क को पूर्ण रूप से नियंत्रण रख सके / इसीलिए हम प्रभु से पूजा करते हैं कि वह हमें पवित्र और सही मार्ग दिखलाये/ अगले चार शब्दों में हम अपनी बुद्धि को तेज करने के लिए प्रभु से परार्थना कर रहे हैं/ 11. धीयो यह शब्द गायत्री मंत्र का मुख्य भाग है क्योंकि हम दिल से प्रभु के गुणो को समझ चुके हैं/ तब हम उस प्रभु से अपने मष्तिष्क और बुद्धि के लिए उसका प्रभाव पा सकें/ प्रभु का प्रभाव होने से हमारे दुःख और तकलीफे हमारे लिए कुछ भी कीमती नहीं हैं./. शारीरिक मूल्यों के अलावा बुद्धि हमारी तरक़्क़ी का साधन हैं/इसीलिए यह जरूरी है कि है हमारे पास बुद्धि होनी चाहिए वरना हमारा जीवन नरक समान है./ प्रभु द्वारा बनाये गए संसार में मनुष्य ही एक मात्र उत्पत्ति है जिसके पास मस्तिष्क है/ जब हम प्रभु को हर प्रकार से समझ चुके हैं तो हमारे पास केवल बुद्धि की कमी है जिसको हम प्रभु से नहीं ले सके क्योंकि उस बुद्धि के बिना हम बेकार हैं / इस गायत्री मंत्र के द्वारा हम प्रभु से सद-बुद्धि की आरधना करते हैं / उपनिषद के अनुसार बुद्धि हमारे जीवन का आधार या सारथी है./ बुद्धि ही है इस जीवन की पतवार / इसीलिए हम प्रभु से गायत्री मंत्र के द्वारा परार्थना करते हैं वह हमें आध्यात्मिक बुद्धि या सद-बुद्धि प्रदान करें. . सारांश में: हे ईश्वर हम आप के आरधना करते है कि आप हमें अपने प्रकाश द्वारा दिव्य -बुद्धि प्रदान करें यो न: प्रचोदयात 12.योह ; अर्थात ईश्वर जिससे हम अपने लिए सद -बुद्धि और साध्वीक मष्तिष्क की कामना करते हैं नाह ; अर्थात हमारा – जब हम गायत्री द्वारा प्रभु से परार्थना करते है तब हम सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि समस्त पराणियों के लिए करते हैं./ हम सभी मनुष्यों के लिए सद्बुद्धि की परार्थना करते हैं / नाह का अर्थ हमारा है और निःसवार्थ पूर्ण से गायत्री मंत्र द्वारा खुद अपने नहीं समस्त संसार के लिए प्रभु से परार्थना है / इस तरह हम समस्त संसार के लिए परार्थना करते हैं जैसे यह संसार हमारा परिवार है/ इसके द्वारा हम अपने लिए नहीं बल्कि इस परिवार के प्रत्येक प्राणी के कल्याण हेतु उस प्रभु के प्यार के लिए परार्थना करते हैं / प्रचोदयात:: यह गायत्री मंत्र का आखिरी शब्द है/ जो इस मंत्र का मूल है/इसके द्वारा हम ईश्वर से आखिरी परार्थना करते है/ अर्थात इस शब्द द्वारा हम प्रभु से उसकी दिव्या शक्ति की कामना करते हैं ताकि हम सन्मार्ग पर चल सके/ इसके द्वारा हम प्रभु से उसकी दिशा निर्देश को मांगते है ताकि हम सन्मार्ग पर चल सके./ क्योंकि इस बुद्धि द्वारा हम यह जान सकते हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत है/ इसके द्वारा हम प्रभु से दिव्य और गुणो से भरपूर्व प्रकाश मांगते है (भर्गो ).ताकि हमारे जीवन का अन्धकार दूर हो सके./और दिव्य तथा सद्बुद्धि से हमें मानसिक शांति मिल सके/ सारांश में: हे शक्तिशाली प्रभु हम आप से अच्छे विचारों के लिए और जीवन में सन्मार्ग पर चलने के लिए सद्बुद्धि की कामना करते हैं ताकि हमारे जीवन का अंधकार दूर हो सके और हमारे मस्तिष्क में शुद्ध विचार आये और गलत विचार ना आये इस मंत्र को संशिप्त में हम इस प्रकार कह सकते है ———————————————————– ॐ भूर भवः सुवः : हे प्रभु आप सर्वव्यपाक और संरक्षक है /आप हमें धर्म के सन्मार्ग की और चलने का मार्ग दर्शन करे / आप हमारे जीवन दाता और जीवन देने वाली ताकत हैं./आप हमें इस संसार में रहने के लिए शक्ति प्रदान करे,/ हे प्रभु आप हमें खुशियों को देने वाले है हम अपने अंदर आप को महसूस करते है और आप शक्ति को भी पहचानते हैं इसलिए हम आप से परार्थना करते हैं कि आप हमें अपनी दुःख और तकलीफो को दूर करने का आर्शीवाद देवे./ आप के पास खुशिओं और अमृत का भंडार है / आप हमें अपना सहभागी बना कर यह खुशियां प्रदान करे ताकि आप तक पहुँचने के लिए सच्चा और सन्मार्ग पर चले/ तत्सवितुर वरेण्यम :: ओह प्रभु इस ब्रहम्माण्ड और सृश्टी के करता आप हमारे माता और पिता हैं/. हम आप से सन्मार्ग पर चलने के लिए मार्ग दर्शन करे / आप हमारे विश्वसनीय हैं. और आप पर निर्भर होने के लिए आप से अच्छा और कोई नहीं है / आप हमारे वरेण्यम हैं . भर्गो देवस्य धीमहि :: हे ईश्वर आप से दिल से परार्थना करते है आप हमें दिव्यप्रकाश द्वारा अपनी आत्मा में अन्धकार को दूर करने की शक्ति देवे ताकि हम गलत किये गए काम को खत्म करके आत्मशुद्धि प्राप्त करे/हे देवों के देवता महादेव हम आप का ध्यान करते हैं ताकि हमारे आत्मा में दिव्यप्रकाश हो और हमारा दिव्यपूर्ण जीवन हो/ इन सबके लिए हम आप से परार्थना करते हैं /. धियो यो नः पर्च्दायात :हे प्रभु हम आप का ध्यान और परार्थना करते हैं ताकि आप आध्यात्मिकता द्वारा हमें प्रकाशमयी बुद्धि प्रदान करे / अच्छे विचार प्रदान करे / और आप हमें सन्मार्ग की और जाने के लिए सद्बुद्धि देवे ताकि हमारे मस्तिष्क में गलत विचार और गलत कार्य ना पैदा हों./ गायत्री मंत्र के फायदे/लाभ और उसका हमारे इंसानी शरीर पर असर ——————————————————————————– ऋषि और मुन्नियों ने अपने अनुभवो द्वारा इस शरीर में विशाल संवेदनशील जगहों जैसे चक्र , उपचक्र , ग्रंथि , कोष और नाड़ियां नसें पर गायत्रीमंत्र के लगातार जाप का इस इंसानी शरीर और मस्तिष्क पर प्रभावी असर महसूस किया है./ हमारा मस्तिष्क तेज प्रकृति वाला और दिल विशाल है./गायत्री मंत्र का संवेदनशील असर हम पर होता है और इस सब का हमारे शरीर प्राण पर अलौकिक असर होता है/. भारतीय प्राचीन ऋषियों ने गायत्री मंत्र में चुने हुए शब्दों का प्रयोग किया है/ जो अपना अर्थ भी बताते हैं और हमारे शरीर में कम्पन पैदा करते हुए साधक को शक्ति देते हैं./ हिन्दू वैदिक संतों ने बहुत सालों तक तपस्या करके इस मंत्र द्वारा सिद्धि पायी है/ यह मान्यता है कि इस गायत्री का साधक अपने मस्तिष्क में एक आध्यात्मिक शक्ति और दिव्य शक्ति और शांति का अनुभव करता है/ गायत्री मंत्र का विशेष प्रकृतिक असर हमारे सांसारिक शरीर पर महत्वपूर्ण होता है/ इस मंत्र का चक्रधारी उच्चारण हमारे भौतिक शरीर पर असाधारण शक्तिशाली होता है / जबान , होंठ उच्चारण का तरीका इत्यादि हमारे दिमाग और भौतिक शरीर पर असर होता है / . इसकी संगीतमयी ध्वनि का भी असर होता है./यह सब साधक को चुम्बकीय ताकत द्वारा साधक को आकर्षित करता हुआ गायत्री शक्ति का प्रभाव छोड़ता है. \ इस मंत्र का लगातार उच्चारण साधक के मस्तिष्क पर चुम्बकीय जैसी दिव्यशक्ति देता है/ इस गायत्री मंत्र को सुना, बोलना और सोचा जा सकता है./ इन तीनो में इसकी अद्भुत शक्ति है और आप जो भी आप के लिए उचित और अच्छी है उसको चुन सकते है / .भारत के उच्च विद्वान व्यक्तियों द्वारा गायत्री की महत्वता और शक्ति का गुणगान : ————————————————————————————– ब्रह्मा ऋषि मुनि और अनेक विद्वान मनुष्यो ने इस गायत्री की महिमा को समझा है/ संसार के हर हिन्दू परिवार में इस मंत्र का जाप पूजा के लिए होता है.इस मंत्र के अलावा और कोई मंत्र नहीं है जिसका इसके तुल्य उच्चारण होता हो./ इसका लाभ उसी को महसूस होगा जो इसका नियमपूर्वक जाप करता है. /चारों वेदों में इस मंत्र के समक्ष कोई नहीं है./ कोई यज्ञ . दानपुण्य और धार्मिक कार्य इसके बिना पुरे नहीं किये जाते/ कभी कभी यह भी कहा जाता है कि जिस ब्राह्मण परिवार में इस मंत्र का तीन पीढ़ियों तक उच्चारण नहीं होता वह परिवार ब्राह्मण नहीं कहलाता/ हिन्दू धर्म के सर्वउच्च विद्वान मनु के अनुसार ब्रह्मा ने इस गायत्री मंत्र में तीन वेदों का सारांश दिया है./गायत्री मंत्र के अलावा कोई दूसरा पवित्र मंत्र नहीं है/ तीन साल तक नियम्पूर्व जाप करने वाला व्यक्ति प्रभु को महसूस कर सकता है. / ऋषि पराशर के अनुसार गायत्री मंत्र सबसे श्रेष्ट है./ वेदों और गायत्री में से गायत्री महान है/जो इस मंत्र का जाप सच्चे मन से करता है वह इस संसार में पवित्रता को पाता है और सुखी होजाता है./ महर्षि व्यास ने इस गायत्री को वेदों का सारांश कहा है और इसकी तुलना फूलों के शहद , दूध से मख्खन से की है./गायत्री कामधेनु के सामान है जिसके द्वारा पवित्रता पायी जाती है./गंगा सांसारिक शरीर के पापों को धोती है तो गायत्री जो ब्रह्मगंगा का रूप है, हमारी आत्मा को पवित्र करती है/ ऋषि भारद्वाज कहते हैं कि प्रभु ब्रह्मा भी इस मंत्र का जाप करते है ./इसके द्वारा प्रभु को और निःस्वार्थ भाव से पाया जा सकता है /ऋषि वशिष्ट के अनुसार गायत्री जाप से पवित्रता और स्वयंभू प्रप्ति होती है / आदि शंकराचार्य ने कहा है कि इस गायत्री के महत्त्व को बताना मनुष्य की शक्ति के बाहर है/. इस संसार में इस से ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं है/ दिव्य- स्वरुप गायत्री द्वारा ही मनुष्य स्वयंभू और बुद्धिमत्ता को पाता है./ स्वामी विवेकानंद ने इस गायत्री मंत्र को बुद्धिमत्ता की पराप्ति का साधन बताया है / और मन्त्रों में एक हीरा कहा है/ स्वामी विरजानंद ने ५ साल की आयु में अपनी आँखे खो दी थी / उन्होंने कोई किसी प्रकार की स्कूल की पढ़ाई नहीं की थी / और घर छोड़ने के बाद तीन साल तक ऋषिकेश में गंगा में खड़े हो कर गायत्री का जाप किया/एक रात को स्वप्न में उनको दिव्यप्रकाश की प्राप्ति हुए/ उसी समय उन्होंने सन्यास आश्रम में प्रवेश किया./ यह अपने आप में एक अद्भुत स्वप्न था./ स्वामी विरजानन्द एक दूरदर्शी व्यक्ति थे / अपने गुरु स्वामी विरजानंद की मृत्यु पर स्वामी दयानंद ने कहा था कि एक सूर्य अस्त हो गया है./ विशेष विवरण के तौर पर कहने के लिए ;;स्वामी विरजानंद एक बार यमुना के किनारे बैठे थे जब उन्होंने दक्षणी ब्राह्मण द्वारा अष्टाधायी का पाठ सुना तब उन्होंने उस ब्राह्मण को बुला कर अष्टाधायी का गुणगान सुना तो उसको सुन कर स्वामी जी ने खुद उसका पाठ बिना किसी गलती के सुना दिया /कहते हैं यह सब उन्होंने गायत्री मंत्र की शक्ति और परताप से किया था./ उन्ही के शिष्य स्वामी दयानंद ने इस संसार में वैदिक धर्म को जागरूकता दी , और उन्होंने ॐ शब्द को परमात्मा का स्वरुप बताया और उस ॐ की महत्वता को संसार को समझाया. उन्होंने ॐ शब्द के हर अक्षर में परमात्मा का रूप है और परमात्मा के अनेक नाम नहीं हैं./ एक ब्राह्मण इस शब्द ॐ इतना प्यार से बोलता है जैसे एक पिता अपने बच्चे को प्यार करता है / मैंने (सुरेश कल्हण )स्वयं इसको परखा है जिसके द्वारा मैंने महसूस किया है कि इसका आत्म रूपी असर होता है और इसके द्वारा हमारी तकलीफें दूर होती है/ अगर सम्पूर्ण तकलीफे नहीं दूर हो तो कम से कम कुछ हद तक उनमे कमी जरूर आ जाती है/ जय हिन्द मेरा भारत महान , सुरेश चन्द कल्हण द्वारा संगृहीत देहरादून 11/10/2016 Advertisements  Categories: Uncategorized Leave a Comment my Poems by Suresh Chand Kalhan Blog at WordPress.com. 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श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्द में लिखा है कि श्रीकृष्ण स्नान करने के बाद गायत्री मंत्र

 होम प्रवचन गायत्री मंत्र के जाप से संभव है ब्रह्मदर्शन Last Modified: Mon, May 29 2017. 22:28 IST  गायत्री माता की उत्पत्ति कब हुई थी? गायत्री महामंत्र का क्या महत्व है? तारीफ सिंह, ग्राम- मित्ररोल, हरियाणा गायत्री जयंती ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (इस वर्ष रविवार, 4 जून) को है। सनातन धर्म के ग्रंथों में गायत्री मंत्र का प्रादुर्भाव ज्येष्ठ मास की शुक्ल दशमी को हुआ था। इस मंत्र के ब्रह्मर्षि विश्वामित्र दृष्टा बने। कौशिक मुनि, जो बाद में विश्वामित्र हो गए, की तपस्थली कौसानी, उन्हीं के नाम पर है। विश्व का कल्याण करने के लिए उन्होंने गायत्री मंत्र को जनमानस में फैलाया। गायत्री जयंती को कहीं-कहीं गंगा दशहरा के अगले दिन यानी ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को भी मनाते हैं। दिव्य मंत्र- ‘ओम भूर्भुव:स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गाे देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्॥’ सनातन धर्म के मानने वाले गणेश मंत्र के बाद पूजा में इस मंत्र का उच्चारण-जाप करते ही हैं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्द में लिखा है कि श्रीकृष्ण स्नान करने के बाद गायत्री मंत्र का जाप करते थे। महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि विश्वामित्र ने अपने शिष्यों- राम और लक्ष्मण को इस मंत्र का रहस्य विस्तार से समझाया था। टॉप न्यूज़ SC सख्त:पटाखों की बिक्री पर रोक बरकरार, पर लोगों को दी ये छूट Fri, Oct 13 2017. 13:23 IST जवाब: अमित शाह बोले, जय की कंपनी में भ्रष्टाचार का सवाल ही नहीं उठता Fri, Oct 13 2017. 13:40 IST डेरा सच्चा सौदा: हनीप्रीत ने कबूले हैं ये 10 गुनाह, आज कोर्ट में पेशी Fri, Oct 13 2017. 12:24 IST SHOCKING! किसने कहा ऐसा, धौनी की जगह दिनेश कार्तिक खेलें प्लेइंग11 में Fri, Oct 13 2017. 13:06 IST गुजरात यात्रा: योगी आदित्यनाथ ने कहा बीजेपी विकास में अंतर नहीं करती Fri, Oct 13 2017. 13:26 IST कपिल शर्मा ने मारी 'फिरंगी' को लात, ऐसा है नई फिल्म का मोशन पोस्टर Fri, Oct 13 2017. 12:42 IST गायत्री संहिता के अनुसार, ‘भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका॥’ अर्थात गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह वेदमाता हैं। समस्त ज्ञान की देवी गायत्री ही हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान ब्रह्मा यज्ञ में शामिल होने जा रहे थे। धार्मिक कार्यों में पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए पत्नी का साथ होना नितांत जरूरी होता है, परन्तु उस समय ब्रह्मा जी के साथ उनकी पत्नी सावित्री मौजूद नहीं थीं। तब उन्होंने देवी गायत्री से विवाह कर लिया। पद्मपुराण के सृष्टिखंड में गायत्री को ब्रह्मा की शक्ति बताने के साथ-साथ पत्नी भी कहा गया है। शारदा तिलक में गायत्री के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है- गायत्री पंचमुखा हैं, ये कमल पर विराजमान होकर रत्न-हार-आभूषण धारण करती हैं। इनके दस हाथ हैं, जिनमें शंख, चक्र, कमलयुग्म, वरद, अभय, अंकुश, उज्ज्वल पात्र और रुद्राक्ष की माला आदि है। पृथ्वी पर जो मेरु नामक पर्वत है, उसकी चोटी पर इनका निवास स्थान है। सुबह, दोपहर और शाम को इनका ध्यान करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से ही इनका जाप करना चाहिए। शंख स्मृति के अनुसार गायत्री मंत्र के जाप से भय समाप्त हो जाता है। महाभारत के अनुसार गायत्री मंत्र से ब्रह्मदर्शन संभव है। संबंधित खबरें  काम की बात: नहीं आती नींद तो काम आएगा एक लोटा जल का यह उपाय  गायत्री मंत्र का जप करने से मिलेगी शनि की पीड़ा से मुक्ति  प्रजापति को बचाने के बजाय गायत्री मंत्र का पाठ करें मुलायम: बीजेपी  SHOCKING: इस टीवी एक्ट्रेस ने गायत्री मंत्र का टैटू हटाया, जानें क्यों हिन्दुस्तान मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें  अगला लेख:कल्कि अवतार की कथा ताजा खबरें ई - पेपर मनोरंजन खबरें गैलरी एन सी आर क्रिकेट खबरें जरूर पढ़ें उत्तर प्रदेश बिजनेस खबरें आज के हिन्दुस्तान से बिहार झारखंड ऐप्स Copyright © 2017 Hindustan Media Ventures Limited. All Rights Reserved. 

ऋषियों के आविष्कार

व्रजराज गौशाला एवम पंचगव्य अनुसन्धान केंद्र (Cow Care Unit) एक घर बेघर गौवंश के लिए search JUN 19 मधुमेह (डायबिटीज) मधुमेह (डायबिटीज) : राजीव दीक्षित Rajiv Dixit आजकल मधुमेह की बीमारी आम बीमारी है। डाईबेटिस भारत मे 5 करोड़ 70 लाख लोगोंकों है और 3 करोड़ लोगों को हो जाएगी अगले कुछ सालों मे सरकार ये कह रही है | हर दो मिनट मे एक मौत हो रही है डाईबेटिस से और Complications तो बहुत हो रहे है... किसी की किडनी ख़राब हो रही है, किसीका लीवर ख़राब हो रहा है किसीको ब्रेन हेमारेज हो रहा है, किसीको पैरालाईसीस हो रहा है, किसीको ब्रेन स्ट्रोक आ रहा है, किसीको कार्डियक अरेस्ट हो रहा है, किसी को हार्ट अटैक आ रहा है Complications बहुत है खतरनाक है | जब किसी व्यक्ति को मधुमेह की बीमारी होती है। इसका मतलब है वह व्यक्ति दिन भर में जितनी भी मीठी चीजें खाता है (चीनी, मिठाई, शक्कर, गुड़ आदि) वह ठीक प्रकार से नहीं पचती अर्थात उस व्यक्ति का अग्नाशय उचित मात्रा में उन चीजों से इन्सुलिन नहीं बना पाता इसलिये वह चीनी तत्व मूत्र के साथ सीधा निकलता है। इसे पेशाब में शुगर आना भी कहते हैं। जिन लोगों को अधिक चिंता, मोह, लालच, तनाव रहते हैं, उन लोगों को मधुमेह की बीमारी अधिक होती है। मधुमेह रोग में शुरू में तो भूख बहुत लगती है। लेकिन धीरे-धीरे भूख कम हो जाती है। शरीर सुखने लगता है, कब्ज की शिकायत रहने लगती है। अधिक पेशाब आना और पेशाब में चीनी आना शुरू हो जाती है और रेागी का वजन कम होता जाता है। शरीर में कहीं भी जख्म/घाव होने पर वह जल्दी नहीं भरता। तो ऐसी स्थिति मे हम क्या करें ? राजीव भाई की एक छोटी सी सलाह है के आप इन्सुलिन पर जादा निर्भर न करे क्योंकि यह इन्सुलिन डाईबेटिस से भी जादा खतरनाक है, साइड इफेक्ट्स बहुत है | इस बीमारी के घरेलू उपचार निम्न लिखित हैं। आयुर्वेद की एक दावा है जो आप घर मे भी बना सकते है - 1. 100 ग्राम मेथी का दाना 2. 100 ग्राम तेजपत्ता 3. 150 ग्राम जामुन की बीज 4. 250 ग्राम बेल के पत्ते इन सबको धुप मे सुखाके पत्थर मे पिस कर पाउडर बना कर आपस मे मिला ले, यही औषधि है | औषधि लेने की पद्धति : सुबह नास्ता करने से एक घंटे पहले एक चम्मच गरम पानी के साथ लेले फिर शाम को खाना खाने से एक घंटे पहले लेले | तो सुबह शाम एक एक चम्मच पाउडर खाना खाने से पहले गरम पानी के साथ आपको लेना है | देड दो महीने अगर आप ये दावा ले लिया और साथ मे प्राणायाम कर लिया तो आपकी डाईबेटिस बिलकुल ठीक हो जाएगी | ये औषधि बनाने मे 20 से 25 रूपया खर्च आएगा और ये औषधि तिन महिना तक चलेगी और उतने दिनों मे आपकी सुगर ठीक हो जाएगी | सावधानी : 1. सुगर के रोगी ऐसी चीजे जादा खाए जिसमे फाइबर हो रेशे जादा हो, High Fiber Low Fat Diet घी तेल वाली डायेट कम हो और फाइबर वाली जादा हो रेशेदार चीजे जादा खाए| सब्जिया मे बहुत रेशे है वो खाए, डाल जो छिलके वाली हो वो खाए, मोटा अनाज जादा खाए, फल ऐसी खाए जिनमे रेशा बहुत है | 2. चीनी कभी ना खाए, डाईबेटिस की बीमारी को ठीक होने मे चीनी सबसे बड़ी रुकावट है | लेकिन आप गुड़ खा सकते है | 3. दूध और दूध से बनी कोई भी चीज नही खाना | 4. प्रेशर कुकर और अलुमिनम के बर्तन मे खाना न बनाए | 5. रात का खाना सूर्यास्त के पूर्व करना होगा | जो डाईबेटिस आनुवंशिक होतें है वो कभी पूरी ठीक नही होता सिर्फ कण्ट्रोल होता है उनको ये दावा पूरी जिन्दगी खानी पड़ेगी पर जिनको आनुवंशिक नही है उनका पूरा ठीक होता है | अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें: http://www.youtube.com/watch?v=oiRf-LLSq0U Posted 19th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 11 *.ॐ के उच्चारण के शारीरिक लाभ - *.ॐ के उच्चारण के शारीरिक लाभ - 1.अनेक बार ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है। 2.अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं। 3.यह शरीर के विषैलेतत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है। 4.यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है। 5.इससे पाचन शक्ति तेज़ होती है। 6.इससे शरीर में फिरसे युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है। 7.थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं। 8.नींद न आने की समस्या इससे कुछ हीसमय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी। 9.कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती ह Posted 11th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 10 क्या लिखा अंग्रेज़ macaulay ने 1835 मे अंग्रेज़ो की संसद को !!! _________________________________________ मैं भारत के कोने कोने मे घूमा हूँ मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी हो चोर हो ! इस देश में मैंने इतनी धन दोलत देखी है इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता हम इस देश को जीत पाएंगे , जब तक इसकी रीड की हड्डी को नहीं तोड़ देते ! जो है इसकी आध्यात्मिक संस्कृति और इसकी विरासत ! इस लिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ ! की हम पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बादल डाले ! क्यूंकि यदि भारतीय सोचने लगे की जो भी विदेशी है और अँग्रेजी है वही अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे !! और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते है ! एक पूरी तरह से दमित देश !! ______________________________________________________________ और बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है की macaulay अपने इस मकसद मे कामयाब हुआ !! और जैसा उसने कहा था की मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा की इस मे पढ़ के निकलने वाला व्यक्ति सिर्फ शक्ल से भारतीय होगा ! और अकल से पूरा अंग्रेज़ होगा !! और यही आज हमारे सामने है दोस्तो ! आज हम देखते है देश के युवा पूरी तरह काले अंग्रेज़ बनते जा रहे है !! उनकी अँग्रेजी भाषा बोलने पर गर्व होता है !! अपनी भाषा बोलने मे शर्म आती है !! madam बोलने मे कोई शर्म नहीं आती ! श्री मती बोलने मे शर्म आती है !! अँग्रेजी गाने सुनने मे गर्व होता है !! मोबाइल मे अँग्रेजी tone लगाने मे गर्व होता है !! विदेशी समान प्रयोग करने मे गर्व होता है ! विदेशी कपड़े विदेशी जूते विदेशी hair style बड़े गर्व से कहते है मेरी ये चीज इस देश की है उस देश की है !ये made in uk है ये made इन america है !! अपने बच्चो को convent school पढ़ाने मे गर्व होता है !! बच्चा ज्यादा अच्छी अँग्रेजी बोलने लगे तो बहुत गर्व ! हिन्दी मे बात करे तो अनपद ! विदेशी खेल क्रिकेट से प्रेम कुशती से नफरत !!! विदेशी कंपनियो pizza hut macdonald kfc पर जाकर कुछ खाना तो गर्व करना !! और गरीब रेहड़ी वाले भाई से कुछ खाना तो शर्म !! अपने देश धर्म संस्कृति को गालिया देने मे सबसे आगे !! सारे साधू संत इनको चोर ठग नजर आते है !! लेकिन कोई ईसाई मिशनरी अँग्रेजी मे बोलता देखे तो जैसे बहुत समझदार लगता है !! करोड़ो वर्ष पुराने आयुर्वेद को गालिया ! और अँग्रेजी ऐलोपैथी को तालिया !!! विदेशी त्योहार वैलंटाइन मनाने पर गर्व !! स्वामी विवेकानद का जन्मदिन याद नहीं !!!! दोस्तो macaulay अपनी चाल मे कामयाब हुआ !! और ये सब उसने कैसे किया !!अगर आपका बच्चा शक्ल से भारतीय और अकल से अंग्रेज़ होता जा रहा है ! तो एक बार जरूर देखे आपको जवाब मिल जाएगा ! Posted 10th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 10 गोमूत्र से चार्ज होगी बैटरी, जलेगा लालटेन रायपुर। छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति ने बैटरी से जलने वाले लालटेन का निर्माण किया है। बैटरी को बिजली से चार्ज करने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। बैटरी में एसिड की जगह गोमूत्र का इस्तेमाल होता है।बैटरी लो होने पर बिजली से चार्ज करने के बजाय गोमूत्र बदलने से ही लालटेन में लगी 12वोल्ट की बैटरी फुल चार्ज हो जाएगी और लालटेन जलने लगेगा। ग्रामीणों के लिए बेहद उपयोगीइस लालटेन और बैटरी को ईजाद किया है कामधेनु पंचगव्य एवं अनुसंधान संस्थान अंजोरा के निदेशक डॉ. पीएल चौधरी ने। बैटरी की गुणवत्ता पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रायपुर ने भी अपनी मुहर लगा दी है। बताया जाता है कि इस बैटरी में500 ग्राम गोमूत्र का उपयोग कर 400 घंटे तक तीन वॉट के एलईडी (लेड) बल्ब से भरपूर रोशनी प्राप्त की जा सकती है। बैटरी बनाने वाले चौधरी के इस मॉडल को प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष भी प्रदर्शित किया गया है। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुएइसे प्रदेश पंचगव्य संस्थान के लिए बड़ी उपलब्धि बताया। डॉ. चौधरी बताते हैं कि इस लालटेन में बैटरी के भीतर डाले जाने वाली एसिड की जगह गोमूत्र डाला गया। इसमें किसीभी प्रकार का कोई केमिकल नहीं मिलाया गया है, न ही बैटरी में कोई बदलाव किया गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि बैटरी सिर्फ देसी गाय के गोमूत्र से ही चलेगी। इसे मोटरसाइकिल की पुरानी बैटरी को विकसित कर तैयार किया गया है। लालटेन में जब बल्ब की रोशनी कम होने लगती है तो बैटरी में गोमूत्र को बदलना होता है। यह चमत्कारी प्रयोग है जो जनजातीय या अन्य इलाकों में जहां बिजली की कमी होती है, उन क्षेत्रों में काफी उपयोगी साबित होगा। डॉ. चौधरी ने इस प्रयोग को पेटेंट कराकर अनुसंधान को आगेजारी रखने की बात कही। इसके लिए वह खुद अपने स्तर पर लगातार अनुसंधान कर रहे हैं। एनआईटी-रायपुर के कुछ युवा वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग को पर्यावरण मित्र और गैर पंरापरागत साफ- सुथरी ऊर्जा कास्रोत बताते हुए इसे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए काफी उपयोगीबताया है। डॉ.पीएल चौधरी ने बताया कि बैटरी चालित लालटेन बिजली गुलहोने पर इमरजेंसी लाइट की तरह कार्य करेगा। इस बैटरी से मोबाइल को भी चार्ज किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गोमूत्र से चलने वाली बैटरी के उपयोग से बिजली की खपत कम होगी और गोमूत्र का सदुपयोग होगा, जिससे किसानों को पशुपालन के लिए प्रेरणा मिलेगी। यह कमाल केवल देसी नस्ल की गाय के मूत्र ही संभव है। Posted 10th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 10 हजारों साल पहले ऋषियों के आविष्कार, पढ़कर रह जाएंगे हैरान  हजारों साल पहले ऋषियों के आविष्कार, पढ़कर रह जाएंगे हैरान By | Source भास्कर / धर्मडेस्क भारत की धरती को ऋषि, मुनि, सिद्ध और देवताओं की भूमि पुकारा जाता है। यह कई तरह के विलक्षण ज्ञान व चमत्कारों से अटी पड़ी है। सनातन धर्म वेद को मानता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने घोर तप, कर्म, उपासना, संयम के जरिए वेद में छिपे इस गूढ़ ज्ञान व विज्ञान को ही जानकर हजारों साल पहले ही कुदरत से जुड़े कई रहस्य उजागर करने के साथ कई आविष्कार किए व युक्तियां बताईं। ऐसे विलक्षण ज्ञान के आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक होता है। कई ऋषि-मुनियों ने तो वेदों की मंत्र-शक्ति को कठोर योग व तपोबल से साधकर ऐसे अद्भुत कारनामों को अंजाम दिया कि बड़े-बड़े राजवंश व महाबली राजाओं को भी झुकना पड़ा। जानिए ऐसे ही असाधारण या यूं कहें कि प्राचीन वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों द्वारा किए आविष्कार व उनके द्वारा उजागर रहस्यों को जिनसे आप भी अब तक अनजान होंगे – महर्षि दधीचि - महातपोबलि और शिव भक्त ऋषि थे। वे संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्तासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से महर्षि दधीचि बड़े पूजनीय हुए। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि एक बार देवराज इंद्र की सभा में देवगुरु बृहस्पति आए। अहंकार से चूर इंद्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए। बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए। देवताओं ने विश्वरूप को अपना गुरु बनाकर काम चलाना पड़ा, किंतु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे देता था। इंद्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया। विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था। उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया। वृत्रासुर के भय से इंद्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्मादेव ने वृत्तासुर को मारने के लिए वज्र बनाने के लिए देवराज इंद्र को तपोबली महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियां मांगने के लिये भेजा। उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए तीनों लोकों की भलाई के लिए अपनी हड्डियां दान में मांगी। महर्षि दधीचि ने संसार के कल्याण के लिए अपना शरीर दान कर दिया। महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र बना और वृत्रासुर मारा गया। इस तरह एक महान ऋषि के अतुलनीय त्याग से देवराज इंद्र बचे और तीनों लोक सुखी हो गए। आचार्य कणाद - कणाद परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। भास्कराचार्य - आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’। आचार्य चरक - ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर की। भारद्वाज - आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का आविष्कार किया। वहीं हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए। इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का आविष्कारक भी माना जाता है। कण्व - वैदिक कालीन ऋषियों में कण्व का नाम प्रमुख है। इनके आश्रम में ही राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था। माना जाता है कि उसके नाम पर देश का नाम भारत हुआ। सोमयज्ञ परंपरा भी कण्व की देन मानी जाती है। कपिल मुनि - भगवान विष्णु का पांचवां अवतार माने जाते हैं। इनके पिता कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए भगवान विष्णु खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल मुनि 'सांख्य दर्शन' के प्रवर्तक माने जाते हैं। इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती ने खुद अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त आने पर कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही 'सांख्य दर्शन' कहलाता है। इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। इससे जुड़ा प्रसंग है कि भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुआ वहां पहुंचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को शाप देकर भस्म कर दिया। बाद के कालों में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर स्वर्ग से गंगा को जमीन पर उतारा और पूर्वजों को शापमुक्त किया। पतंजलि - आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है। शौनक : वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उन्हें दस हजार शिष्यों वाले गुरुकुल का कुलपति होने का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं ज्यादा थी। महर्षि सुश्रुत - ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है। जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी, हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे। वशिष्ठ : वशिष्ठ ऋषि राजा दशरथ के कुलगुरु थे। दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने इनसे ही शिक्षा पाई। देवप्राणी व मनचाहा वर देने वाली कामधेनु गाय वशिष्ठ ऋषि के पास ही थी। विश्वामित्र : ऋषि बनने से पहले विश्वामित्र क्षत्रिय थे। ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी। ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर दिखाया। महर्षि अगस्त्य - वैदिक मान्यता के मुताबिक मित्र और वरुण देवताओं का दिव्य तेज यज्ञ कलश में मिलने से उसी कलश के बीच से तेजस्वी महर्षि अगस्त्य प्रकट हुए। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी ऋषि थे। उनके तपोबल से जुड़ी पौराणिक कथा है कि एक बार जब समुद्री राक्षसों से प्रताड़ित होकर देवता महर्षि अगस्त्य के पास सहायता के लिए पहुंचे तो महर्षि ने देवताओं के दुःख को दूर करने के लिए समुद्र का सारा जल पी लिया। इससे सारे राक्षसों का अंत हुआ। गर्गमुनि - गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे। बौद्धयन - भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया। http://www.bhaskarhindi.com/News/15490/.html Posted 10th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 10 कार्य क्षमता बढ़ाने का अचूक नुस्खा------ कार्य क्षमता बढ़ाने व कोलॅस्ट्रोल घटाने का अचूक आयुर्वेदिक नुस्खा------ अपनी कार्य क्षमता बढ़ा कर सफल होने, स्फूर्तिवान होने व चर्बी घटा कर तन्दरूस्त होने का यह आजमाया हुआ नुस्खा है। अनेक लोगों ने इसका प्रयोग कर सफलता पाई है। नुस्खा निम्न प्रकार है: मिश्रण: 50 ग्राम मेथी, 20 ग्राम अजवाइन,10 ग्राम काली जीरी बनाने की विधिः---- मेथी, अजवाइन तथा काली जीरी को इस मात्रा में खरीद कर साफ कर लें। प्रत्येक वस्तु को धीमी आंच में तवे के उपर हल्का सेकें। सेकने के बाद प्रत्येक को मिक्सर-ग्राइंडर में पीसकर पावडर बनालें। तीनों के पावडर को मिला कर कांच की शीशी में रख ले .आपकी अमूल्य दवाई तैयार है। दवाई लेने की विधिः------ तैयार दवाई को रात्रि को खाना खाने के बाद सोते समय 1 चम्मच गर्म पानी के साथ लेवें। याद रखें इसे गर्म पानी के साथ ही लेना है। इस दवाई को रोज लेने से शरीर के किसी भी कोने में अनावश्यक चर्बी/ गंदा मैल मल मुत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, तथा शरीर सुन्दर स्वरूपमान बन जाता है। मरीज को दवाई 30 दिन से 90 दिन तक लेनी होगी। लाभः- इस दवाई को लेने से न केवल शरीर मंे अनावश्यक चर्बी दूर हो जाती है बल्किः- - शरीर में रक्त का परिसंचरण तीव्र होता है। ह्नदय रोग से बचाव होता है तथा कोलेस्ट्रोल घटता है। - पुरानी कब्जी से होेने वाले रोग दूर होते है। पाचन शक्ति बढ़ती है। - गठिया बादी हमेशा के लिए समाप्त होती है। - दांत मजबूत बनते है। हडिंया मजबूत होगी। - आँखों का तेज बढ़ता है . - कानों से सम्बन्धित रोग व बहरापन दूर होता है। - शरीर में अनावश्यक कफ नहीं बनता है। - कार्य क्षमता बढ़ती है, शरीर स्फूर्तिवान बनता है। घोड़े के समान तीव्र चाल बनती है। - चर्म रोग दूर होते है, शरीर की त्वचा की सलवटें दूर होती है, लालिमा लिये शरीर क्रांति-ओज मय बनता है। - स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा आयु भी बढ़ती है, यौवन चिरकाल तक बना रहता है। - पहले ली गई एलोपेथिक दवाईयां के साइड इफेक्ट को कम करती है। - इस दवा को लेने से शुगर (डायबिटिज) नियंत्रित रहती है। - बालों की वृद्धि तेजी से होती है। - शरीर सुडौल, रोग मुक्त बनता है।  योग करने से दवाई का जल्दी लाभ होता है। परहेजः- ------ - इस दवाई को लेने के बाद रात्रि में कोई दूसरी खाद्य-सामग्री नहीं खाएं। - यदि कोई व्यक्ति धुम्रपान करता है, तम्बाकू-गुटखा खाता या मांसाहार करता है तो उसे यह चीजे छोड़ने पर ही दवा फायदा पहुचाएंगी। - शाम का भोजन करने के कम-से-कम दो घण्टे बाद दवाई लें। Posted 10th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 10 छाछ से चमत्कारी फायदे ____________________________________________________ गर्मियों में दूध से बने पदार्थ को शरीर के लिए बहुत अधिक लाभदायक माना गया है। इसीलिए इन दिनों दही,पनीर, मट्टा व छाछ का भरपूर उपयोग किया जाता है। दही, पनीर, मठ्ठा, आदि तो उपयोगी हैं ही लेकिन उनसे भी ज्यादा लाभदायक छाछ है। गर्मियों मे रोजाना छाछ का सेवन अमृत के समान है। इससे चेहरा चमकने लगता है। खाने के साथ छाछ पीने से जोड़ों के दर्द से भी राहत मिलती है।छाछ कैल्शियम से भरी होती है। इसका रोजाना सेवन करने वाले को कभी भी पाचन सबंधी समस्याएं प्रभावित नहीं करती हैं। खाना खाने के बाद पेट भारी हो जाना अरूचि आदि दूर करने के लिए गर्मियों में छाछ जरुर पीना चाहिए। रोजाना छाछ पीने के ढेरों फायदे हैं उन्हीं में से कुछ आज हम आपको बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं छाछ पीने के लाभ.... एसिडिटी- गर्मी के कारण अगर दस्त हो रही हो तो बरगद की जटा को पीसकर और छानकर छाछ में मिलाकर पीएं। छाछ में मिश्री, काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर रोजाना पीने से एसिडिटी जड़ से साफ हो जाती है। रोग प्रतिरोधकता बढाए- इसमें हेल्‍दी बैक्‍टीरिया और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं साथ ही लैक्‍टोस शरीर में आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है, जिससे आप तुरंत ऊर्जावान हो जाते हैं। कब्ज- अगर कब्ज की शिकायत बनी रहती हो तो अजवाइन मिलाकर छाछा पीएं। पेट की सफाई के लिए गर्मियों में पुदीना मिलाकर लस्सी बनाकर पीएं। खाना न पचने की शिकायत- जिन लोगों को खाना ठीक से न पचने की शिकायत होती है। उन्हें रोजाना छाछ में भुने जीरे का चूर्ण, काली मिर्च का चूर्ण और सेंधा नमक का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर धीरे-धीरे पीना चाहिए। इससे पाचक अग्रि तेज हो जाएगी। विटामिन- बटर मिल्‍क में विटामिन सी, ए, ई, के और बी पाये जाते हैं जो कि शरीर के पोषण की जरुरत को पूरा करता है। मिनरल्‍स- यह स्वस्थ पोषक तत्वों जैसे लोहा, जस्ता, फास्फोरस और पोटेशियम से भरा होता है, जो कि शरीर के लिये बहुत ही जरुरी मिनरल माना जाता है।यदि आप डाइट पर हैं तो रोज़ एक गिलास मट्ठा पीना ना भूलें। यह लो कैलोरी और फैट में कम होता है। Posted 10th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 10 •• गौ माता को बचाने के उपाय •• •• गौ माता को बचाने के उपाय •• • जो सरकार अपने घोषणापत्र / अजेंडे मे गौ रक्षा अधिनियम का उल्लेख नहीं करती है उसे वोट न दें और  अगर कोई भी सरकार गौ रक्षा करने मे असमर्थ हो तो उसका बहिष्कार करें आपका अधिकार है आप अगर  किसी पार्टी को देश हित का नहीं समझते उसे वोट नहीं दे सकते है | • जो भी गौ का मांस खाता हो उसका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करें, उसके अनुष्ठानों की वस्तुओं  को न खरीदे, उससे सबंध न रखे, इससे कचरा एक तरफ हो जाएगा | • गाँव मे गौ रक्षक दल बने जो समय समय पर गौ शालाओं मे जाकर निरीक्षण करें और बूचङखानों को  लेकर जा रहे पशुओं की तस्करी को रोके, और हत्यारों को सलाखों तक पाहुचाए | • अगर आप गौ रक्षक दल सदस्य या दल बनाने मे असमर्थ है तो गौ रक्षक दल बनाने मे आर्थिक  सामाजिक रूप से उन्हें प्रोत्साहन दें | • प्राकृतिक खानपान को जीवन शैली बनाए, जंक फूड (जहरीले फूड) से परहेज करे, निरंतर योगाभ्यास  करे और नशामुक्त जीवन जिये, 100% स्वदेशी को अपनाने का संकल्प ले | • हमेशा गौ का ही दूध पिये भेंस का दूध पियोगे तो शरीर मे मलिन बुद्धि का प्रवेश करना स्वाभाविक है | • जर्सी गायों के दूध और डेरी पदार्थो का प्रयोग बंद करें ये जर्सी गाये सूअर और विदेशी गायों के संकरण से  पैदा की गई है,इन्ही जर्सी गायों का जो दूध पिता है उसकी बुद्धि का अनवेक्षन करे, ज्ञात हो जाएगा | • पंचगव्य से बने उत्पादों का उपयोग करे (गोअर्क, साबुन, उबटन, शैम्पू, हेयर ओइल, दंतमंजन,  धूपबत्ती, फिनाइल, अगरबत्ती, बर्तन पाऊडर आदि सहित जीवन के उपयोग में आने वाली वस्तुएं) | • किसी भी बिमारी में विश्व की सबसे सफल और किफायती पंचगव्य चिकित्सा का लाभ ले और लोगो को  इसके बारे में बताए | • अपने आस पास के लोगो को गौ माता के मनुष्य जीवन पर होने वाली कृपा के बारें मे बताए, जागरूक  करें | • किसानो को खेती के लिये गाय और बैल का महत्व समजाये | • अपने आसपास के कत्लखानों की लिस्ट बना कर रखे और गौ रक्षक दल को सौपे, उनकी मदद करें | • इंटरनेट के माध्यम से युवाओं को गौ माता के प्रति जानकारी देने के लिए प्रेरित करें | • शाकाहार के लिए लोगो को प्रेरित करें और आकड़ों को जुटाएँ, तर्क वितर्क मे भाग लें | • गौ ह्त्या को बढ़ावा देने वाले या तो नहीं रोकने वाले नेताओ की मुंडी जनता के हाथ में रहे ऐसे कुछ  कानूनों की माँग कर के उन्हें लागू करवाये जैसे की पारदर्शी शिकायत/ प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) [TCP] ,  प्रजा आधीन राजा (Right to Recall) कानून |  Posted 10th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 अंडा शाकाहार का पर्याय आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है  ,ब्राह्मणों से लेकर जैनियों तक सभी ने खुल्लमखुल्ला अंडा खाना शुरू  कर दिया है ...खैर मै ज्यादा भूमिका और प्रकथन में न जाता हुआ सीधे तथ्य पर आ रहा हूँ मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप  में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार  दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ चूल्हा रसोईघर  आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को  छूना भी वर्जित है कई परिवारों में ...शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की  अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता  रहता है .. इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर  रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा  सूख जाएगा , अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर १) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में  ना हो कर ठोस (अण्डे) के रूप में बाहर आता है , २) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से  भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है ३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित  ड्रग ओक्सिटोसिन(oxytocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे  के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित (unfertilized) अण्डे देती है ४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे है  जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ की कमी (oligozoospermia,  azoospermia) , नपुंसकता और स्तनों का उगना (gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन  आदि ... वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व , (PCO poly cystic oveary) गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो  रहे है ५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है . ६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७० % कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य  कारण है 7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध , अप्राकृतिक , और अपवित्र और  चंडाल कर्म है इसकी जगह पर आप दूध पीजिए जो के पोषक , पवित्र और शास्त्र सम्मत भी है नरेश आर्य (Notes) प्रस्तुति:- नीरज कौशिक Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 ।। गौसेवा से बदला भाग्य ।। ।। गौसेवा से बदला भाग्य ।। गीताप्रेस गोरखपुर की 'कल्याण पत्रिका में छपी यह एक किसान के जीवन की सत्य घटना है। उसने लिखा है –  मेरे पूर्वज गाँव में सदा सम्पन्न रहे। मेरे पिता जी का जीवन भी उन्नत रहा। उनकी ईश्वर उपासना और गौ सेवा में विशेष रूचि थी। इससे घर में खूब सम्पन्नता थी। पिता जी के बाद गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी मुझ पर आ गयी किंतु मैं न तो गायों की देखभाल करता और न ही ईश्वर के लिए समय निकालता। खेती से अन्न कम होने लगा और अधिकांश जमीन परती पड़ गयी। पैसे आने बंद हो गये। देखते देखते सारा काम चौपट हो गया। भाग्य ने जैसे मेरा साथ ही छोड़ दिया था। मैं जिस कार्य में हाथ डालता, उसमें असफल होता। मेरे दोनों भाई भी अपना अपना हिस्सा लेकर अलग हो गये। मेरे ऊपर काफी कर्ज हो गया। लोग मुझे निरूद्यमी और आलसी कहने लगे। मेरे लिए दर-दर की ठोकरें खाने की नौबत आ गयी। एक रात मैंने सपने में देखा कि गाय बैल मुझे मारने दौड़ रहे हैं और मनुष्य की भाषा में कह रहे हैं कि "अभी तुझे हमारी और भी आह झेलनी पड़ेगी। तूने अपने खाने पीने के सिवा कभी हमारी भी खबर ली है कि हम भूखे हैं या प्यासे ? गौशाला में कभी आकर देखा है कि वह साफ है या हम गोबर मूत्र में पड़े हैं ? इसी पाप का फल तू भोग रहा है। अब भी चेत जा और अपना मार्ग बदल दे नहीं तो अंततः तेरा सर्वनाश हो जायेगा।" मैं चौंककर जाग उठा। देखा, यह तो स्वप्न था। रात्रि बीतने वाली थी पर उसके पहले मेरे जीवन की रात्रि बीत गयी। मैं उसी समय लालटेन लेकर गौशाला में गया। वहाँ देखा, सभी गाय-बैल भूखे-प्यासे खूँटे से बँधे हैं। उनके आगे घास भूसे का एक तिनका भी नहीं था। कूड़े का ढेर लगा था। मैं मन ही मन पश्चाताप करने लगा। मैंने उसी क्षण गौशाला को साफ करना शुरू किया और दिन के दस बजे तक लगा रहा। उस दिन से मैं गौशाला पर ध्यान रखने लगा। सुबह शाम गौदुग्ध अपने हाथ से दुहना और चारा घास एवं स्वच्छ जल अपने सामने डलवाना मेरा मुख्य कर्तव्य हो गया। कूड़ा करकट अलग गड्ढे में डालता और उसकी अच्छी खाद बनती। गाय बैल सुखपूर्वक रहने लगे और स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट हो गये। घी-दूध पर्याप्त मिलने लगा। मेरी कृषि चमक उठी और अनाज पाँच-छः गुना उत्पन्न होने लगा। ऋण भी अधिकांश चुका दिया। मेरी स्थिति में काफी परिवर्तन हो गया। मुझे निरूद्यमी, आलसी और अभागा कहने वाले लोग अब प्रशंसा करने लगे। यह घटना बिल्कुल सच्ची है। रईसी के चक्कर में मैं अपनी सम्पत्ति का नाश कर चुका था, किंतु ईश्वर की कृपा, गौमाता की सेवा और उनके आशीर्वाद से मेरी दशा अत्यन्त सुंदर हो गयी। यदि कोई कृषक भाई मेरी तरह दरिद्रता के शिकार हो गये हों तो उन्हें मेरे पथ का अनुसरण करना चाहिए। मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि भगवान पर विश्वास और गौमाता की सेवा से बुरी से बुरी हालत बदलकर अच्छी हो जायेगी। गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः। तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभनाम्।। जो पुरुष गौओं की सेवा करता है और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, उस पर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान करती हैं। महाभारत में भी आता हैः गावः कामदुहो देव्यो। गौएँ समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवियाँ हैं। महाभारत, अनु. पर्व-दानधर्म पर्वः 51.33 स्रोतः लोक कल्याण सेतु, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 13,16 अंक 159 Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 अंग्रेज़ो के जाने बाद भी संसद मे गौ ह्त्या का बिल पास क्यूँ नहीं हुआ ???? अंग्रेज़ो के जाने बाद भी संसद मे गौ ह्त्या का बिल पास क्यूँ नहीं हुआ ???? किस किस ने टांग आड़ाई ???? जरूर पढ़े ! भारत मे गाय काटने का इतिहास ! ____________________ इस देश में मुगल सीधा गाय का कत्ल करते थे ! और कई बार हमारे राजा मुगलो का इसी बात पर वध करते थे ! जैसे शिवाजी ने गौ माता को बचाने के लिए एक मुगल राजा की बाजू काट दी थी !! लेकिन उन्होने कोई कत्लखाना नहीं खोला !! जो मित्र पूरी post नहीं पढ़ सकते तो यहाँ click करे ! http://www.youtube.com/watch?v=gPG4wgFdpw0 पर जब अंग्रेज़ आए ये बहुत चालक थे ! किसी भी गलत काम को करने से पहले उसको कानून बना देते थे फिर करते थे और कहते थे हम तो कानून का पालन कर रहे हैं !! भारत मे पहला गौ का कत्लखाना 1707 ईस्वी ने रॉबर्ट क्लाएव ने खोला था और उसमे रोज की 32 से 35 हजार गाय काटी जाती थी ! तो कत्लखाने के size का अंदाजा लगा सकते हैं ! और तब हाथ से गाय काटी जाती थे ! तो सोच सकते हैं कितने कसाई उन्होने रखे होंगे ! ___________ आजादी के 5 साल बाद 1952 मे पहली बार संसद मे ये बात उठी कि गौ रक्षा होनी चाहिए ! गाय के सभी कत्लखाने जो भारत मे अंग्रेज़ो ने शुरू किए थे बंद होने चाहिए ! और यही गांधी जी कि आत्मा को यही श्र्द्धांजलि होगी ! क्यूकि ये उनके आजाद भारत के सपनों मे से पहले नंबर पर था ! तो गांधी के परम शिष्य नेहरू खड़ा हुआ और बोला चलो ठीक है अगर गौ रक्षा का कानून बनना चाहिए तो इस पर संसद मे प्रस्ताव आना चाहिए ! तो संसद मे एक सांसद हुआ करते थे महावीर त्यागी वो आर्य समाजी थे और सोनीपत से अकेले चुनाव लड़ा करते थे !सबसे पहला चुनाव 1952 मे हुआ और वो बहुत भयंकर वोटो से जीत कर आए थे ! तो महावीर त्यागी ने कहा ठीक मैं अपने नाम से प्रस्ताव लाता हूँ ! तो प्रस्ताव आया उस पर बहस हुई ! बहस के बाद तय किया कि वोट किया जाय इस पर ! तो वोट करने का दिन आया ! तब पंडित नेहरू ने एक ब्यान दिया !जो लोकसभा के रेकॉर्ड मे है आप चाहे तो पढ़ सकते हैं ! नेहरू ने कहा अगर ये प्रस्ताव पारित हुआ तो मैं शाम को इस्तीफा दे दूंगा ! मतलब ?? गौ रक्षा अगर हो गई इस देश मे! तो मैं प्रधानमंत्री नहीं रहूँगा ! प्रणाम क्या हुआ जो कांग्रेसी नेता संसद मे गौ रक्षा के लिए वोट डालने को तैयार हुए थे नेहरू का ये वाक्य सुनते ही सब पलट गए ! तो उस जमाने मे क्या होता था कि नेहरू जी अगर पद छोड़ दे तो क्या होगा ?? क्यूंकि वल्ब भाई पटेल का स्वर्गवास हो चुका था ! तो कांग्रेसी नेताओ मे चिंता रहती थी कि अगर नेहरू जी भी चलेगे फिर पार्टी का क्या होगा और पता नही अगली बार जीतेंगे या नहीं जीतेंगे ! और उस समय ऐसी बात चलती थी nehru is india india is नेहरू !(और ये कोंग्रेसीओ कि आदत है indra is india india is indra ) तो बाकी कोंग्रेसी पलट गए और संसद मे हगामा कर दिया और गौ रक्षा के कानून पर वोट नहीं हुआ ! और अगले दिन महावीर त्यागी को सब ने मजबूर कर दिया और उनको प्रस्ताव वापिस लेना पड़ा ! महावीर त्यागी ने प्रस्ताव वापिस लेते समय भाषण किया और बहुत ही जबर्दस्त भाषण किया ! उन्होने कहा पंडित नेहरू मैं तुमको याद दिलाता हूँ !कि आप गांधी जी के परम शिष्य है और गांधी जी ने कहा था भारत आजाद होने के बाद जब पहली सरकार बनेगी तो पहला कानून गौ रक्षा का बनेगा ! अब आप ही इस से हट रहे है तो हम कैसे माने कि आप गांधी जी के परम शिष्य है ??? और उन्होने कहा मैं आपको आपके पुराने भाषणो कि याद दिलाता हूँ ! जो आपने कई बार अलग अलग जगह पर दिये है ! और सबमे एक ही बात काही है कि मुझे कत्लखानों से घिन्न आते इन सबको तो एक मिनट मे बंद करना चाहिए ! मेरी आत्मा घबराती है ये आपने कितनी बार कहा लेकिन जब कानून बनाने का समय आया तब आप ही अपनी बात से पलट रहे है ?! नेहरू ने इन सब बातों को कोई जवाब नहीं दिया ! और चुप बैठा रहा !और बात आई गई हो गई ! फिर एक दिन 1956 मे नेहरू ने सभी मुख्य मंत्रियो को एक चिठी लिखी वो भी संसद के रेकॉर्ड मे है ! अब नेहरू का कौन सा स्वरूप सही था और कौन सा गलत ! ये तय करने का समय आ गया हैं ! जब वे गांधी जी के साथ मंचपर होते थे तब भाषण करते थे कि क्त्ल्खनों के आगे से गुजरता हूँ तो घिन्न आती है आत्मा चीखती है ! ये सभी क्त्ल्खने जल्द बंद होने चाहिए !और जब वे प्र्धानमतरी बनते है तो मुख्य मंत्रियो को चिठी लिखते हैं ! कि गाय का कत्ल बंद मत करो क्यूंकी इससे विदेशी मुद्रा मिलती है ! उस पत्र का अंतिम वाक्य बहुत खतरनाक था उसमे नेहरू लिख रहा है मान लो हमने गाय ह्त्याबंद करवा दी ! और गौ रक्षा होने लगी तो सारी दुनिया हम पर हसे गई कि हम भारत को 18 व शताब्दी मे ले जा रहे हैं ! ! अर्थात नेहरू को ये लगता था कि गाय का कत्ल होने से देश 21 वी शताब्दी मे जा रहा है ! और गौ रक्षा होने से 18 वी शताब्दी कि और जाएगा ! राजीव भाई का हरद्य इस पत्र को पढ़ कर बहुत दुखी हुआ !राजीव भाई के एक बहुत अच्छे मित्र थे उनका नाम था रवि राय लोकसभा के अधक्षय रह चुके थे !उनकी मदद से ये पत्र मिला ! संसद कि लाएब्रेरी मे से ! और उसकी फोटो कॉपी रख ली !! ____________ तो राजीव भाई ने ये जानने कि कोशिश की आखिर नेहरू जी के जीवन की ऐसे कौन से बात थी जो वो गौ ह्त्या को चालू रखना चाहते थे ! क्यूंकि पत्र मे नेहरू लिखता है कि विदेशी मुद्रा मिलती है तो क्या विदेशी मुद्रा ही एक प्र्शन था या इससे भी कुछ आगे था ! राजीव भाई कहते है कि मेरा ये व्यक्तिगत मानना है ये गलत भी हो सकता है ! वो कहते है कि इंसान अपनी public life (सार्वजनिक जीवन) मे जो करता है ! उसकी जड़े उसकी जड़े उसकी private life मे जरूर होती है ! वो भारत का प्र्धानमतरी हो,राष्ट्रपति हो देश के किसी सेवधानिक पद आर बैठा हुआ हो या कोई आम इंसान हो ! या कोई किसान कोई भी व्यक्ति हो अपनी public life (सार्वजनिक जीवन) मे जो करते है ! उसकी जड़े उसकी जड़े उसकी private life मे जरूर होती है ! मतलब नेहरू कि private life मे क्या था जो वो गाय कि ह्त्या के लिए इतने परेशान थे ! और इसके लिए राजीव भाई ने बहुत प्र्यास किया और नेहरू की नीजी जीवन के private life के बहुत दस्तावेज़ इकठे किए !! कम से कम 500 से ज्यादा उनके पास थे ! तो पता चला नेहरू खुद गाय का मांस खाता था ! राजीव भाई कहते है इससे पहले मुझे इतना तो मालूम था कि नेहरू जी शराब पीते हैं ! और सिगरेट भी पीते है और chain smoker है दिन मे 60 से 70 सिगरेट पी जाते हैं !और भी बहुत कुछ मालूम था उनके चरित्र के बारे मे ! पर ये पहली बार पता चला कि वो गाय का मांस भी खाते हैं ! और उनके लिए गाय मांस के भोजन को बनाकर तेयार करके उनको lunch के रूप मे भेजने का काम दिल्ली का वही होटल करता था जहां अमेरिका का प्रधानमंत्री जार्ज बुश अंतिम बार 2006 मे आया था और वहाँ रुका था ! और नेहरू का एक दिन का खर्चा उस जमाने मे 13 हजार रुपए होता था जिस पर भारत के एक समाजवादी नेता ने बड़ी कडक टिपणी की थी राम मनोहर लोहिया ने ! उन्होने संसद मे एक दिन बहुत जोड़दार भाषण दिया था !कि नेहरू तुम्हारा एक समय के भोजन का खर्च 13 हजार रुपए है और भारत के 14 करोड़ लोगो को खाने के लिए 2 समय की रोटी नहीं है !तुमको शर्म नहीं आती उस समय के जमाने मे लोहिया जी एक व्यक्ति थे जो नेहरू जी को इस तरह से बोल पाते थे बाकी सब नेहरू के आगे पीछे ही घूमते थे ! जब ये दस्तावेज़ मिल गए तो ये बात समझ आती है कि नेहरू के मन मे गाय के लिए प्रेम सिर्फ एक दिखावा था गांधी जी को खुश करने के लिए था और भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए था एक बार प्र्धानमतरी बन अब तो कोई कष्ट नहीं है को रोकने वाला नहीं तो टोकने वाला नहीं और सरदार पटेल कि मृतयु के बाद तो कोई नहीं ! और राजीव भाई कहते है ये जो जितनी बाते मैंने आपको नेहरू के बारे मे कही है सब कि सब लोकसभा के रिकॉर्ड मे है और कभी इतिहास लिखा जाये तो ये सब का सब सामने आए जाये ! और पूरे देश को नेहरू का काला चिठा पता चल जाये !! _________________________________ अब आगे कि बात करे नेहरू के बाद से आजतक गाय ह्त्या रोकने का बिल पास क्यूँ नहीं हुआ !??? दस्तावेज़ बताते हैं इसके बाद के दो ऐसे प्रधानमंत्री हुए जिनहोने पूरी ईमानदारी से गौ ह्त्या रोकने का कानून लाने की कोशिश की ! उनमे से एक का नाम था श्री लाल बहादुर शास्त्री और दूसरे श्री मुरार जी देसाई !! श्री मुरार जी भाई ये कानून पास करवा पाते कि उनकी सरकार गिर गई ! या दूसरे शब्दो मे कहे सरकार गिरा दी गई ! क्योंकि वही एक मात्र ऐसे प्रधान मंत्री थे ! जिनहोने बहुत हिम्मत वाला काम किया था अमेरिका कि कंपनी coca cola को 3 दिन का नोटिस दिया और भारत से भागा दिया ! और ऐसा नोटिस केवल coco cola को नहीं बल्कि एक और बड़ी विदेशी कंपनी hul(hindustaan uniliver ) को भी दिया और ऐसे करते करते काफी विदेशी कंपनियो को नोटिस जारी किया कि जल्दी से जल्दी तुम भारत छोड़ दो ! इसके इलवा उन्होने एक और बढ़िया काम किया था गुजरात मे शराब पर प्रतिबंध लगा दिया ! और वो आजतक है वो बात अलग है कि black मे कहीं शराब मिल जाती है पर कानूनी रूप से प्रतिबंध है ! और उनहोने कहा था ऐसा मैं पूरा भारत मे करूंगा और जल्दी से गौ रक्षा का कानून भी लाऊँगा और गौ ह्त्या करने वाले को कम से कम फांसी कि सजा होगी ! तो देश मे शराब बेचने वाले,गौ ह्त्या करने वाले और विदेशी कंपनिया वाले ! ये तीनों l lobby सरकार के खिलाफ थी इन तीनों ने मिल कर कोई शयद्त्र रचा होगा जिससे मुरार जी भाई की सरकार गिर गई !! लालबहादुर शास्त्री जी ने भी एक बार गौ ह्त्या का कानून बनाना चाहा पर वो ताशबंद गए ! और फिर कभी जीवित वापिस नहीं लोटे !! और अंत 2003 मे श्री अटल बिहारी वाजपायी की NDA सरकार ने गौ ह्त्या पर सुबह संसद मे बिल पेश किया और शाम को वापिस ले लिया !! क्यू ?? अटल जी की सरकार को उस समय दो पार्टिया समर्थन कर रही थी एक थी तेलगु देशम और दूसरी त्रिमूल कॉंग्रेस ! दोनों ने लोकसभा मे कहा अगर गौ ह्त्या पर कानून पास हुआ तो समर्थन वापिस !! बाहर मीडिया वालों ने ममता बेनर्जी से पूछा की आप गौ ह्त्या क्यूँ नहीं बंद होने देना चाहती ??? ममता बेनर्जी ने कहा गाय का मांस खाना मे मौलिक अधिकार है कोई कैसे रोक सकता है ?? तो किसी ने कहा आप तो ब्राह्मण है तो ममता ने कहा बेशक हूँ !! तो अंत वाजपाई जी को अपनी सरकार बचाना गौ ह्त्या रोकने से ज्यादा बड़ा लगा ! और उन्होने बिल वापिस ले लिया ! इसके बाद राजीव भाई ने अटल जी को एक चिठी लिखी ! और कहा अटल जी काश आपने गौ ह्त्या रोकने के मुद्दे पर अपनी सरकार गिरा ली होती ! तो मैं गारंटी के साथ कहता हूँ अगली बार आप पूर्ण बहुमत से जीतकर आते !! क्यूँ कि गौ ह्त्या को रोकने का मामला इस देश 80 करोड़ लोगो के दिल से जुड़ा है ! और वो आपको दुबारा जीतवाते ! अगर गौ ह्त्या रोकने के लिए आपने सरकार गिरा ली होती !! तो खैर अटल जी शायद उस वक्त इतने दूरदर्शी नहीं थे !! फिर 2003 के बाद कॉंग्रेस आ गई ! इससे तो वैसे कोई अपेक्षा नहीं कि जा सकती ! गाय ह्त्या रोकना तो दूर लूटेरे मनमोहन ने भारत को दुनिया मे गाय का मांस निर्यात करने वाले देशो कि सूची मे तीसरे नंबर पर ला दिया है !! अब आपको तय करना है की हम सब गौ ह्त्या रोकने का बिल संसद मे कैसे पास करवाएँगे !! आपने पूरी post पढ़ी बहुत बहुत धन्यवाद यहाँ जरूर जरूर click करे ! http://www.youtube.com/watch?v=gPG4wgFdpw0 Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 1 View comments JUN 9 चरागाहों का नाश कर दिया इंग्लैंड हरेक पशु के लिए औसतन 3.5 एकड़ जमीन चरने के लिए अलग रखता है। जर्मनी 8 एकड़, जापान 6.7 एकड़ और अमेरिका हर पशु के लिए औसतन 12 एकड़ जमीन चरनी के लिए अलग रखता है। इसकी तुलना में भारत में एक पशु के लिए चराऊ जमीन 1920 में 0.78 एकड़ अर्थातअंदाजन पौने एकड़ थी। (Agricultural Statistics of India, 1920/21, Vol.1, Table 1, 2 – 5) अब यह संख्या घटकर प्रति पशु 0.09 एकड़ हो गई है। अर्थात अमेरिका में 12 एकड़ पर 1 पशु चरता है, जबकि अपने यहां एक एकड़ पर 11 पशु चरते हैं (India 1947, Page 172-187)। सिर्फ एक ही साल में अपने यहां साढे सात लाख एकड़ जमीन पर के चरागाहों का नाश कर दिया गया। 1968 में चराऊ जमीने 3 करोड़ 32 लाख 50 हजार एकड़ जमीन पर थी, जो 1969 में घटकर 3 करोड़ 25 लाख एकड़ हो गई। (India 1947, page 172) और पांच सालों में अर्थात 1974 में वे और अढ़ाई लाख एकड़ कम होकर 3 करोड़ 22 लाख 50 हजार एकड़ हो गई। इस तरह सिर्फ छह सालों में 10 लाख एकड़ चराऊ जमीनों का नाश किया गया। फिर भी किसानों का विकास करने की बढ़ाई हांकने वाले, गरीबों को रोजी दिलाने का वादा करने वाले, विशेषकर किसानों, पशुपालकों व गांव के कारीगरों के वोट से चुनाव जीतने वाले किसी भी विधानसभा या लोकसभा के सदस्य ने उसका न तो विरोध किया है, न ही उसके प्रति चिन्ता व्यक्त की है। Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 गोबर गोबर का पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण भाग है । गोबर के जलन से वातावरण का तापमान संतुलित होता है और वायु के कीटाणुओं का नाश । गोबर में विष, विकिरण और उष्मा के प्रतिरोध की क्षमता होती है । जब हम दीवारों पर गोबर पोतते हैं और फर्श को गोबर से साफ करते हैं तो रहनेवालों की रक्षा होती है । १९८४ में भोपाल में गैस लीक से २०,००० से अधिक लोग मरे । गोबर पुती दीवारों वाले घरों में रहने वालों पर असर नहीं हुआ । रूस और भारत के आणविक शक्ति केंद्रों में विकीरण के बचाव हेतु आज भी गोबर प्रयुक्त होता है । गोबर से अफ्रीकी मरूभूमि को उपजाऊ बनाया गया । गोबर के प्रयोग द्वारा हम पानी में तेजाब की मात्रा घटा सकते हैं । जब हम संस्कार कर्मों में घी का प्रयोग करते है तो ओजोन की परत मजबूत होती है और पृथ्वी हानिकारक सौर विकिरण से बचती है । बढ़ते हुए कल्लगाहों और भूकंपों के बीच का संबंध प्रमाणित होता जा रहा है । Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 पंचगव्य से स्वास्थ्य लाभ : दूध : चरक संहिता के अनुसार दूध सर्वश्रेष्ठ जीवन शक्तिदाता है । दूध में पाये जाने वाला केसिन प्रोटीन शिशुओं की वृद्धि में सहायता करता है, चूना (कैल्शियम) और गंधक (सल्फर) हमारी अस्थियों को मजबूत बनाते हैं । दूध विटमिन-डी और बी-कांपलेक्स से भरपूर होता है । दही : पेचिश रोकता है, मोटापे का नियंत्रण करता है और कैंसर प्रतिरोधक है । घी : बुद्धि और सौंदर्य को बढ़ाता है । नेत्र रोगों में उपयोगी होता है । गोमूत्र अर्क : फ्लू, गठिया (अर्थराइटिस), जीवाणु जनित रोगों, विषाक्त भोजन के दुष्प्रभावों, अपच, एडीमा और कोढ़ के उपचार में लाभदायक है । पंचगव्य मिश्रण : पंचगव्य घृत, अमृतसार, घनवटी, क्षारवटी, नेत्रसार आदि औषधियाँ आयुर्वेद में बहुमूल्य मानी जाती है Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 तुलसी तुलसी न सिर्फ समाज में पूजनीय है, बल्कि इसमें कई औषधीय गुण भी हैं। इसका स्‍वाद भले ही कुछ लोगों को पसंद न आए, लेकिन सेहत के लिए यह बहुत फायदेमंद है। खासतौर पर दिल के लिए इसे अत्‍यंत उपयोगी माना जाता है। तुलसी पित्तनाशक, वातनाशक, कुष्ठरोग निवारक, पसली में दर्द, खून में विकार, कफ और फोड़े-फुन्सियों के उपचार में रामबाण की तरह फायदा करती है। कड़वी और तीखी तुलसी सांस, कफ और हिचकी को तुरन्त मिटा देती है। उल्‍टी होने, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विषनाशक तथा मानसिक पीड़ा को मिटाने में बड़ी कारगर सिद्ध होती है। तुलसी की महत्ता के साक्ष्‍य बारे में कई ऐतिहासिक पुस्‍तकों में वर्णन मिलता है। इसका प्रयोग वैद्यों द्वारा बहुत पहले से होता आया है। मंदिरों में पूजा-अर्चना के पश्चात् गंगाजल में तुलसी के पत्तों को डालकर प्रसाद वितरण किया जाता है। इन सब प्रयोगों के पीछे एक ही संकेत है कि लोग तुलसी का प्रयोग अपनी दैनिक जीवनचर्या में निरन्तर करें तो कई बीमारियों से फायदा होगा। जहां पर तुलसी के पौधे का आरोपण होगा वहां की वायु भी शुद्ध होगी और विषैले कीटाणु भी प्रभावहीन हो जाते है। यूनानी चिकित्सकों के मतानुसार तुलसी के सेवन से रोगाणु नष्ट होने लगते है। यह एक प्रकार की हृदय में शक्ति भर देने की महाऔषधि है। वायु को परिशोधित करने की शक्ति रखती है। उनकी दृष्टि में इस पौधे में अनेकों तरह के औषधीय गुण विद्यमान रहते है। एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली में तो इसे सद्गुण सम्पन्न बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तुलसी में मलेरिया रोग को भगाने की शक्ति विद्यमान है। सर्दी, खांसी, निमोनिया को नष्ट कर देती है। स्वास्थ्य-संवर्धन की दृष्टि से तुलसी की गंध को अत्यधिक उपयोगी माना जाता है। इसकी पीली पत्तियों में हरे रंग के एक तैलीय पदार्थ की सत्ता समाहित है। हवा में इस औषधि के मिलने से कई कीटाणु समाप्‍त होते हैं। रात्रि को सोते समय यदि तुलसी को कपूर को हाथ-पैरों पर मालिश कर लिया जाए तो मच्छर पास नहीं आयेंगे। पानी में तुलसी डालकर प्रयोग करने से कई बीमारियां समाप्‍त होती हैं। तुलसी की पत्तियों को मिलकार जल नित्य प्रति सेवन करने से मुखमण्डल का तेज निखर कर आता है। तुलसी का प्रयोग करने से स्मरणशक्ति बढ़ती है। तुलसी में एक विशेष प्रकार का एसिड पाया जाता है जो दुर्गन्ध को भगाता है। भोजन के पश्चात तुलसी की दो-चार पत्तिया चबा लेने से मुंह से दुर्गंध नही आती है। दमा अथवा तपैदिक के रोगी को तुलसी की लकड़ी अपने पास सदैव रखनी चाहिए। तुलसी की माला पहनने संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा कम होता है। तुलसी विश्व प्रसिद्ध औषधि है और उच्चतम कोटि का रसायन है। तुलसी के प्रयोग से शरीर के सफेद दाग मिटते और सुन्दरता बढ़ती है। क्योंकि इसमें रक्त शोधन क्षमता विद्यमान है। नींबू के रस में तुलसी की पत्तियों का रस मिलाकर चेहरे पर लगाया जाये तो चर्मरोग मिटता है और चेहरा खिलता है। तुलसी की पत्तियों को सुखाकर उसमें दालचीनी, तेजपत्र, सौंफ, बड़ी इलायची, अगियाघास, बनफशा, लाल चंदन और ब्राह्मी को मिलायें और कूट डालें। उसपाउडर को किसी कांच के बर्तन में रख लें। चाय के स्थान पर इसका प्रयोग करने से चाय की हानियों से भी बचेंगे और स्वस्थ भी रहेंगे। Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 9 मिट्टी का कुकर हम लोग खाना इसलिए खाते हे ताकि हमारे शरीर को जरुरी प्रमाण में पोषक तत्त्व मिले। अगर आप लोग एलुमिनियम के प्रेसर कूकर में खाना बनाते हो तो 87% पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते है,सिर्फ 13% ही बचते है। अगर पीतल के बरतन में बनाये तो 7% पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते है, 93% बचते है। "अगर कासे के बरतन में बनाये तो 3% पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते है, 97% बचते है।" अगर आप मिटटी के बरतन में खाना बनाये तो 100% पोषक तत्त्व बचते है। और अगर आपने एक बार मिटटी के बरतन का खाना खा लिया तो उसका जो स्वाद है वो आप जिन्दगी भर नहीं भुलेंगे। Posted 9th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 8 गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम का कड़ाई से पालन कर गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम का कड़ाई से पालन कर नियमों के अनुसार हो पशुओं का परिवहन katni म.प्र. में गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के अंतर्गत गौवंश के वध पर पूर्णत: प्रतिबंध है। इसके बाद भी जिले में हत्या के उद्देश्य से अवैध रूप से गौवंश के परिवहन की घटनायें लगातार हो रही है। जिसके कारण जिले में कानून व्यवस्था की स्थिति निर्मित होती है और जनता में आक्रोश भी बढ़ता है।   कोई भी व्यक्ति जिसमें परिवाहक भी शमिल है, जो एक राज्य से अन्य राज्य को म.प्र. होते हुए गौवंश का किसी भी माध्यम से परिवहन करना चाहता है, निर्धारित प्रारूप में प्रत्येक पशु के लिए अलग-अलग स्वास्थ्य प्रमाण पत्र पशु चिकित्सक से प्राप्त कर निर्धारित प्रारूप में परिवहन अनुज्ञा के लिए 100 रु. प्रति फेरा के शुल्क के साथ अनुविभागीय अधिकारी राजस्व को आवेदन प्रस्तुत करेगा। म.प्र. में गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व को गौवंश परिवहन के लिए अनुज्ञा पत्र जारी करने के लिए सक्षम अधिकारी नियुक्त किया गया है। गौवंश परिवहन के लिए दिये गये आवेदन के ब्यौरे के सत्यापन के लिए अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा जांच के उपरांत समाधान होने पर आवेदन प्राप्ति की तिथि से दो सप्ताह के भीतर गौवंश परिवहन का अनुज्ञा पत्र जारी करेंगें या आवेदन को नामंजूर करने के कारणों को दर्शाते हुए आदेश पारित कर स्वयं के हस्तलेखन में शासकीय रजिस्टर में संबंधित जानकारी प्रविष्ट करेंगें।  अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा जारी अनुज्ञा पत्र के पीछे पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत पशु परिवहन नियम 1978 एवं पशुओं का पैदल परिवहन नियम 2001 एवं अन्य संबंधित नियमों के उपबंधों का उल्लेख किया जायेगा और पशु परिवहन की अनुज्ञा धारक को उसका पालन करना होगा। अनुविभागीय अधिकारी राजस्व अपने क्षेत्राधिकार अंतर्गत आने वाले पशु बाजारों पर पशु चिकित्सक, राजस्व अमले एवं संबंधित नगरपालिका/ग्राम पंचायत के अमले के माध्यम से नियंत्रण करेंगें। अनुविभागीय अधिकारी राजस्व अपने क्षेत्र के प्रत्येक पशु बाजार के लिए नामजद पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ/पशु चिकित्सा विस्तार अधिकारी की डयूटी लगायेंगें। ऐसे पशु चिकित्सा शल्यज्ञ बाजार के दिन बाजार स्थल पर निर्धारित स्थान पर बेठेंगें। पशु चिकित्सा शल्यज्ञ बाजार में क्रय-विक्रय की प्रक्रिया के दौरान या पश्चात परिवहन से पूर्व क्रय किये गये पशुओं का परीक्षण करेंगें एवं वे कृषि कार्य के लिए उपयोगी है या नहीं इसका प्रमाण पत्र निर्धारित प्रारूप में अपने हस्ताक्षर एवं सील सहित जारी करेंगें।  पैदल मार्ग से परिवहन करते समय गौवंश का प्रत्येक झुंड 25 से अधिक का नहीं होगा। यदि परिवहन करने वाला कृषक है तो उसके पास ऋण पुस्तिका एवं पशु बाजार की विक्रय रसीद होना आवश्यक होगा तथा ऋण पुस्तिका में विक्रेता द्वारा संबंधित जानकारी प्रविष्ट की जायेगी। पशु परिवहन करने वाले को पशु चिकित्सक का स्वास्थ्य प्रमाण पत्र भी साथ में अनिवार्य रूप से रखना होगा। संबंध्द कृषक एक समय में 4 से अधिक गौवंश का परिवहन नहीं कर सकेगा। गौवंश का राज्य के भीतर परिवहन पशुओं का परिवहन नियम 1978 एवं पशुओं का पैदल परिवहन नियम 2011 के अंतर्गत किया जायेगा। जिसमें प्रत्येक पशु के लिए निर्धारित प्रारूप में पशु चिकित्सक का स्वास्थ्य प्रमाण पत्र पशु परिवहक के साथ होना अनिवार्य होगा।  Posted 8th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 8 इस पृथ्वी पर गाय के समान कोई धन नहीं है । इस पृथ्वी पर गाय के समान कोई धन नहीं है । गौमाता सर्वदेवमयी है । अथर्ववेद में रुद्रों की माता, वसुओं की दुहिता, आदित्यों की स्वसा और अमृत की नाभि-संज्ञा से विभूषित किया गया है । गौ सेवा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों तत्वों की प्राप्ति सम्भव बताई गई है । भारतीय शास्त्रों के अनुसार गौ में तैतीस कोटि देवताओं का वास है । उसकी पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु और मुख में रुद्र आदि देवताओं का निवास है । इस प्रकार सम्पूर्ण देवी-देवताओं की आराधना केवल गौ माता की सेवा से ही हो जाती है । गौ सेवा भगवत् प्राप्ति के अन्य साधनों में से एक है । जहां भगवान मनुष्यों के इष्टदेव है, वही गौ को भगवान के इष्टदेवी माना है । अत: गौ सेवा से लौकिक लाभ तो मिलतें ही हैं पारलौकिक लाभ की प्राप्ति भी हो जाती है । शास्त्रों में उल्लेख है कि गौ सेवा से मनुष्य को धन, संतान और दीर्घायु प्राप्त होती हैं । गाय जब संतुष्ट होती है तो वह समस्त पाप-तापों को दूर करती है । दान में दिये जाने पर वह अक्षय स्वर्ग लोक को प्राप्त करती है अत: गोधन ही वास्तव में सच्चा धन है । गौ सेवा से ही भगवान श्री कृष्ण को भगवता, महर्षि गौतम, कपिल, च्यवन सौभरि तथा आपस्तम्ब आदि को परम सिद्धि प्राप्त हुई । महाराजा दिलीप को रघु जैसे चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति हुई । गौसेवा से ही अहिंसा धर्म को सिद्ध कर भगवान महावीर एवं गौतम बुद्ध ने अहिंसा धर्म को विश्व में फैलाया । जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर भगवान आदीनाथ को ऋषभ भी कहते हैं जिनका सूचक बैल ;ऋषभ द्ध है । वेद-शास्त्र स्मृतियां, पुराण तथा इतिहास गौ की महिमा से ओत-प्रोत है । और यहां तक की स्वयं वेद गाय को नमन करता है ।  ऋग्वेद में कहा गया है कि जिस स्थान पर गाय सुखपूर्वक निवास करती है वहां की रजत पवित्र हो जाती है । पुरातन काल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में गाय श्रद्धा का पात्र रही है । पुराण काल में एक ऐसी गाय की कल्पना की गई है जो हमारी सभी इच्छाओं  की पूर्ति करती है । इसे कामधेनू कहते हैं । यह स्वर्ग में रहती हैं और जन समाज के कल्याण के लिए मानव लोक में अवतार ले लेती है । भारतीय संस्कृति ही नही अपितु सारे विश्व में गौ का बड़ा सम्मान रहा है । जैसे हम गौ की पूजा करते हैं उसी प्रकार पारसी समाज के लोग सांड़ की पूजा करते हैं । सर्वविदित है कि मिश्र देश के प्राचीन सिक्कों पर बैल की मूर्ति अंकित रहती थी । गौभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है वह सब उसे प्राप्त होती है । स्त्रियों में भी जो गोओं की भक्त है वे मनोवांछित कामनाएं प्राप्त कर लेती है ।पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या । धन चाहने वाले को धन और धर्म चाहने वाले को धर्म प्राप्त होता है । दूध, घी, दही के अतिरिक्त गौ का मूत्र और गोबर भी इतने ही उपयोगी माने गये है । गवा मूत्रपूरीषस्य नोद्विजेत: कदाचन । धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि गौ से ही सम्भव है । गौ रक्षा हिन्दु धर्म का एक प्रधान अंग माना गया है । प्राय: प्रत्येक हिन्दु गौ को माता कहकर पुकारता है और माता समान ही उसका आदर करता है । जिस प्रकार कोई भी पुत्र अपनी माता के प्रति किये गये अत्याचार को सहन नही करेगा उसी प्रकार एक सच्चा हिन्दु गौमाता के प्रति निर्दयता के व्यवहार को सहन नही करेगा । Posted 8th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 8 गौ माता की महिमा गाय से शरीर से जो सात्विक उर्जा निकलती है, उस घर या इलाके में गाय होने से बहुत साड़ी अशुभ चीजें दूर हो जाती हैं l गाय के शरीर में सुर्यकेतु नाड़ी होती है, जो सूर्य किरणों को पीती है, इसलिए गाये के गोबर व मूत्र में भी सात्विक पॉवर होता है l मरते समय भी गाय के गोबर का लीपन करके व्यक्ति को सुलाया जाता है l कैसी भी जहरी दवाएं खायी हो, गौमूत्र थोड़े दिन पिये, Blockage खुल जायेगा और जहरी दवाओं का असर उतर जायेगा l बच्चों को गाय की पूंछ का झाड़ा देने से ऊपर की आई हुई हवा या कुप्रभाव नाश होता है l जिसको रात को ठीक से नींद न आती हो, वो मोर के पंख रख दे, सिरहाने के नीचे और "हरि ॐ" का गुंजन करे , नींद आने लगेगी l जिसको बुरे स्वप्न आते हों वो बुरे स्वप्न न आयें इसका आग्रह छोड़ दें l पैरों को गाय का घी मल दें और सिर में थोड़ा हलकी मालिश कर दें किसी भी तेल की l गाए के दूध से बनी दही शरीर पर रगड़कर स्नान करने से स्वास्थ्य, प्रसन्नता और दरिद्रता दूर हो जाती है l चावल पानी में पका लें फिर गाय के दूध में डालकर खीर बना लें, ज्यादा मीठा और मेवा न डालें और फिर "ॐ" का १२० माला जप करें l ७ सप्ताह तक करें तो ७ जनम की दरिद्रता दूर हो जाती है और ७ जनम तक कुटुंब में दरिद्रता नहीं आती l जिस रोग के लिए डॉक्टर ने मना कर दिया हो की ये रोग ठीक नहीं हो सकता, वो व्यक्ति घर में गाय पालें और चारा-पानी खुद खिलाये और स्नेह करें l गाय की प्रसन्नता उसके रोमकूपों से प्रकट होगी और आप अपने हाथ गाय की पीठ पर घुमाएंगे तो आपके हाथों की उँगलियों द्वारा वो प्रसन्नता, रोग प्रतिकारक शक्ति बढाएगी l २-४ महीने तक ऐसा करें l Listen Audio काली गाय का घी बुढापे में भी जवानी ले आता है l हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाहट खाने की मनाही है तो गाए का घी खाएं, हार्ट मज़बूत बनता है l 11 फरवरी को भीष्मा अष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन गाय दान का महत्व बहुत है। आज के दिन गाय का पूजन करके उनके संरक्षण करने से मनुष्य को पुण्य फल की प्राप्ति होती‍ है। जिस घर में गौ-पालन किया जाता है उस घर के लोग संस्कारी और सुखी होते हैं। इसके अलावा जीवन-मरण से मोक्ष भी गौमाता ही दिलाती है। मरने से पहले गाय की पूँछ छूते हैं ताकि जीवन में किए गए पाप से मुक्ति मिले। लोग पूजा-पाठ करके धन पाने की इच्छा रखते हैं लेकिन भाग्य बदलने वाली तो गौ-माता है। उसके दूध से जीवन मिलता है। रोज पंचगव्य का सेवन करने वाले पर तो जहर का भी असर नहीं होता और वह सभी व्याधियों से मुक्त रहता है। गाय के दूध में वे सारे तत्व मौजूद हैं जो जीवन के लिए जरूरी हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि गाय के दूध में सारे पौष्टिक तत्व मौजूद होते हैं। मीरा जहर पीकर जीवित बच गई क्योंकि वे पंचगव्य का सेवन करती थीं। लेकिन कृष्ण को पाने के लिए आज लोगों में मीरा जैसी भावना नहीं बची। गौ माता की महिमा अपरंपार है। मनुष्य अगर जीवन में गौ माता को स्थान देने का संकल्प कर ले तो वह संकट से बच सकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह गाय को मंदिरों और घरों में स्थान दे, क्योंकि गौमाता मोक्ष दिलाती है। पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है कि गाय की पूँछ छूने मात्र से मुक्ति का मार्ग खुल जाता है। गाय की महिमा को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। मनुष्य अगर गौमाता को महत्व देना सीख ले तो गौ माता उनके दुख दूर कर देती है। गाय हमारे जीवन से जु़ड़ी है। उसके दूध से लेकर मूत्र तक का उपयोग किया जा रहा है। गौमूत्र से बनने वाली दवाएँ बीमारियों को दूर करने के लिए रामबाण मानी जाती है। रोज सुबह गौ दर्शन हो जाए तो समझ लें कि दिन सुधर गया, क्योंकि गौ-दर्शन के बाद और किसी के दर्शन की आवश्यकता नहीं रह जाती। लोग अपने लिए आलीशान इमारतें बना रहे हैं यदि इतना धन कमाने वाले अपनी कमाई का एक हिस्सा भी गौ सेवा और उसकी रक्षा के लिए खर्च करें तो गौमाता उनकी रक्षा करेगी। इसलिए गौ दर्शन सबसे सर्वोत्तम माना जाता है। गाय और ब्राह्मण कभी साथ नहीं छोड़ते हैं लेकिन आज के लोगों ने दोनों का ही साथ छोड़ दिया है। जब पांडव वन जा रहे थे तो उन्होंने भी गाय और ब्राह्मण का साथ माँगा था। समय के बदलते दौर में राम, कृष्ण और परशुराम आते रहे और उन्होंने भी गायों और संतों के उद्धार का काम किया। इसकी बड़ी महिमा सूरदास और तुलसीदास ने गौ कथा का वर्णन किया है। लोग दृश्य देवी की पूजा नहीं करते और अदृश्य देवता की तलाश में भटकते रहते हैं। उनको नहीं मालूम की भविष्य में बड़ी समस्याओं का हल भी गाय से मिलने वाले उत्पादों से मिल सकता है। आने वाले दिनों में संकट के समय गौमाता ही लोगों की रक्षा करेंगी। इस सच्चाई से लोग अनजान हैं। Posted 8th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 8 साईं का समय पूरा हो चूका साईं का समय पूरा हो चूका है,,, दस साल पहले जो षड्यंत्र इस्लामिक संगठनो ने साईं के माध्यम से हिन्दुओ को सेकुलर व् मुर्दा बनाने का शुरू किया था अब वो षड्यंत्र हमारे इस अभियान के कारण जबरदस्त चोट खा चूका है, इस समय मुल्लो को कुछ समझ नहीं आ रहा है की क्या करे, साईं को हिन्दू प्रमाणित करके पीछे के चोर दरवाजे से अल्लाह मालिक और अल्लाह अल्लाह मंदिरों में घुसाया गया, अब उसका पर्दाफास हो चूका है, हिन्दू मंदिरों में राम नाम की जगह जो अल्लाह अल्लाह शुरू हुआ था, अब उसका प्रतिकार होना शुरू हो गया है, लोग समझने लगे है की राम के मंदिरो में अल्लाह अल्लाह शुरू हुआ पर मस्जिदों में राम नाम क्यों नहीं शुरू हुआ,,, मुल्लो की ये सबसे बड़ी रणनीति हमारे इस अभियान से जबरदस्त प्रभावित हुई है, इस्लाम में मूर्ति पूजा को हराम बता कर राम को न पूजने वाले मुल्ले जो साईं को पूज रहे थे अब उनके इस अल तकिया षड्यंत्र को हमने सबके सामने लाकर अधिकतर की आँखे खोलने का प्रयास किया है, साईं के बहाने राम नाम को ख़त्म करने का ये षड्यंत्र अब अपने अंत के आरम्भ की और बढ़ चूका है, आप अभी से निवेदन है, अपने अपने मंदिरों को मस्जिद बनाने से रोके, साईं की मुर्तिया मंदिरों में लगवाने का विरोध करे, अब तो जागरणों में भी इस साईं का भजन का विरोध करने वाले बढ़ रहे है, साईं के नाम पर झूठे मन्त्र और आरतियाँ अब लोगो को हजम नहीं हो रही है, क्या कारण है की साईं को पूजने के लिए झूठ का सहारा लिया गया,, अब साईं का अंत निकट है,,, हर हर महादेव, जय जय श्री राम हिन्दुओ जागो, सेकुलर नहीं सनातनी बनो, Posted 8th June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment JUN 2 गोबर के कंडे से दन्त मंजन का निर्माण गोबर के कंडे से दन्त मंजन का निर्माण कर गौ सेवको में वितरित किया गया ...  इस मंजन के आश्चर्यजनक परिणाम देखे गए  इसमें पंचगव्य-गौ मूत्र दूध,छाछ,घी, गोबर रस, एवम अन्य जड़ी मिलाई गयी है Posted 2nd June 2013 by Vrajraj Gaushala 0 Add a comment 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वेदों का रचना काल:

शुक्रवार, अक्टूबर 13, 2017 Latest: मध्य प्रदेश प्रश्नोत्तरी सेट -1 (for MPPSC and MPPolice ) चंद्रमा से संबंधित 25 महत्वपूर्ण परीक्षापयोगी तथ्य करंट अफेयर्स टुडे – 8 & 9 अगस्त 2017 करंट अफेयर्स टुडे – 6 & 7 अगस्त 2017 मध्य प्रदेश प्रश्नोत्तरी सेट -2 (for MPPSC and MPPolice ) Notesbanao । MPPSC । Vyapam । UPSC। SSC । Railways Exams & Other Competitive Exams। वेदों का रचना काल: ( ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद ) 297 total views, 1 views today 1. ऋग्वेद  ऋग्वेद सनातन धर्म अथवा हिन्दू धर्म का स्रोत है । इसमें 1028 सूक्त हैं, जिनमें देवताओं की स्तुति की गयी है। इस ग्रंथ में देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र हैं। यही सर्वप्रथम वेद है। ऋग्वेद को दुनिया के सभी इतिहासकार हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की सबसे पहली रचना मानते हैं। ये दुनिया के सर्वप्रथम ग्रन्थों में से एक है। ऋक् संहिता में 10 मंडल, बालखिल्य सहित 1028 सूक्त हैं। वेद मंत्रों के समूह को ‘सूक्त’ कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है। ऋग्वेद के सूक्त विविध देवताओं की स्तुति करने वाले भाव भरे गीत हैं। इनमें भक्तिभाव की प्रधानता है। यद्यपि ऋग्वेद में अन्य प्रकार के सूक्त भी हैं, परन्तु देवताओं की स्तुति करने वाले स्रोतों की प्रधानता है। प्रमुख तथ्य ऋग्वेद में नदियों का उल्लेख – ऋग्वेद में 25 नदियों का उल्लेख है, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु नदी है, जिसका वर्णन कई बार आया है। यह सप्त सैन्धव क्षेत्र की पश्चिमी सीमा थी। क्रुमु (कुरुम),गोमती (गोमल), कुभा (काबुल) और सुवास्तु (स्वात) नामक नदियां पश्चिम किनारे में सिन्धु की सहायक नदी थीं। पूर्वी किनारे पर सिन्धु की सहायक नदियों में वितास्ता (झेलम) आस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), शतुद्र (सतलज), विपासा (व्यास) प्रमुख थी। विपास (व्यास) नदी के तट पर ही इन्द्र ने उषा को पराजित किया और उसके रथ को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। सिन्धु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण हिरण्यनी कहा गया है। सिन्धु नदी द्वार ऊनी वस्त्रों के व्यवसाय होने का कारण इसे सुवासा और ऊर्पावर्ती भी कहा गया है। ऋग्वेद में सिन्धु नदी की चर्चा सर्वाधिक बार हुयी है।   ऋग्वेद के विषय में कुछ प्रमुख बातें निम्नलिखित है- यह सबसे प्राचीनतम वेद माना जाता है। ऋग्वेद के कई सूक्तों में विभिन्न वैदिक देवताओं की स्तुति करने वाले मंत्र हैं, यद्यपि ऋग्वेद में अन्य प्रकार के सूक्त भी हैं, परन्तु देवताओं की स्तुति करने वाले स्त्रोतों की प्रधानता है। ऋग्वेद में कुल दस मण्डल हैं और उनमें 1028 सूक्त हैं और कुल 10,580 ऋचाएँ हैं। इसके दस मण्डलों में कुछ मण्डल छोटे हैं और कुछ मण्डल बड़े हैं। प्रथम और अन्तिम मण्डल, दोनों ही समान रूप से बड़े हैं। उनमें सूक्तों की संख्या भी 191 है। दूसरे मण्डल से सातवें मण्डल तक का अंश ऋग्वेद का श्रेष्ठ भाग है, उसका हृदय है। आठवें मण्डल और प्रथम मण्डल के प्रारम्भिक पचास सूक्तों में समानता है। ऋक्ष शब्द ऋग्वेद में एक बार तथा परवर्ती वैदिक साहित्य में कदाचित ही प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद में यातुधानों को यज्ञों में बाधा डालने वाला तथा पवित्रात्माओं को कष्ट पहुँचाने वाला कहा गया है। नवाँ मण्डल सोम से सम्बन्धित होने से पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है। यह नवाँ मण्डल आठ मण्डलों में सम्मिलित सोम सम्बन्धी सूक्तों का संग्रह है, इसमें नवीन सूक्तों की रचना नहीं है। दसवें मण्डल में प्रथम मण्डल की सूक्त संख्याओं को ही बनाये रखा गया है। पर इस मण्डल का विषय, कथा, भाषा आदि सभी परिवर्तीकरण की रचनाएँ हैं। ऋग्वेद के मन्त्रों या ऋचाओं की रचना किसी एक ऋषि ने एक निश्चित अवधि में नहीं की, अपितु विभिन्न काल में विभिन्न ऋषियों द्वारा ये रची और संकलित की गयीं। ऋग्वेद के मन्त्र स्तुति मन्त्र होने से ऋग्वेद का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व अधिक है। चारों वेदों में सर्वाधिक प्राचीन वेद ऋग्वेद से आर्यों की राजनीतिक प्रणाली एवं इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। ऋग्वेद अर्थात ऐसा ज्ञान, जो ऋचाओं में बद्ध हो। विभाग ऋग्वेद में दो प्रकार के विभाग मिलते हैं- अष्टक क्रम – इसमें समस्त ग्रंथ आठ अष्टकों तथा प्रत्येक अष्टक आठ अध्यायों में विभाजित है। प्रत्येक अध्याय वर्गो में विभक्त है। समस्त वर्गो की संख्या 2006 है। मण्डलक्रम – इस क्रम में समस्त ग्रन्थ 10 मण्डलों में विभाजित है। मण्डल अनुवाक, अनुवाक सूक्त तथा सूक्त मंत्र या ॠचाओं में विभाजित है। दशों मण्डलों में 85 अनुवाक, 1028 सूक्त हैं। इनके अतिरिक्त 11 बालखिल्य सूक्त हैं। ऋग्वेद के समस्य सूक्तों के ऋचाओं (मंत्रों) की संख्या 10600 है। सूक्तों के पुरुष रचयिताओं में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज और वसिष्ठ तथा स्त्री रचयिताओं में लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्वरा, सिकता, शचीपौलोमी और कक्षावृत्तिप्रमुख है। इनमें लोपामुद्रा प्रमुख थी। वह क्षत्रीय वर्ण की थी किन्तु उनकी शादी अगस्त्य ऋषि से हुयी थी। ऋग्वेद के दूसरे एवं सातवें मण्डल की ऋचायें सर्वाधिक प्राचीन हैं, जबकि पहला एवं दसवां मण्डल अन्त में जोड़ा गया है। ऋग्वेद के आठवें मण्डल में मिली हस्तलिखित प्रतियों के परिशिष्ट को ‘खिल‘ कहा गया है। ऋग्वेद के मण्डल एवं उसके रचयिता  मण्डल  रचयिता 1- प्रथम मण्डल अनेक ऋषि 2- द्वितीय मण्डल गृत्समय 3- तृतीय मण्डल विश्वासमित्र 4- चतुर्थ मण्डल वामदेव 5- पंचम मण्डल अत्रि 6- षष्ठम् मण्डल भारद्वाज 7- सप्तम मण्डल वशिष्ट 8-अष्ठम मण्डल कण्व व अंगिरा 9- नवम् मण्डल (पावमान मण्डल) अनेक ऋषि 10- दशम मण्डल अनेक ऋषि   प्राचीन रचना ऋग्वेद भारत की ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की प्राचीनतम रचना है। इसकी तिथि 1500 से 1000 ई.पू. मानी जाती है। सम्भवतः इसकी रचना सप्त-सैंधव प्रदेश में हुयी थी। ऋग्वेद और ईरानी ग्रन्थ ‘जेंद अवेस्ता’ में समानता पाई जाती है। ऋग्वेद के अधिकांश भाग में देवताओं की स्तुतिपरक ऋचाएं हैं, यद्यपि उनमें ठोस ऐतिहासिक सामग्री बहुत कम मिलती है, फिर भी इसके कुछ मन्त्र ठोस ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध करते हैं। जैसे एक स्थान ‘दाशराज्ञ युद्ध‘ जो भरत कबीले के राजा सुदास एवं पुरू कबीले के मध्य हुआ था, का वर्णन किया गया है। भरत जन के नेता सुदास के मुख्य पुरोहित वसिष्ठ थे, जब कि इनके विरोधी दस जनों (आर्य और अनार्य) के संघ के पुरोहित विश्वामित्र थे। दस जनों के संघ में- पांच जनो के अतिरिक्त- अलिन, पक्थ, भलनसु, शिव तथ विज्ञाषिन के राजा सम्मिलित थे। भरत जन का राजवंश त्रित्सुजन मालूम पड़ता है, जिसके प्रतिनिधि देवदास एवं सुदास थे। भरत जन के नेता सुदास ने रावी (परुष्णी) नदी के तट पर उस राजाओं के संघ को पराजित कर ऋग्वैदिक भारत के चक्रवर्ती शासक के पद पर अधिष्ठित हुए। ऋग्वेद में, यदु, द्रुह्यु, तुर्वश, पुरू और अनु पांच जनों का वर्णन मिलता है। शाखाएँ ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण यज्ञों के अवसर पर ‘होतृ ऋषियों’ द्वारा किया जाता था। ऋग्वेद की अनेक संहिताओं में ‘संप्रति संहिता‘ ही उपलब्ध है। संहिता का अर्थ संकलन होता है। ऋग्वेद की पांच शाखायें हैं- शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन मांडूकायन ऋग्वेद के कुल मंत्रों की संख्या लगभग 10600 है। बाद में जोड़ गये दशम मंडल, जिसे ‘पुरुषसूक्त‘ के नाम से जाना जाता है, में सर्वप्रथम शूद्रों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त नासदीय सूक्त (सृष्टि विषयक जानकारी, निर्गुण ब्रह्म की जानकारी), विवाह सूक्त (ऋषि दीर्घमाह द्वारा रचित), नदि सूक्त (वर्णित सबसे अन्तिम नदी गोमल), देवी सूक्त आदि का वर्णन इसी मण्डल में है। इसी सूक्त में दर्शन की अद्वैत धारा के प्रस्फुटन का भी आभास होता है। सोम का उल्लेख नवें मण्डल में है। ‘मैं कवि हूं, मेरे पिता वैद्य हैं, माता अन्नी पीसनें वाली है। यह कथन इसी मण्डल में है। लोकप्रिय ‘गायत्री मंत्र’ (सावित्री) का उल्लेख भी ऋग्वेद के 7वें मण्डल में किया गया है। इस मण्डल के रचयिता वसिष्ठ थे। यह मण्डल वरुण देवता को समर्पित है। त्रित देवता की कथा त्रित प्राचीन देवताओं में से थे। त्रित सोम बनाया था तथा इंद्रादि अनेक देवताओं की स्तुतियाँ समय-समय पर की थीं। त्रित ने बल के दुर्ग को नष्ट किया था। युद्ध के समय मरुतों ने त्रित की शक्ति की रक्षा की थी। 2. यजुर्वेद ‘यजुष’ शब्द का अर्थ है- ‘यज्ञ’। यर्जुवेद मूलतः कर्मकाण्ड ग्रन्थ है। इसकी रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है। यजुर्वेद में आर्यो की धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की झांकी मिलती है। इस ग्रन्थ से पता चलता है कि आर्य ‘सप्त सैंधव’ से आगे बढ़ गए थे और वे प्राकृतिक पूजा के प्रति उदासीन होने लगे थे। यर्जुवेद के मंत्रों का उच्चारण ‘अध्वुर्य’ नामक पुरोहित करता था। इस वेद में अनेक प्रकार के यज्ञों को सम्पन्न करने की विधियों का उल्लेख है। यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है। गद्य को ‘यजुष’ कहा गया है। यजुर्वेद का अन्तिम अध्याय ईशावास्य उपनिषयद है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक चिन्तन से है। उपनिषदों में यह लघु उपनिषद आदिम माना जाता है क्योंकि इसे छोड़कर कोई भी अन्य उपनिषद संहिता का भाग नहीं है। यजुर्वेद के दो मुख्य भाग है- शुक्ल यजुर्वेद कृष्ण यजुर्वेद शुक्ल यजुर्वेद इसमें केवल ‘दर्शपौर्मासादि’ अनुष्ठानों के लिए आवश्यक मंत्रों का संकलन है। इसकी मुख्य शाखायें है- माध्यन्दिन काण्व इसकी संहिताओं को ‘वाजसनेय’ भी कहा गया है क्योंकि ‘वाजसनि’ के पुत्र याज्ञवल्क्य वाजसनेय इसके दृष्टा थे। इसमें कुल 40 अध्याय हैं। कृष्ण यजुर्वेद इसमें मंत्रों के साथ-साथ ‘तन्त्रियोजक ब्राह्मणों’ का भी सम्मिश्रण है। वास्तव में मंत्र तथा ब्राह्मण का एकत्र मिश्रण ही ‘कृष्ण यजुः’ के कृष्णत्त्व का कारण है तथा मंत्रों का विशुद्ध एवं अमिश्रित रूप ही ‘शुक्त यजुष्’ के शुक्लत्व का कारण है। इसकी मुख्य शाखायें हैं- तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ और कपिष्ठल तैत्तरीय संहिता (कृष्ण यजुर्वेद की शाखा) को ‘आपस्तम्ब संहिता’ भी कहते हैं। महर्षि पंतजलि द्वारा उल्लिखित यजुर्वेद की 101 शाखाओं में इस समय केवल उपरोक्त पाँच वाजसनेय, तैत्तिरीय, कठ, कपिष्ठल और मैत्रायणी ही उपलब्ध हैं। यजुर्वेद से उत्तरवैदिक युग की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती हैं। इन दोनों शाखाओं में अंतर यह है कि शुक्ल यजुर्वेद पद्य (संहिताओं) को विवेचनात्मक सामग्री (ब्राह्मण) से अलग करता है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में दोनों ही उपस्थित हैं। यजुर्वेद में वैदिक अनुष्ठान की प्रकृति पर विस्तृत चिंतन है और इसमें यज्ञ संपन्न कराने वाले प्राथमिक ब्राह्मण व आहुति देने के दौरान प्रयुक्त मंत्रों पर गीति पुस्तिका भी शामिल है। इस प्रकार यजुर्वेद यज्ञों के आधारभूत तत्त्वों से सर्वाधिक निकटता रखने वाला वेद है। यजुर्वेद संहिताएँ संभवतः अंतिम रचित संहिताएँ थीं, जो ई. पू. दूसरी सहस्त्राब्दी के अंत से लेकर पहली सहस्त्राब्दी की आरंभिक शताब्दियों के बीच की हैं। यजुर्वेद की अन्य विशेषताएँ यजुर्वेद गद्यात्मक हैं। यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को ‘यजुस’ कहा जाता है। यजुर्वेद के पद्यात्मक मन्त्र ऋग्वेद या अथर्ववेद से लिये गये है। इनमें स्वतन्त्र पद्यात्मक मन्त्र बहुत कम हैं। यजुर्वेद में यज्ञों और हवनों के नियम और विधान हैं। यह ग्रन्थ कर्मकाण्ड प्रधान है। यदि ऋग्वेद की रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई थी तो यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र के प्रदेश में हुई थी। इस ग्रन्थ से आर्यों के सामाजिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। वर्ण-व्यवस्था तथा वर्णाश्रम की झाँकी भी इसमें है। यजुर्वेद में यज्ञों और कर्मकाण्ड का प्रधान है। निम्नलिखित उपनिषद् भी यजुर्वेद से सम्बद्ध हैं:- श्वेताश्वतर बृहदारण्यक ईश प्रश्न मुण्डक माण्डूक्य 3. सामवेद ‘साम‘ शब्द का अर्थ है ‘गान‘। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था। सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 75 से अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं। इन ऋचाओं का गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता‘ करते थे। सामदेव की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं- कौथुमीय, जैमिनीय एवं राणायनीय। देवता विषयक विवेचन की दृष्ठि से सामवेद का प्रमुख देवता ‘सविता‘ या ‘सूर्य‘ है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं किन्तु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है। भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनि को माना जाता है। सामवेद से तात्पर्य है कि वह ग्रन्थ जिसके मन्त्र गाये जा सकते हैं और जो संगीतमय हों। यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय ये मन्त्र गाये जाते हैं। सामवेद में मूल रूप से 99 मन्त्र हैं और शेष ऋग्वेद से लिये गये हैं। इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसका नाम सामवेद इसलिये पड़ा है कि इसमें गायन-पद्धति के निश्चित मन्त्र ही हैं। इसके अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद में उपलब्ध होते हैं, कुछ मन्त्र स्वतन्त्र भी हैं। सामवेद में ऋग्वेद की कुछ ॠचाएं आकलित है। वेद के उद्गाता, गायन करने वाले जो कि सामग (साम गान करने वाले) कहलाते थे। उन्होंने वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख किया है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं। सामगान व्यावहारिक संगीत था। उसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं। वैदिक काल में बहुविध वाद्य यंत्रों का उल्लेख मिलता है जिनमें से तंतु वाद्यों में कन्नड़ वीणा, कर्करी और वीणा, घन वाद्य यंत्र के अंतर्गत दुंदुभि, आडंबर, वनस्पति तथा सुषिर यंत्र के अंतर्गतः तुरभ, नादी तथा  बंकुरा आदि यंत्र विशेष उल्लेखनीय हैं। 4. अथर्ववेद  अथर्ववेद की भाषा और स्वरूप के आधार पर ऐसा माना जाता है कि इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई थी। अथर्ववेद के दो पाठों, शौनक और पैप्पलद, में संचरित हुए लगभग सभी स्तोत्र ऋग्वेद के स्तोत्रों के छदों में रचित हैं। दोनो वेदों में इसके अतिरिक्त अन्य कोई समानता नहीं है। अथर्ववेद दैनिक जीवन से जुड़े तांत्रिक धार्मिक सरोकारों को व्यक्त करता है, इसका स्वर ऋग्वेद के उस अधिक पुरोहिती स्वर से भिन्न है, जो महान देवों को महिमामंडित करता है और सोम के प्रभाव में कवियों की उत्प्रेरित दृष्टि का वर्णन करता है रचना काल यज्ञों व देवों को अनदेखा करने के कारण वैदिक पुरोहित वर्ग इसे अन्य तीन वेदों के बराबर नहीं मानता था। इसे यह दर्जा बहुत बाद में मिला। इसकी भाषा ऋग्वेद की भाषा की तुलना में स्पष्टतः बाद की है और कई स्थानों पर ब्राह्मण ग्रंथों से मिलती है। अतः इसे लगभग 1000 ई.पू. का माना जा सकता है। इसकी रचना ‘अथवर्ण’ तथा ‘आंगिरस’ ऋषियों द्वारा की गयी है। इसीलिए अथर्ववेद को ‘अथर्वांगिरस वेद’ भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त अथर्ववेद को अन्य नामों से भी जाना जाता है- गोपथ ब्राह्मण में इसे ‘अथर्वांगिरस’ वेद कहा गया है। ब्रह्म विषय होने के कारण इसे ‘ब्रह्मवेद’ भी कहा गया है। आयुर्वेद, चिकित्सा, औषधियों आदि के वर्णन होने के कारण ‘भैषज्य वेद’ भी कहा जाता है । ‘पृथ्वीसूक्त’ इस वेद का अति महत्त्वपूर्ण सूक्त है। इस कारण इसे ‘महीवेद’ भी कहते हैं। विषय अथर्ववेद में कुल 20 काण्ड, 730 सूक्त एवं 5987 मंत्र हैं। इस वेद के महत्त्वपूर्ण विषय हैं- ब्रह्मज्ञान औषधि प्रयोग रोग निवारण जन्त्र-तन्त्र टोना-टोटका आदि। विवरण अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा कहा गया है तथा इसमें कुरू देश की समृद्वि का अच्छा विवरण मिलता है। इस वेद में आर्य एवं अनार्य विचार-धाराओं का समन्वय है। उत्तर वैदिक काल में इस वेद का विशेष महत्त्व है। ऋग्वेद के दार्शनिक विचारों का प्रौढ़रूप इसी वेद से प्राप्त हुआ है। शान्ति और पौष्टिक कर्मा का सम्पादन भी इसी वेद में मिलता है। अथर्ववेद में सर्वाधिक उल्लेखनीय विषय ‘आयुर्विज्ञान’ है। इसके अतिरिक्त ‘जीवाणु विज्ञान’ तथा ‘औषधियों’ आदि के विषय में जानकारी इसी वेद से होती है। भूमि सूक्त के द्वारा राष्ट्रीय भावना का सुदृढ़ प्रतिपादन सर्वप्रथम इसी वेद में हुआ है। इस वेद की दो अन्य शाखायें हैं- पिप्पलाद शौनक अथर्ववेद में 20 कांड हैं, जिनमें 598 सूक्त और गद्य परिच्छेद हैं। जिनका विवरण निम्न हैः- पहले से लेकर सातवें कांड में विशिष्ट उद्देश्यों के लिए तंत्र-मंत्र संबंधी प्राथनाएं हैं- लंबे जीवन के लिए मंत्र, उपचार, श्राप, प्रेम मंत्र, समृद्धि के लिए प्रार्थना, ब्राह्मण के ज्ञाताओं से घनिष्ठता, वेद अध्ययन में सफलता, राजा बनने के लिए मंत्र और पाप का प्रायश्चित। आठवें से बारहवें कांड में इसी तरह के पाठ हैं, लेकिन इसमें ब्रह्मांडीय सूक्त भी शामिल हैं, जो ऋग्वेद के सूक्तों को ही जारी रखते हैं और उपनिषदों के अधिक जटिल चिंतन की ओर ले जाते हैं। उदाहरण के लिए, उपनिषदों के लिए अत्यंत अर्थवान श्वास या प्राणवायु के महत्त्व की संकल्पना और सार्वभौम अस्तित्व से जुड़े आत्म पर चिंतन सबसे पहले अथर्ववेद में ही पाए गए थे। 13 से 20 तक कांड में ब्रह्मांडीय सिद्धांत (13 कांड), विवाह प्राथनाएं (कांड 14), अंतिम संस्कार के मंत्र (कांड 18) और अन्य जादुई व अनुष्ठानिक मंत्र हैं। 15 वां कांड रोचक है, जिसमें व्रत्य का महिमामंडन किया गया है, जो वेदपाठ न करने वाला एक अरूढ़िबद्ध आर्य समूह था, लेकिन इसके बावजूद सम्मानजनक आनुष्ठानिक व चिंतन परंपराएं रखता था। यही नहीं, व्रत्य स्वामिस्वरूप हैं और एक राजा का आतिथ्य ग्रहण करने की स्थति में उन्हें राजा को आशीर्वाद देने योग्य माना गया है। अथर्ववेद के इस भाग के साथ-साथ अन्य यजुर्वेद परिच्छेदों में वैदिक रचना के प्राथमिक संगठनात्मक सिद्धांतों और बाद के भारतीय अनुष्ठानों में से एक, अतिथि सत्कार के मह्त्व का वर्णन किया गया है। अन्य सूक्त अथर्ववेद का एक अन्य सूक्त मानव शरीर की रचना का वर्णन व प्रशंसा करता है। इस सूक्त व उपचार से जुड़े सामन्य अथर्ववेदी चिंतन के कारण शास्त्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली, आयुर्वेद अपनी उत्पत्ति अथर्ववेद से मानता है। किंतु शास्त्रों द्वारा इस दावें को समर्थन नहीं मिलता और न तो आयुर्वेद के सिद्धांत वेदों में और न ही अथर्ववेद के तांत्रिक या आनुष्ठानिक उपचार आयुर्वेद में पाए जाते हैं। फिर भी चिकित्सकीय उपचारों को प्रणालीबद्ध करने व उन्हें वर्गीकृत किए जाने के काम की शुरुआत अथर्ववेद से मानी जा सकती है। विशेषताएँ इसमें ऋग्वेद और सामवेद से भी मन्त्र लिये गये हैं। जादू से सम्बन्धित मन्त्र-तन्त्र, राक्षस, पिशाच, आदि भयानक शक्तियाँ अथर्ववेद के महत्त्वपूर्ण विषय हैं। इसमें भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि के मन्त्र हैं। ऋग्वेद के उच्च कोटि के देवताओं को इस वेद में गौण स्थान प्राप्त हुआ है। धर्म के इतिहास की दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद दोनों का बड़ा ही मूल्य है। अथर्ववेद से स्पष्ट है कि कालान्तर में आर्यों में प्रकृति की पूजा की उपेक्षा हो गयी थी और प्रेत-आत्माओं व तन्त्र-मन्त्र में विश्वास किया जाने लगा था। उपवेद और वेदांग    उपवेद   अर्थवेद (ॠग्वेद) कामन्दक सूत्र · कौटिल्य अर्थशास्त्र · चाणक्य सूत्र · नीतिवाक्यमृतसूत्र · बृहस्पतेय अर्थाधिकारकम् · शुक्रनीति   धनुर्वेद (दोनों यजुर्वेदों के लिए मुक्ति कल्पतरू · वृद्ध शारंगधर · वैशम्पायन नीति-प्रकाशिका · समरांगण सूत्रधार   गान्धर्ववेद (सामवेद) दत्तिलम · भरत नाट्यशास्त्र · मल्लिनाथ रत्नाकर · संगीत दर्पण · संगीत रत्नाकर   आयुर्वेद (अथर्ववेद) अग्निग्रहसूत्रराज · अश्विनीकुमार संहिता · अष्टांगहृदय · इन्द्रसूत्र · चरक संहिता · जाबालिसूत्र · दाल्भ्य सूत्र · देवल सूत्र · धन्वन्तरि सूत्र ·धातुवेद · ब्रह्मन संहिता · भेल संहिता · मानसूत्र · शब्द कौतूहल · सुश्रुत संहिता · सूप सूत्र · सौवारि सूत्र     वेदांग      कल्प गृह्यसूत्र (रीति-रिवाजों, प्रथाओं हेतु) · धर्मसूत्र (शासकों हेतु) · श्रौतसूत्र (यज्ञ हेतु)   शिक्षा गौतमी शिक्षा (सामवेद) · नारदीय शिक्षा· पाणिनीय शिक्षा (ऋग्वेद) · बाह्य शिक्षा (कृष्ण यजुर्वेद) · माण्ड्की शिक्षा (अथर्ववेद) · याज्ञवल्क्य शिक्षा (शुक्ल यजुर्वेद) · लोमशीय शिक्षा   व्याकरण कल्प व्याकरण · कामधेनु व्याकरण · पाणिनि व्याकरण · प्रकृति प्रकाश · प्रकृति व्याकरण · मुग्धबोध व्याकरण · शाक्टायन व्याकरण · सारस्वत व्याकरण · हेमचन्द्र व्याकरण   निरुक्त्त मुक्ति कल्पतरू · वृद्ध शारंगधर · वैशम्पायन नीति-प्रकाशिका · समरांगण सूत्रधार   छन्द गार्ग्यप्रोक्त उपनिदान सूत्र · छन्द मंजरी · छन्दसूत्र · छन्दोविचित छन्द सूत्र · छन्दोऽनुक्रमणी · छलापुध वृत्ति · जयदेव छन्द · जानाश्रमां छन्दोविचित · वृत्तरत्नाकर · वेंकटमाधव छन्दोऽनुक्रमणी · श्रुतवेक   ज्योतिष आर्यभट्टीय ज्योतिष · नारदीय ज्योतिष · पराशर ज्योतिष · ब्रह्मगुप्त ज्योतिष · भास्कराचार्य ज्योतिष · वराहमिहिर ज्योतिष · वासिष्ठ ज्योतिष · वेदांग ज्योतिष                                                                                                     उपनिषद ॠग्वेदीय उपनिषद ऐतरेय उपनिषद · आत्मबोध उपनिषद · कौषीतकि उपनिषद · निर्वाण उपनिषद · नादबिन्दुपनिषद ·  सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद · अक्षमालिक उपनिषद ·भवऋचा उपनिषद · मुदगल उपनिषद · त्रिपुरा उपनिषद ·  बहवृचोपनिषद · मृदगलोपनिषद · राधोपनिषद   यजुर्वेदीय उपनिषद   शुक्ल यजुर्वेदीय अध्यात्मोपनिषद · आद्यैतारक उपनिषद · भिक्षुकोपनिषद · बृहदारण्यकोपनिषद · ईशावास्योपनिषद · हंसोपनिषद ·  जाबालोपनिषद ·मंडल ब्राह्मण उपनिषद · मन्त्रिकोपनिषद · मुक्तिका उपनिषद · निरालम्बोपनिषद · पैंगलोपनिषद · परमहंसोपनिषद · सत्यायनी उपनिषद · सुबालोपनिषद · तारासार उपनिषद · त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद · तुरीयातीतोपनिषद · अद्वयतारकोपनिषद · याज्ञवल्क्योपनिषद  ·शाट्यायनीयोपनिषद · शिवसंकल्पोपनिषद   कृष्ण यजुर्वेदीय अक्षि उपनिषद · अमृतबिन्दु उपनिषद · अमृतनादोपनिषद · अवधूत उपनिषद · ब्रह्म उपनिषद · ब्रह्मविद्या उपनिषद · दक्षिणामूर्ति उपनिषद · ध्यानबिन्दु उपनिषद · एकाक्षर उपनिषद · गर्भ उपनिषद · कैवल्योपनिषद · कालाग्निरुद्रोपनिषद · कर उपनिषद · कठोपनिषद ·कठरुद्रोपनिषद · क्षुरिकोपनिषद · नारायणो · पंचब्रह्म · प्राणाग्निहोत्र उपनिषद ·  रुद्रहृदय · सरस्वतीरहस्य उपनिषद · सर्वासार उपनिषद ·शारीरिकोपनिषद · स्कन्द उपनिषद · शुकरहस्योपनिषद · श्वेताश्वतरोपनिषद · तैत्तिरीयोपनिषद · तेजोबिन्दु उपनिषद ·  वराहोपनिषद ·योगकुण्डलिनी उपनिषद · योगशिखा उपनिषद · योगतत्त्व उपनिषद ·  कलिसन्तरणोपनिषद · चाक्षुषोपनिषद     सामवेदीय उपनिषद आरुणकोपनिषद · दर्शनोपनिषद · जाबालदर्शनोपनिषद · जाबालि उपनिषद · केनोपनिषद · महात्संन्यासोपनिषद ·  मैत्रेयीउपनिषद · मैत्रायणी उपनिषद · अव्यक्तोपनिषद · छान्दोग्य उपनिषद · रुद्राक्षजाबालोपनिषद · सावित्र्युपनिषद · संन्यासोपनिषद · वज्रसूचिकोपनिषद · वासुदेवोपनिषद · चूड़ामणि उपनिषद · कुण्डिकोपनिषद · जाबाल्युपनिषद · महोपनिषद · मैत्रेय्युग्पनिषद · योगचूडाण्युपनिषद   अथर्ववेदीय उपनिषद अन्नपूर्णा उपनिषद · अथर्वशिर उपनिषद · अथर्वशिखा उपनिषद · आत्मोपनिरुषद · भावनोपनिषद · भस्मोपनिषद · बृहज्जाबालोपनिषद · देवी उपनिषद · दत्तात्रेय उपनिषद · गणपति उपनिषद · गरुडोपनिषद · गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद · ह्यग्रीव उपनिषद · कृष्ण उपनिषद · महानारायण उपनिषद ·माण्डूक्योपनिषद · महावाक्योपनिषद · मुण्डकोपनिषद · नारदपरिव्राजकोपनिषद · नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद ·  परब्रह्मोपनिषद · प्रश्नोपनिषद · परमहंस परिव्राजक उपनिषद · पशुपत उपनिषद · श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद ·  शाण्डिल्योपनिषद · शरभ उपनिषद · सूर्योपनिषद · सीता उपनिषद · राम-रहस्य उपनिषद · त्रिपुरातापिन्युपनिषद                                                                                        ब्राह्मण ग्रन्थ   ॠग्वेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ ऐतरेय ब्राह्मण · कौषीतकि ब्राह्मण · शांखायन ब्राह्मण   यजुर्वेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ   शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथब्राह्मण(काण्वब्राह्मण) · शतपथ (माध्यन्दिन) ब्राह्मण   कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय ब्राह्मण · मध्यवर्ती ब्राह्मण     सामवेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ ताण्ड्य ब्राह्मण · षडविंश ब्राह्मण · सामविधान ब्राह्मण · आर्षेय ब्राह्मण · मन्त्र ब्राह्मण · देवताध्यानम् ब्राह्मण · वंश ब्राह्मण · संहितोपनिषद ब्राह्मण ·जैमिनीय ब्राह्मण · जैमिनीयार्षेय ब्राह्मण · जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण   अथर्ववेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ गोपथ ब्राह्मण सूत्र-ग्रन्थ   ॠग्वेदीय सूत्र-ग्रन्थ आश्वलायन श्रौतसूत्र · शांखायन श्रौतसूत्र · आश्वलायन गृह्यसूत्र · शांखायन गृह्यसूत्र · वासिष्ठ धर्मसूत्र   यजुर्वेदीय सूत्र-ग्रन्थ   शुक्ल यजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र · पारस्कर श्रौतसूत्र · विष्णु धर्मसूत्र · पारस्कर गृह्यसूत्र   कृष्ण यजुर्वेदीय आपस्तम्ब श्रौतसूत्र · आपस्तम्बगृह्यसूत्र · हिरण्यकेशि श्रौतसूत्र · बौधायन गृह्यसूत्र · बौधायन श्रौतसूत्र · वैखानस गृह्यसूत्र · भारद्वाज श्रौतसूत्र · हिरण्यकेशीय गृह्यसूत्र · वैखानस श्रौतसूत्र · मानव धर्म-सूत्र · बाधूल श्रौतसूत्र · काठक धर्मसूत्र · आपस्तम्ब धर्मसूत्र · वराह श्रौतसूत्र · बौधायन धर्मसूत्र · मानव गृह्यसूत्र · वैखानस धर्मसूत्र · काठक गृह्यसूत्र · हिरण्यकेशीय धर्मसूत्र     सामवेदीय सूत्र-ग्रन्थ मसकसूत्र · लाट्यायन सूत्र · खदिर श्रौतसूत्र · जैमिनीय गृह्यसूत्र · गोभिल गृह्यसूत्र · खदिर गृह्यसूत्र · गौतम धर्मसूत्र · द्राह्यायण गृह्यसूत्र · द्राह्यायण धर्मसूत्र   अथर्ववेदीय सूत्र-ग्रन्थ वैतान श्रौतसूत्र · कौशिक गृह्यसूत्र · वराह गृह्यसूत्र · वैखानस गृह्यसूत्र शाखा   शाखा शाकल ॠग्वेदीय शाखा · काण्व शुक्ल यजुर्वेदीय · माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेदीय · तैत्तिरीय कृष्ण यजुर्वेदीय · मैत्रायणी कृष्ण यजुर्वेदीय · कठ कृष्ण यजुर्वेदीय · कपिष्ठल कृष्ण यजुर्वेदीय · श्वेताश्वतर कृष्ण यजुर्वेदीय · कौथुमी सामवेदीय शाखा · जैमिनीय सामवेदीय शाखा · राणायनीय सामवेदीय शाखा · पैप्पलाद अथर्ववेदीय शाखा · शौनकीय अथर्ववेदीय शाखा   मन्त्र-संहिता ॠग्वेद मन्त्र-संहिता · शुक्ल यजुर्वेद मन्त्र- संहिता · सामवेद मन्त्र-संहिता · अथर्ववेद मन्त्र-संहिता   आरण्यक ऐतरेय ॠग्वेदीय आरण्यक · शांखायन ॠग्वेदीय आरण्यक · कौषीतकि ॠग्वेदीय आरण्यक · बृहद शुक्ल यजुर्वेदीय आरण्यक · तैत्तिरीय कृष्ण यजुर्वेदीय आरण्यक · कठ कृष्ण यजुर्वेदीय आरण्यक · मैत्रायणीय कृष्ण यजुर्वेदीय आरण्यक · तलवकार सामवेदीय आरण्यक प्रातिसाख्य एवं अनुक्रमणिका ॠग्वेदीय प्रातिसाख्य शांखायन प्रातिशाख्य · बृहद प्रातिशाख्य · आर्षानुक्रमणिका · आश्वलायन प्रातिशाख्य · छन्दोनुक्रमणिका · ऋग्प्रातिशाख्य · देवतानुक्रमणिका ·सर्वानुक्रमणिका · अनुवाकानुक्रमणिका · बृहद्वातानुक्रमणिका · ऋग् विज्ञान यजुर्वेदीय प्रातिसाख्य शुक्ल यजुर्वेदीय कात्यायन शुल्वसूत्र · कात्यायनुक्रमणिका · वाजसनेयि प्रातिशाख्य   कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय प्रातिशाख्य     सामवेदीय प्रातिसाख्य शौनकीया चतुर्ध्यापिका स्मृति साहित्य   स्मृतिग्रन्थ अंगिरसस्मृति · आपस्तम्बस्मृति· ऐतरेयस्मृति · कात्यायनस्मृति · दक्षस्मृति · पाराशरस्मृति · प्रजापतिस्मृति · बृहस्पतिस्मृति · मनुस्मृति · मार्कण्डेयस्मृति ·यमस्मृति · याज्ञवल्क्यस्मृति · लिखितस्मृति · वसिष्ठस्मृति · विष्णुस्मृति · व्यासस्मृति · शंखस्मृति · शातातपस्मृति · सामवर्तस्मृति · हारीतिस्मृति   पुराण 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Thursday, 12 October 2017

गायत्री मंत्र कैसे जपें?

brijeshverma10 Search this site ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।‎ > ‎ गायत्री मंत्र कैसे जपें?     मात्र अक्षर दोहरा लेने से तो स्कूली बच्चे प्रथम कक्षा में ही बने रहते हैं। उन्हें प्रशिक्षित बनने के लिए वर्णमाला, गिनती जैसे प्रथम चरणों से आगे बढ़ना पड़ता है। इसी प्रकार गायत्री मंत्र के साथ जो  विभूतियाँ अविच्छिन्न रूप से आबद्ध हैं, मात्र थोड़े से अक्षरों को याद कर लेने या दोहरा देने से उनमें वर्णित विशेषताओं को उपलब्ध करना नहीं माना जा सकता। उनमें सन्निहित तत्त्वज्ञान पर भी गहरी दृष्टि डालनी होगी। इतना ही नहीं, उसे हृदयंगम भी करना होगा और जीवनचर्या में नवनीत को इस प्रकार समाविष्ट करना होगा कि मलीनता का निराकरण तथा शालीनता  का अनुभव संभव बन सके।        तत्त्वज्ञान मान्यताओं एवं भावनाओं को प्रभावित करता है। इन्हीं का मोटा स्वरूप चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार है। गायत्री का तत्त्वज्ञान इस स्तर की उत्कृष्टता अपनाने के लिए सद्विषयक विश्वासों को अपनाने के लिए प्रेरणा देता है।        गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। उसके तीन चरण हैं। उद्गम एक होते हुए भी उसके साथ तीन दिशाधाराएँ जुड़ती हैं:-       (१) सविता के भर्ग-तेजस् का वरण अर्थात् जीवन में ऊर्जा एवं आभा का बाहुल्य। अवांछनीयताओं  से अंत:ऊर्जा का टकराव। परिष्कृत प्रतिभा एवं शौर्य-साहस इसी का नाम है। गायत्री के नैष्ठिक साधक में यह प्रखर प्रतिभा इस स्तर की होनी चाहिए कि अनीति के आगे न सिर झुकाए और न झुककर कायरता के दबाव में कोई समझौता करे।        (२) दूसरा चरण- देवत्व का वरण अर्थात् शालीनता को अपनाते हुए उदारचेता बने रहना; लेने की अपेक्षा देने की प्रवृत्ति का परिपोषण करना; उस स्तर के व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव-गरिमा की अंतराल में अवधारणा करना। यही है ‘देवस्य धीमहि।’       (३) तीसरा सोपान है-धियो यो न: प्रचोदयात्’ मात्र अपनी ही नहीं, अपने समूह, समाज व संसार में सद्बुद्धि की प्रेरणा उभारना- मेधा, प्रज्ञा, दूरदर्शी विवेकशीलता, नीर-क्षीर विवेक में निरत बुद्धिमत्ता।       गायत्री का तत्त्वज्ञान समझने और स्वीकारने वाले में ये तीनों ही विशेषताएँ न केवल पाई जानी चाहिए वरन् उनका अनुपात निरंतर बढ़ते रहना चाहिए। इस आस्था को स्वीकारने के उपरांत संकीर्णता व कृपणता से अनुबंधित ऐसी स्वार्थपरता के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि उससे प्रभावित होकर कोई दूसरों के अधिकारों का हनन करके अपने लिए अनुचित स्तर का लाभ बटोर सके-अपराधी या आततायी कहलाने के पतन-पराभव अपना सके।        इस आधार पर इसे ईश्वरीय निर्देश, शास्त्र-वचन एवं आप्तजन-कथन के रूप में अपनाया जा सकता है। गायत्री के विषय में गीता का वाक्य है-गायत्री छंदसामहम्’। भगवान् कृष्ण ने कहा है कि ‘छंदों में गायत्री में स्वयं हूँ,’ जो विद्या-विभूति के रूप में गायत्री की व्याख्या करते हुए विभूति योग में प्रकट हुई है। - आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना       नाम-जप का तात्पर्य है-जिस परमेश्वर को, उसके विधान को आमतौर से हम भूले रहते हैं, उसको बार-बार स्मृति-पटल पर अंकित करें, विस्मरण की भूल न होने दें। सुरदुर्लभ मनुष्य-जीवन की महती अनुकंपा और उसके साथ जुड़ी हुई स्रष्टा की आकांक्षा  को समझने, अपनाने की मानसिकता बनाए रहने का नित्य प्रयत्न करना ही नाम-जप का महत्त्व और माहात्म्य है। साबुन रगड़ने से शरीर और कपड़ा स्वच्छ होता है। घिसाई-रंगाई करने से निशान पड़ने और चमकने का अवसर मिलता है। जप करने वाले व्यक्तित्व को इसी आधार पर विकसित करें। - जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र       आप ऐसे कीजिए कि मन्त्र के साथ-साथ में आपने पढ़ा होगा-योगशास्त्र में लिखा है-क्या लिखा है? मन्त्र को अर्थ समेत जपना चाहिए। अर्थ समेत आप कहाँ जपते हैं? ये गलत बात है। गायत्री मन्त्र की जिस प्रकार से बोलने की स्पीड है, उस तरह से विचार की स्पीड नहीं हो सकती। ‘भू’ का अर्थ ये है, ‘भुव:’ का अर्थ ये है, तत् का अर्थ ये है। इस प्रकार से अर्थ चिन्तन के साथ जप का समन्वय सम्भव नहीं और देखें जुबान कितनी तेजी से चलती है। अर्थ का चिंतन कितने धीमे से होता है? जप के साथ चिंतन नहीं हो सकता। गलत कहा है-गलत या तो गलत लिखा है या आपने गलत समझा है। गलत क्या बात है? इसका अर्थ ये है- कोई आप कृत्य करते हैं। प्रत्येक कृत्य को पीछे  ये पता चलाना पड़ेगा। क्या पता चलाना पड़ेगा कि इसके पीछे प्रेरणा क्या है? शिक्षा क्या है? स्थूल शरीर से आप प्रतीकों का पूजन करेंगे, चावल चढ़ाएँ हाथ जोड़ें, नमस्कार करें, माला घुमाएँ, मन्त्र का उच्चारण करें। ये स्थूल शरीर की क्रियाएँ हैं। इतने से काम बनने वाला नहीं फिर क्या करना चाहिए? आदमी को ये करना चाहिए कि प्रत्येक कर्मकाण्ड के पीछे की विचारणाएँ, प्रेरणाएँ समझें। विचारणाएँ क्या हैं? प्रत्येक कर्मकाण्ड हमको कुछ शिक्षा देता है, कुछ नसीहत देता है, कुछ उम्मीदें कराता है। आपने उपासना की है, कर्मकाण्ड किया है, तो इस कर्मकाण्ड के माध्यम से जो आपको अपने जीवन में हेर-फेर करने चाहिए, विचारों में परिवर्तन करने चाहिए, उस परिवर्तन के लिए आप विचारमग्न हों और विचार करें कि आखिर ये क्यों किया जाए? आप तो कर्मकाण्ड करते रहते हैं और ये विचार तक नहीं करते कि क्यों करते हैं? वेदान्त का, फिलॉसफी का पहला वाला सूत्र है, क्या सूत्र है? ब्रह्म-जिज्ञासा पहला काम ये है कि आप जानिए। ये क्या चक्कर है? गायत्री माता की मूर्ति हो, तो आप ये पूछिए कि क्या बात है साहब! हमने तो मूर्ति रख दी और दंड लगा रहे हैं। दण्ड लगाइये मत। पहला काम ये है कि समझो।       क्यों और क्या? पहले यहाँ से चल। भजन पीछे करना। ये क्या चक्कर है? पहले ये पूछना, फिर इसके बाद शुरू करना। ये आपकी क्या है? जिज्ञासा है। प्रत्येक कर्मकाण्ड देखने से खिलवाड़ मालूम पड़ते हैं-बच्चों जैसे। खिलवाड़ मालूम पड़ते हैं। चावल चढ़ा दिया गणेश जी पर। काहे के लिए चढ़ा गणेश जी पर? गणेश जी कच्चा चावल खाएँगे क्या? - पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी  Comments View as Desktop My Sites Powered By Google Sites

गायत्री मन्त्र (ऋ० ३/६२/१०) 

मुख्य मेनू खोलें खोजें संपादित करेंइस पृष्ठ का ध्यान रखेंकिसी अन्य भाषा में पढ़ें ऋग्वेद पवित्र हिन्दू धर्मग्रंथो ,वेदों,में सबसे प्राचीन वेद धर्मग्रंथ ऋग्वेद सनातन धर्म का सबसे आरंभिक स्रोत है। इसमें १०२८ सूक्त हैं, जिनमें देवताओं की स्तुति की गयी है। इसमें देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र हैं, यही सर्वप्रथम वेद है। ऋग्वेद को इतिहासकार हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की अभी तक उपलब्ध पहली रचनाऔं में एक मानते हैं। यह संसार के उन सर्वप्रथम ग्रन्थों में से एक है जिसकी किसी रूप में मान्यता आज तक समाज में बनी हुई है। यह एक प्रमुख हिन्दू धर्म ग्रंथ है । ऋग्वेद ऋग्वेद की १९ वी शताब्दी की पाण्डुलिपि ग्रंथ का परिमाण श्लोक संख्या(लम्बाई) १०५८० ऋचाएँ रचना काल ७००० - १५०० ईसा पूर्व ऋक् संहिता में १० मंडल, बालखिल्य सहित १०२८ सूक्त हैं। वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है। ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक त्र्यम्बक-मंत्र या मृत्युञ्जय मन्त्र (७/५९/१२) वर्णित है, ऋग्विधान के अनुसार इस मंत्र के जप के साथ विधिवत व्रत तथा हवन करने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु दूर हो कर सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है। विश्व-विख्यात गायत्री मन्त्र (ऋ० ३/६२/१०) भी इसी में वर्णित है। ऋग्वेद में अनेक प्रकार के लोकोपयोगी-सूक्त, तत्त्वज्ञान-सूक्त, संस्कार-सुक्त उदाहरणतः रोग निवारक-सूक्त (ऋ०१०/१३७/१-७), श्री सूक्त या लक्ष्मी सूक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट सूक्त के खिलसूक्त में), तत्त्वज्ञान के नासदीय-सूक्त (ऋ० १०/१२९/१-७) तथा हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋ०१०/१२१/१-१०) और विवाह आदि के सूक्त (ऋ० १०/८५/१-४७) वर्णित हैं, जिनमें ज्ञान विज्ञान का चरमोत्कर्ष दिखलाई देता है। ऋग्वेद के विषय में कुछ प्रमुख बातें निम्नलिखित है- ॠग्वेद के कई सूक्तों में विभिन्न वैदिक देवताओं की स्तुति करने वाले मंत्र हैं। यद्यपि ॠग्वेद में अन्य प्रकार के सूक्त भी हैं, परन्तु देवताओं की स्तुति करने वाले स्तोत्रों की प्रधानता है। ॠग्वेद में कुल दस मण्डल हैं और उनमें १०२८ सूक्त हैं और कुल १०,५८० ॠचाएँ हैं। इन मण्डलों में कुछ मण्डल छोटे हैं और कुछ बड़े हैं। इस ग्रंथ को इतिहास की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण रचना माना गया है। इसके श्लोकों का ईरानी अवेस्ता के गाथाओं के जैसे स्वरों में होना, इसमें कुछ गिने-चुने हिन्दू देवताओं का वर्णन और चावल जैसे अनाज का न होना इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। गठन संपादित करें एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, वेद पहले एक संहिता में थे पर व्यास ऋषि ने अध्ययन की सुगमता के लिए इन्हें चार भागों में बाँट दिया। इस विभक्तिकरण के कारण ही उनका नाम वेद व्यास पड़ा। इनका विभाजन दो क्रम से किया जाता है - (१) अष्टक क्रम - यह पुराना विभाजन क्रम है जिसमें संपूर्ण ऋक संहिता को आठ भागों (अष्टक) में बाँटा गया है। प्रत्येक अष्टक ८ अध्याय के हैं और हर अध्याय में कुछ वर्ग हैं। प्रत्येक अध्याय में कुछ ऋचाएँ (गेय मंत्र) हैं - सामान्यतः ५। (२) मण्डल क्रम -ऋग्वेद के मंडल : इसके अतर्गत संपूर्ण संहिता १० मण्डलों में विभक्त हैं। प्रत्येक मण्डल में अनेक अनुवाक और प्रत्येक अनुवाक में अनेक सूक्त और प्रत्येक सूक्त में कई मंत्र (ऋचा)। कुल दसों मण्डल में ८५ अनुवाक और १०१७ सूक्त हैं। इसके अतिरिक्त ११ सूक्त बालखिल्य नाम से जाने जाते हैं। वेदों में किसी प्रकार की मिलावट न हो इसके लिए ऋषियों ने शब्दों तथा अक्षरों को गिन कर लिख दिया था। कात्यायन प्रभृति ऋषियों की अनुक्रमणी के अनुसार ऋचाओं की संख्या १०,५८०, शब्दों की संख्या १५३५२६ तथा शौनककृत अनुक्रमणी के अनुसार ४,३२,००० अक्षर हैं। शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि प्रजापति कृत अक्षरों की संख्या १२००० बृहती थी। अर्थात १२००० गुणा ३६ यानि ४,३२,००० अक्षर। आज जो शाकल संहिता के रूप में ऋग्वेद उपलब्ध है उनमें केवल १०५५२ ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद में ऋचाओं का बाहुल्य होने के कारण इसे ज्ञान का वेद कहा जाता है। शाखाएँ संपादित करें मुख्य लेख : वैदिक शाखाएँ ऋग्वेद की जिन २१ शाखाओं का वर्णन मिलता है, उनमें से चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार पाँच ही प्रमुख हैं- १. शाकल, २. वाष्कल, ३. आश्वलायन, ४. शांखायन और ५. माण्डूकायन। भाष्य संपादित करें सबसे पुराना भाष्य (यानि टीका, समीक्षा) किसने लिखा यह कहना मुश्किल है पर सबसे प्रसिद्ध उपलब्द्ध प्राचीन भाष्य आचार्य सायण का है। आचार्य सायण से पूर्व के भाष्यकार अधिक गूढ़ भाष्य बना गए थे। यास्क ने ईसापूर्व पाँचवीं सदी में (अनुमानित) एक कोष लिखा था जिसमें वैदिक शब्दों के अर्थ दिए गए थे। लेकिन सायण ही एक ऐसे भाष्यकार हैं जिनके चारों वेदों के भाष्य मिलते हैं। ऋग्वेद के परिप्रेक्ष्य में क्रम से इन भाष्यकारों ने ऋग्वेद की टीका लिखी - स्कन्द स्वामी - ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार वेदों का अर्थ समझने और समझाने की क्रिया कुमारिल-शंकर के समय शुरु हुई। स्कन्द स्वामी का काल भी यही माना जाता है - सन् ६२५ के आसपास। ऐसी प्रसिद्धि है कि शतपथ ब्राह्मण के भाष्यकार हरिस्वामी (सन् ६३८) को स्कन्द स्वामी ने अपना भाष्य पढ़ाया था। ऋग्वेद भाष्य के प्रथमाष्टक के अन्त में प्राप्त श्लोक से पता चलता है कि स्कन्द स्वामी गुजरात के वलभी के रहने वाले थे। इसमें प्रत्येक सूक्त के आरंभ में उस सूक्त के ऋषि-देवता और छन्द का उल्लेख किया गया है। साथ ही अन्य ग्रंथों से उद्धरण प्रस्तुत किया गया है। ऐसा माना जाता है कि स्क्न्द स्वामी ने प्रथम चार मंडल पर ही अपना भाष्य लिखा था, शेष भाग नारायण तथा उद्गीथ ने मिलकर पूरा किया था। माधव भट्ट- प्रसिद्ध भाष्यकारों में माधव नाम के चार भाष्यकार हुए हैं। एक सामवेद भाष्यकार के रूप में ज्ञात हैं तो शेष तीन ऋक् के - लेकिन इन तीनों को सटीक पहचानना ऐतिहासिक रूप से संभव न हो पाया है। एक तो आचार्य सायण खुद हैं जिन्होंने अपने बड़े भाई माधव से प्रेरणा लेकर भाष्य लिखा और इसका नाम माधवीय भाष्य रखा। कुछ विद्वान वेंकट माधव को ही माधव समझते हैं पर ऐसा होना मुश्किल लगता है। वेंकट माधव नामक भाष्यकार की जो आंशिक ऋग्टीका मिलती है उससे प्रतीत होता है कि इनका वेद ज्ञान उच्च कोटि का था। इनके भाष्य का प्रभाव वेंकट माधव तथा स्कन्द स्वामी तक पर मिलता है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि इनका काल स्कन्द स्वामी से भी पहले था। वेंकट माधव - इनका लिखा भाष्य बहुत संक्षिप्त है। इसमें न कोई व्याकरण संबंधी टिप्पणी है और न ही अन्य कोई टिप्पणी। इसमें एक विशेष बात यह है कि ब्राहमण ग्रंथों से सुन्दर रीति से प्रस्तुत प्रमाण। धानुष्कयज्वा - विक्रम की १६वीं शती से पूर्व वेद् भाष्यकार धानुष्कयज्वा का उल्लेख मिलता है जिन्होंने तीन वेदों के भाष्य लिखे। आनंदतीर्थ - चौदहवीं सदी के मध्य में वैष्णवाचार्य आन्नदतीर्थ जी ने ऋग्वेद के कुछ मंत्रों पर अपना भाष्य लिखा है। आत्मानंद - ऋग्वेद भाष्य जहाँ सर्वदा यज्ञपरक और देवपरक मिलते हैं, इनके द्वारा लिखा भाष्य आध्यात्मिक लगता है। सायण - ये मध्यकाल का लिखा सबसे विश्वसनीय, संपूर्ण और प्रभावकारी भाष्य है। विजयनगर के महाराज बुक्का (वुक्काराय) ने वेदों के भाष्य का कार्य अपने आध्यात्मिक गुरु और राजनीतिज्ञ अमात्य माधवाचार्य को सौंपा था। पमन्चु इस वृहत कार्य को छोड़कर उन्होंने अपने छोटे भाई सायण को ये दायित्व सौंप दिया। उन्होंने अपने विशाल ज्ञानकोश से इस टीका का न सिर्फ संपादन किया बल्कि सेनापतित्व का दायित्व भी २४ वर्षों तक निभाया। आधुनिक भाष्य तथा व्याख्या संपादित करें दयानन्द सरस्वती, श्रीराम शर्मा आचार्य इन्हें भी देखें संपादित करें ऋग्वेद संहिता वैदिक साहित्य यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद वैदिक काल वैदिक धर्म वैदिक संस्कृति वैदिक कला वैदिक संस्कृत ऋचा बाहरी कडियाँ संपादित करें ऋग्वेद (संस्कृत) (विकिस्रोत) ऋग्वेद (हिन्दी में पढिए) ऋग्वेद, हिन्दी अर्थ सहित सम्पूर्ण ऋग्वेद (प्राचीन संस्कृत भाषा में) वेद-पुराण - यहाँ चारों वेद एवं दस से अधिक पुराण हिन्दी अर्थ सहित उपलब्ध हैं। पुराणों को यहाँ सुना भी जा सकता है। महर्षि प्रबंधन विश्वविद्यालय - यहाँ सम्पूर्ण वैदिक साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। ज्ञानामृतम् - वेद, अरण्यक, उपनिषद् आदि पर सम्यक जानकारी वेद एवं वेदांग - आर्य समाज, जामनगर के जालघर पर सभी वेद एवं उनके भाष्य दिये हुए हैं। जिनका उदेश्य है - वेद प्रचार वेद-विद्या_डॉट_कॉम ऋग्वेद और सामवेद डाउनलोड करें (गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय) Why Read Rig Veda Last edited 15 days ago by Apeksha121983 RELATED PAGES ऋग्वेद संहिता हिन्दू धर्म ग्रंथ वैदिक साहित्य सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। गोपनीयताडेस्कटॉप