वह कौन है , जो दूर से दूर है , और पास से पास भी है ? वह बाहर भी है , भीतर भी है । जो मार्ग भी है और मंजिल भी है । साथ भी है अलग भी है । जो मिलकर भी नहीं मिलता, और न मिलकर भी मिला हुआ है ? कौन है वह , जिसके प्रेम मे मिलन का आनंद भी है और विरह की तड़प भी । वह जो इतने सारे विलोमों का अकेला संगम है ? वह अद्वितीय ईश्वर ही है ...
वह ही इतने समीप है कि उनकी तुलना मे हदय की धड़कने भी दूर लगती है । और वे ही प्रभु इतने दूर भी है कि उन्हे प्राप्त करने मे एक जन्म भी छोटा पड़ जाता है । वे ही मार्ग मे हमारे साथ , हमारा हाथ पकड़कर चलते है , कहा , अपनी ओर ? अदभुद है न । "मुझ ही मे रहकर, मुझ ही से अपनी खोज ये कैसी करा रहे हो ? । खैर कहने को बहुत है , पर सनातन सत्य यही है ---
"उठो , जागो और ऐसी साधना करो कि तुम्हारा साध्य , तुम्हारे समक्ष प्रकट होने को विवश हो जाये। और स्वयं तुम्हारा वरण करे।"...
भजन, कीर्तन, जाप, वंदनाये केवल साधन हैं भगवान के प्रति -- अपना प्रेम व प्राप्ति हेतु उत्कंठा बढ़ाने के लिए, उनमे अपना भाव व उनसे सम्बन्ध बनाए रखने के लिए, सुकीर्ति और सुयश आदि सुनकर उनके लिए अधीर हो उठने के लिए ...। परमात्मा के प्रति जिज्ञासा का भाव व ज्ञान ही वह श्रेष्ठ सुमिरन है जो आत्मा को परम्स्रेष्ठ आत्मा, परमात्मा से जोड़ देता हैं ,उनसे मिला देता हैं । स्वादो के सिमरन से जीभ की रसना कभी नहीं लरज़ती हैं । अतः भगवान को जानने की जिज्ञासा जो होती है न वह एक तरह से उनकी भक्ति, उनका जप , उनकी पूजा व सिमरन ही हैं
इस दुनिया के मनुष्य हमे तभी स्वीकार करते है जब हम अपने आप को सही सिद्ध करके जीत जाते है ...लेकिन वो दयालु , कृपालु भगवान हमे तब भी अपना लेते है जब हम अनेक बार अपना सब कुछ हारकर उनके पास जाते हैं । ॥जय श्री राम॥ ।हर हर महादेव।
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