Saturday, 4 November 2017
चार प्रकार के भक्त


चार प्रकार के भक्त
By: योगाचार्य सुरक्षित गोस्वामी
उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् |
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् || गीता 7/18
अर्थ : ये सभी निश्चित रूप से उदार हैं, किन्तु ज्ञानी को मैं अपना ही आत्मा मानता हूँ, क्योंकि वह युक्तात्मा सर्वोत्तम गतिरूप मुझमें ही स्थित है ।। 18 ।।
व्याख्या : भगवान् को भजने वाले सभी चारों प्रकार के भक्त उदार ही होते हैं, भले वो धन की इच्छा से भेज रहे हो या दुःख निवारण के भाव से या परमात्मा को जानने के भाव से या आत्मा का ज्ञान प्राप्त ज्ञानी। लेकिन इन चारों में जो चौथे प्रकार के ज्ञानी होते हैं, जिनको आत्मा का ज्ञान हो गया है, उसको भगवान् अपना ही आत्मा मानते हैं, क्योंकि भगवान् का मानना है कि आत्मा मेरा ही अंश है। अतः आत्मा का ज्ञान हो जाने से निरंतर साधना में लगा साधक, परमात्मा में स्थित होने लगता है। फिर हमेशा आत्मा में युक्त रहने वाला योगी, संसार में सब कुछ करता हुआ, सर्वत्र भ्रमण करता हुआ भी परमात्मा में ही स्थित रहता है।
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