जन्म विवाह, मरण गति सोई, जो जस लिखा सो तस होई। तुलसीदास ने रामायण में जिंदगी, मौत और शादी के संयोग को लेकर यह बात कही है। शादी का तो पता नहीं, लेकिन जिंदगी और मौत कब, कहां, कैसे आ जाए, यह कहा नहीं जा सकता। एक्ट्रेस के फिल्ममेकर बनीं आरती छाबरिया अपनी शॉर्ट फिल्म ‘मुंबई-वाराणसी एक्सप्रेस’ में शायद इसी थीम को लेकर आगे बढ़ती हैं। कैंसर का एक मरीज, जिसके पास कुल मिलाकर 2 महीने हैं। बड़ा सा बिजनेस छोड़ वाराणसी चल देता है, क्योंकि काशी में मरने को मोक्ष मिलने जैसा माना गया है। लेकिन, वह वहां पहुंचने के बाद जिंदगी के दूसरे पहलू से रू-ब-रू होता है। 2 महीने साल भर की सांसों में बदल जाते हैं। फिर अचानक उसे घर वापसी की चाहत जागती है और... दरअसल, कोशिश करने के बाद भी मोह-माया कम ही लोग छोड़ पाते हैं। यही बात आरती ने बखूबी इस फिल्म दिखाई है। उन्होंने यह भी दिखाया है कि मौत कहीं भी आ सकती है। दर्शन जरीवाला एक उम्दा एक्टर हैं। उन्होंने 30 मिनट की फिल्म में बुजुर्ग से जवान होते इरादों को बहुत शानदार तरीके से पेश किया है। दर्शन इससे पहले भी कई शॉर्ट फिल्मों और वेब सीरीज में काम कर चुके हैं। फिल्म में एक और अहम कलाकार का जिक्र करना जरूरी हो जाता है, जो भले कम समय के लिए आते हैं, लेकिन अपनी छाप छोड़ जाते हैं। उनका नाम है सतीश सुतारिया। हां, एक और किरदार, जो दर्शन के साथ चलता है। जिंदगी का फलसफा समझाता है। वह किरदार निभाया है विवेक सिंह ने। क्या बढ़िया काम किया है। उस बच्चे की तारीफ भी बनती है, जो दर्शन को जीवनदर्शन सिखाता है। अंश तिवारी बहुत मासूमियत से मोह लेते हैं। बात अगर आरती की करें, तो कहीं से भी निर्देशन कमजोर नहीं लगता। एक कलाकार अच्छा निर्देशक हो सकता है, यह उन्होंने साबित किया है। शुरू से लेकर आखिर तक फिल्म बांधे रखती है। कैलाश खेर का गाना भी बहुत प्रभावी है और फिल्म को भी प्रभावी बनाता है। पूरी फिल्म यहां देखें
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रामायण में किस कांड में है बताने की कृपा करें
ReplyDeleteNamaste prabhu. Yah chaupai Ramcharitmanas ki nahi hai. Kahin aur se aayi hai.
ReplyDeleteRamayan me kha likhi hai
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