श्रीमद्भागवतम् कथा (श्लोक प्रति श्लोक ) १.१३.२
धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग
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विविध प्रश्न पूछने के बाद तथा भगवान् कृष्ण की दिव्य प्रेमामयी सेवा में स्थिर हो चुकने पर, विदुर ने मैत्रेय मुनि से पश्च पूछना बन्द किया ।
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तात्पर्य : विदुर ने मैत्रेय मुनि से तब प्रश्न पूछना बन्द किया, जब मैत्रेय ऋषि ने उन्हें आश्वस्त किया कि जीवन का आश्रय- तत्त्व तो अन्ततः भगवान् श्रीकृषण की दिव्य प्रेमामयी सेवा में सुस्थापित होना है, जो गोविन्द हैं अर्थात् जो अपने भत्तों को सभी प्रकार से तुष्ट रखते हैं । बद्धृजीव अर्थात् भौतिक अस्तित्व में फँसा हुआ जीव भौंतिकतागुणों में अपनी इन्द्रियों को लगाकर सुख की खोज करता है, किन्तु इससे उसे सन्तोष नहीं होता । तब वह अनुभव सिद्ध तात्त्विक तर्क करने की विधि से तथा बौद्धिक करतबों से परम सत्य की खोज में जुट जाता है । किन्तु यदि उसे अन्तिम लक्ष्य प्राप्त नहीं होता, तो वह पुन : भौतिक कार्यकलापों में पतित हो जाता है और अपने आप को विविध परोपकारी तथा परमार्थ कार्य करने में लगा देता है, किन्तु इन सबसे उसे संतोष नहीं मिल पाता । अत: न तो सकाम कर्म और न ही शुष्क दार्शनिक चिन्तन से किसी को सन्तोष मिल सकता है, क्योंकि जीव स्वभावत: परमेश्वर श्रीकृष्ण का सनातन सेवक है और सारे वैदिक ग्रन्थ इसी चरम लक्ष्य की ओर उसका मार्गदर्शन करते हैं । भगवद्गीता (१५.१५ ) द्वारा इस कथन की पुष्टि होती है ।
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विदुर के समान ही जिज्ञासु बद्धजीव को, मैत्रेय जैसे प्रामाणिक गुरु के पास पहुँचना चाहिए और बुद्धिपरक जिज्ञासाओं द्वारा कर्म ( सकाम कर्म), ज्ञान (परम सत्य को जानने के लिए दार्शनिक अनुसंधान) और योग (आत्म-साक्षात्कार की योग-विधि ) के विषय में प्रत्येक वस्तु को जानने का प्रयास करना चाहिए । जो व्यक्ति अपने गुरु से प्रश्च पूछने के प्रति गम्भीरतापूर्वक प्रवृत्त नहीं होता, उसे न तो दिखावटी गुरु करने की आवश्यकता है और न उस व्यक्ति को अन्यों का गुरु होने का दिखावा करना चहिए, यदि वह अपने शिष्य को भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य प्रमाभक्ति की ओर उन्मुख न कर सके । विदुर मैत्रेय जैसे गुरु के पास पहुंचने में सफल हुए थे और उन्हें जीवन का चरम लक्ष्य-गोविन्द की भक्ति-प्राप्त हो सका । अत: उनके लिए आध्यात्मिक प्रगति के विषय में और कुछ जानना शेष न बचा था ।
Saturday, 4 November 2017
धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग
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