Saturday, 4 November 2017
निष्काम भक्ति ही प्रिय
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भगवान को प्रिय है निष्काम भक्ति: आशुतोष महराज
Sat, 03 Jun 2017 11:49 PM (IST)
रायबरेली: डलमऊ क्षेत्र के पूरे भोला मजरे तेरूखा के केदारेश्वर महादेव मंदिर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का विशाल भंडारे के साथ समापन हुआ। भागवत कथा के समापन अवसर पर केशवाचार्य पं आशुतोष त्रिपाठी जी महराज ने भगवान के विभिन्न विवाहों का वर्णन करते हुए सुदामा चरित्र का मार्मिक वर्णन किया।
कथा में महराज ने कहा कि सहजता, सरलता और सजगता जीवन की कुंजी है। कृष्ण की लीला सुनाते हुए कहा युधिष्ठिर के राजस्वी यज्ञ में सहजता, सुगमता एवं सरलता का दर्शन होता है। जो छोटा कार्य यानी पत्तल उठाना कोई नहीं करना चाहता था, उसको सोने की द्वारका के अधिष्ठाता होते हुए भी भगवान ने किया। ये सहजता है। जिस बैकुंठ अधिपति को कोई घोड़ा नहीं बना सकता, उनको मधु मंगल जैसा सखा घोड़ा बनाकर बैठता है। यहां भगवान की सरलता का दिव्य दर्शन होता है। साथ ही युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र में जितना सजग अर्जुन नहीं है, उतने सजग पग-पग पर भगवान बने रहे। भगवान के विभिन्न विवाहों के प्रसंगों को सुनाते हुए कहा कि भगवान की आठ पटरानियां अष्टधा प्रकृति है। प्रकृति को ही स्वभाव कहा जाता है। जीव प्रकृति के अधीन है लेकिन प्रकृति परमात्मा के अधीन है। ये स्वभावगत प्रकृति संसारगत संसर्ग से बिगड़ती है लेकिन कथा सत्संग सेवा से स्वभाव बदला जा सकता है।
सुदामा चरित्र की कथा में आपने कहा कि सुदामा निष्काम भक्ति का प्रतीक है। भागवत के 80 वें अध्याय में सुदामा चरित्र की कथा आई है। 80वें अध्याय में आठ का अंक ही अष्टधा प्रकृति का सूचक है। प्रकृति से विलग होने पर ही निष्काम भक्ति बनती है। इसीलिए ना तो सुदामा ने भगवान से कुछ मांगा और ना भगवान ने सुदामा को कुछ दिया। जो दिया वह सुदामा की पत्नी सुशीला के मन संकल्प के कारण दिया। अतरू सुदामा की भक्ति निष्काम भक्ति है और भगवान को निष्काम भक्ति ही प्रिय है। कथा समापन के बाद महेश त्रिपाठी व शिवि त्रिपाठी ने एक साथ हवन-पूजन किया। इस महापुतन में परिवार के अन्य लोग भी सम्मिलित हुए। पूजन के बाद विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया। देर रात तक भण्डारा चलता रहा। रात में बाल्हेश्वर धाम के व्यास जी की रामलीला का मंचन किया गया। सैकड़ों की संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।
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