प्रिय मित्रो,
अजामिल की कथा और उससे
प्रेरणा !!
अजामिल गुरु का परम भक्त था और
हमेशा गुरु आज्ञा में रहता था !
प्रतिदिन सुबह घर से आश्रम आ
जाना और सारा दिन सेवा करके
सांयकाल वापिस अपने घर चले
जाना ! यह सिलसिला बहुत दिन
चलता रहा ! एक दिन गुरु ने उसे
कहा कि अजामिल, 'आज से तुमने शहर
का रास्ता नही लेना, बाहर २ से
जाना है और बाहर २ से ही आना है !'
अजामिल ने कहा, ' ठीक है गुरूजी,
जो आज्ञा !' और फिर अजामिल ने
अपना रास्ता बदल दिया ! कुछ दिन
बाद उसके दिमाग में आया कि गुरु
ने मुझे शहर के रास्ते से आने-
जाने के लिए क्यूँ मना किया है ?
ऐसा क्या हो सकता है ? संशय भी आ
गया और उत्सुकता भी ! आश्रम से
जाते हुए शहर का रास्ता पकड़
लिया कि आज देखते हैं
कि क्या है वहां , गुरु को थोड़े
ही पता चलेगा !
पर गुरु को तो सब
अगला पिछला मालूम था ! उस रास्ते
पर जाते हुए आज उसने देखा, एक घर
की सीढियों पर बहुत से लोग चढ़
रहे हैं ! उत्सुक्तावस वह भी चढ़
गया ! वह एक वेश्या का कोठा था !
अजामिल के कदम बहक गये ! वह
वहां प्रतिदिन आने लगा और धीरे २
सेवा भी छूट गयी ! फिर आश्रम
भी छूट गया ! गुरु को भी भूल गया !
उस वेश्या से उसे प्रेम हो गया और
उस कारण से वह पतन के रास्ते
चला गया ! अपने परिवार और
बच्चों से दूर हो गया ! उस
वेश्या से विवाह कर लिया ! इस
रास्ते पर चलते हुए उसका सब कुछ,
यश, इज्जत, धन, दौलत, परिवार बर्बाद
हो गये !
अंत समय में संतों की कृपा से जब
वह वापिस सही रास्ते पर
आया तो उसे मुक्ति मिली !
यह कथा हमने संक्षेप में बताई है !
अगर सद्गुरु हमें कोई मार्ग
का अनुसरण करने के लिए बताएं
तो हमें उन पर पूर्ण विश्वास करके,
पूर्ण समर्पण भावना से उस मार्ग पर
चलना चाहिए ! गुरु हमें कोई
आज्ञा या सेवा देते हैं, हमारे
कल्याण के लिए, अपने लिए नही !
भगवान् राम ने हनुमान जी, अंगद,
सुग्रीव, जामवंत, केवट, विभीषण,
जट्टायु अदि से सेवाएँ क्यूँ ली ?
वो तो स्वयं भगवान् थे ! वे इन
सबका सेवा के माध्यम से कल्याण
करना चाहते थे ! अगर हम केवल अपने
गुरु के दिखाए मार्ग पर चलें
तो ही हमारा विकास है ! गाड़ी के
घोड़े की तरह चलें
जिसकी दोनों आँखों के साइड में
पट्टी चढ़ी होती है, वह केवल
सीधा ही देखता है, इधर उधर नही !
बहुत लोग सामने से या पीछे से वार
करने के लिए अवसर की तलाश में
रहते हैं !
मार्गदर्शन के लिए हमें केवल अपने
गुरु को ही देखना चाहिए,
उनकी आज्ञाओं में चलना चाहिए !
जहाँ लगे कि बात में कुछ फर्क है
या जहाँ भी कोई शंश्य आये, अपने
आश्रम से, गुरु से सम्पर्क करलें !
कीचड़ में पत्थर फैंकने से छींटे
हम पर ही पड़ते हैं ! कई बार
या ज्यादातर गुरु ज्ञान पर
ही शंश्य होने लगता है,
जबकि कारण हम खुद ही होते हैं !
पथभ्रष्ट होने
का खतरा भी लगा रहता है! अगर हमने
कई शास्त्र भी पढ़े हुए हों तो हम
अपने आपको विद्वान भी समझने
लगते हैं ! कितनी बार आस पास
की परिस्थियाँ हमें ज्ञान के
मार्ग से भटकाने का प्रयत्न
करेंगी, पर हमें हाथी की तरह मस्त
चाल से चलना चाहिए, कुत्ते
भोंकते हैं तो भोंकते रहें !
बिच्छू के बार २ काटने पर भी संत
लोग अपना स्वभाव नही छोड़ते !
विरोधी लोग बहकाने का प्रयत्न
सदा ही करते आये हैं और करते
रहेंगे ! यह हम पर निर्भर है कि हम
कितने दृढ संकल्प हैं अपने मार्ग
पर !! —
Saturday, 4 November 2017
अजामिल की कथा
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