Saturday, 4 November 2017

ज्ञान, भक्ति व कर्म तीनों जीवन की आवश्यकताएं

Jagran  ज्ञान, भक्ति व कर्म तीनों जीवन की आवश्यकताएं Fri Nov 30 11:03:09 IST 2012   जींद। ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों जीवन की आवश्यकताएं हैं। कपड़े के मैला होने पर उसे धोकर साफ करते हैं, वैसे ही मन का मैल साफ करने के लिए भक्ति के जल में भिगोकर उसे ज्ञान के साबुन से धोना पड़ता है। फिर सत्य के पाटा से पीटकर मैल निकाला जाता है। ज्ञान, भक्ति और कर्म के बिना मुक्ति संभव नहीं है। यह बात विवेकानंद नगर में चल रहे संत समागम को संबोधित करते हुए स्वामी विवेकानंद महाराज ने कही। उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा में सुदामा-कृष्ण और कृष्ण-दाउ प्रसंग का वर्णन किया। यदु वंश के नाश की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यदुवंशियों का अहंकार इतना बढ़ गया था, वही उनके विनाश का कारण बना। उन्होंने कृष्ण के संदेश के बारे में बताया कि अकेले ही इस संसार से जाना होता है। यहां कोई अपना नहीं, तुम्हारा शरीर भी यहीं छूट जाएगा। न घर अपना है, न परिवार अपना है लेकिन तुम जियो तो सबके बनकर जियो। सब के काम आओ लेकिन किसी को अपना न मानो, किसी से कोई अपेक्षा न रखो। उन्होंने कहा कि भागवत कथा संपूर्ण सुधा पीना आवश्यक नहीं है लेकिन कथा सुधा की एक बूंद को भी ग्रहण कर लिया जो जीवन सफल हो जाएगा। जैसे अमृत की एक बूंद ही अमरत्व प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि कल्पना जीवन को महत्व देने का श्रेष्ठ माध्यम है। रस, माधुर्य, स्नेह, लालित्य भाव सभी कल्पना से जुडे़ हैं। जीवन वर्तमान है, स्मृति अनुभव है और कल्पनाशक्ति व्यक्ति की योजन शक्ति है। आज के कार्यो में पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान को कैसे संजोया जाए, इसके लिए कल्पना शीलता आवश्यक है। व्यावहारिक भाषा में इसे स्वप्न देखना भी कहा जा सकता है। स्वप्न निजी धरातल के भी हो सकते हैं, कार्य क्षेत्र के भी और जीवन के किसी भी क्षेत्र के। जो स्वप्न देखेगा, वही कल्पना शीलता के सोपान पर चढ़ते हुए श्रम-साधना द्वारा लक्ष्य की प्राप्ति कर पाएगा।  उन्होंने कहा कि मनुष्य को सत्य की ओर चलना है और यह मोक्ष की साधना है। यह दीक्षा के बिना संभव नहीं है। अगर कोई अंधकार में चलता है तो उसे एक टार्च द्वारा प्रकाश देने वाला यंत्र चाहिए अन्यथा वह गहरी खाई में गिर जाएगा। उसी तरह यदि कोई साधना के पथ पर चलता है तो उसे प्रकाश के लिए टार्च की आवश्यकता होती है अन्यथा उसका अंध पतन अवश्यंभावी है। आध्यात्मिक जगत में टॉर्च का अर्थ दीक्षा से है। सीखना ज्ञान की साधना है। इस पथ पर चलना अर्थात नियमित साधना, कर्म की साधना है। भक्ति तो मोक्ष साधना का चरम बिंदु है। मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर ताज़ा ख़बर  अक्षय नवमी नगर परिक्रमा में उमड़ा आस्था का सैलाब  301 महिलाओं ने राणी सती दादी का किया मंगलपाठ  मंगलपाठ संग श्याम महोत्सव प्रारंभ, हुए आयोजन  14 कोसी परिक्रमा पूरी, घर पहुंचने में दुश्वारी  छपिया में आज निकाली जाएगी पोथी यात्रा  View more on Jagran Copyright © 2017 Jagran Prakashan Limited.

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