Saturday, 4 November 2017
भक्ति ज्ञान से श्रेष्ठ है, भक्ति प्रेम का रूप
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भक्ति ज्ञान से श्रेष्ठ है, भक्ति प्रेम का रूप
2016-08-25 10:00:35.0 विजेंदर सिंह आर्य
बिखरे मोती-भाग 155
गतांक से आगे....
भक्ति ज्ञान से श्रेष्ठ है,
भक्ति प्रेम का रूप।
ज्ञान के भूखे हरि नही,
प्रेम के भूखे अनूप ।। 1072 ।।
व्याख्या :-
ज्ञान और भक्ति दोनों ही संसार का दुख दूर करने में समान है, किंतु दोनों में ज्ञान की अपेक्षा भक्ति की महिमा अधिक है। ज्ञान में तो अखण्डता की प्राप्ति होती है किंतु भक्ति में अनंतरस की प्राप्ति होती है। इसे ऐसे समझिये-अनंतरस में प्रतिक्षण बढऩे वाला
Read This - यजन भजन के योग तै, भक्ति चढ़ै परवान
, लहरों वाला, उत्ताल तरंगों वाला एक बहुत विलक्षण आनंद है। जैसे संसार में किसी वस्तु का ज्ञान होता है कि ये कलम है, यह कुर्सी है इत्यादि। यह ज्ञान केवल अज्ञान (अनजानेपन) को मिटाता है। ऐसे तत्व ज्ञान केवल अज्ञान को मिटाता है। माना कि अज्ञान मिटने से दुख, भय, जन्म-मरण रूप बंधन ये सब मिट जाते हैं किंतु प्रेम (भक्ति) ज्ञान से भी अधिक विलक्षण है। यदि आप इस विषय पर गंभीर चिंतन करेंगे तो पाएंगे ज्ञान भगवान तक नही पहुंचता जबकि प्रेम भगवान तक चहुंचता है। दूसरा अंतर यह है कि ज्ञान का अनुभव करने वाला तो व्यक्ति स्वयं होता है जबकि प्रेम का अनुभव करने वाला और ज्ञाता तो परम पिता परमात्मा होता है। वह परमपिता परमात्मा तो सर्वज्ञ है इसलिए वे ज्ञान के भूखे नही, अपितु प्रेम के भूखे हैं। इस संदर्भ में रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास कितना सुंदर कहते हैं:-
रामहि केवल प्रेम पिआरा।
जान लेउ जो जाननिहारा।।
'अयोध्याकाण्ड' पृष्ठ 375
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अमिअंतर मल कबहुं न जाई।।
'उत्तरकाण्ड' पृष्ठ 847
अर्थात परमात्मा की प्रेमपूर्ण भक्ति रूपी जल के बिना हृदय का मैल कभी नही जा सकता है।
राम भगति मणि डर बस जाकें।
दुख लवलेश न सपनेहुं ताकें।।
(उत्तरकाण्ड पृष्ठ 909)
अर्थात राम-भक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है उसे स्वप्न में भी दुख नही होता है।
ज्ञान की अपेक्षा भक्ति (प्रेम) की महिमा के संदर्भ में तुलसी की अमोघ वाणी को उद्घृत करने के उपरांत यहां यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि मोक्ष प्राप्त करने पर ज्ञान योगी संतुष्ट
हो जाता है, तृप्त हो जाता है, किंतु प्रेम प्राप्त होने पर भक्त संतुष्ट नही होता, अपितु उसका आनंद उत्तरोत्तर बढता जाता है। अत: आखिरी तत्व प्रेम है-मुक्ति नही।
ध्यान रहे, भगवान में आकर्षित करने की शक्ति प्रेम में होती है-ज्ञान में नही, ज्ञान शुष्क है, जबकि प्रेमचित्त को स्निग्ध करता है। ज्ञान मस्तिष्क की वस्तु है
, एक विचार है, जो कि नीरस है, उबाऊ है जबकि प्रेम हृदय की वस्तु है, एक सुकोमल भाव है, सरस है, रूचिकर है, मनभावन है, इतना ही नही सब गुण प्रेम से प्राणित होते हैं। इसलिए प्रेम गुणों का राजा कहलाता है। ज्ञान में निष्ठुरता हो सकती है किंतु प्रेम में ऋजुता का सागर ठाठें मारता है। प्रेम ज्ञान से भी अधिक सशक्त और आकर्षक है। वस्तु के आकर्षण में जो रस है, वह रस वस्तु में और वस्तु के ज्ञान में नही है। इसलिए ज्ञान की अपेक्षा भक्ति श्रेष्ठ है। हमेशा याद रखो, प्रेम की प्रगाढ़ता अथवा परमपिता परमात्मा के प्रति अतिशय प्रेम ही भक्ति कहलाती है।
ज्ञान और प्रेम के संदर्भ में अर्जुन ने भी भगवान कृष्ण से प्रश्न किया था कि भगवन! ज्ञान और प्रेम में कौन श्रेष्ठ है? गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं-हे पार्थ! ज्ञान में तत्वभेद तो नही होता किंतु मतभेद अवश्य होता है। जो कभी-कभी मनभेद भी उत्पन्न कर देता है जबकि प्रेम के मतभेद भी नही रहता और न ही मनभेद रहता है। अत: प्रेम आगे कुछ भी नही। प्रेम में वह अतुलित शक्ति है जो इंसान को ही नही अपितु भगवान को भी वश में कर लेती है। इसीलिए प्रेम ज्ञान से श्रेष्ठ है।
क्रमश:
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